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शनिवार, 19 नवंबर 2022

402

 डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'


































फिर  मिलेंगे [पूरी कविता]


जब आप बैठते हो ट्रेन में
जाते हो दूर- किसी अपने से
ट्रेन की स्पीड के साथ
कदमताल करती धड़कनें
तेज़ होती जाती हैं-
स्टेशन के पीछे छूटते हुए
आपको लगता है
दम घुट जाएगा
, साँसें रुक जाएँगी
आप दरवाज़े से बाहर झाँकते हुए
रोते हो बेतहाशा-
रुकता ही नहीं
,
आँसुओं का सैलाब।
धीरे-धीरे ओझल हो जाता है-
आपका वह अपना- हाथ हिलाते हुए
;
आप बर्थ पर ढेर हो जाते हो
फिर काँपते हाथों से
मोबाइल निकालकर-
कॉल लगाते हो
;
उधर से आवाज आती है-
'रोओ मत, अपना ध्यान रखना
तुम्हें पता है ना
, तुम्हारा रोना
दुनिया में सबसे बुरा लगता है
,
आँसू पोंछो
, मुस्कराओ,
जल्दी ही फिर मिलेंगे।
'
फिर आप सिसकते हुए
धीरे-धीरे चुप हो जाते हो
इस उम्मीद में कि फिर मिलेंगे ही।
काश! दुनिया के स्टेशन पर खड़े होकर
जीवन की आखिरी ट्रेन में बैठे
किसी अपने को कोई अपना
ये दिलासा दे पाता-
रोओ मत
, जल्दी ही फिर मिलेंगे!

 


शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

93-लोकमत



‘लोकमत  समाचार’ दैनिक के   दीपावली के उत्सव प्लस विशेषांक( कला एवं साहित्य)  में मेरी चार लघुकथाओं को भी  स्थान दिया ,इसके लिए मैं सम्पादक श्री  विकास मिश्र एवं प्रकल्प सहयोगी श्री हेमधर शर्मा और श्री स्वप्निल जैन की हृदय से आभारी हूँ। आशा है इस  विधा का मेरा यह प्रथम प्रयास आपको पसन्द आएगा
डॉ.कविता भट्ट







सोमवार, 19 नवंबर 2018

92-लोकमत

[आज लोकमत के बृहद  विशेषांक में  प्रकाशित  रामेश्वर काम्बोज' 'हिमांशु ' की लघुकथाएँ दी जा रही हैं .इन लघुकथाओं में निहित  कथ्य की शक्ति पढ़कर ही जानी जा सकती  है . डॉ. कविता भट्ट ]