बाबूराम प्रधान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बाबूराम प्रधान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 5 जनवरी 2022

317

 1- मोती प्रसाद साहू


 

1-कोख में भी नहीं

कच्चे मकान की

कोठरियों के कोने में

रखी हुई कुठलियाँ और

बीच की शेष जगह...

अरगनी पर रखे हुए कपड़ों के पीछे

खटिया-मचिया के नीचे

कभी चरनी व नाद में बैठ कर लेटकर

छुपन-छुपाई खेलते हुए

बाप तथा बड़े भाई की कड़क आवाज से घबराकर

बहुरुपियों के खूनी मंजर से डरकर

स्वयं को

छिपा लेती थीं लड़कियाँ

आसानी से

ग्रामीण परिवेश में ये जगहें

माँ के अतिरिक्त

उनके लिए कवच हुआ करती थीं

शुक्र है गूगल सर्च नहीं होता था

उस समय

अब

सीमेण्ट के मकान में

वे कुठलियाँ नहीं,

अरगनियाँ नहीं

खटिया-मचिया

चरनी व नाद भी नहीं

जरूरत भी नहीं...

लड़कियाँ अब कोख में भी

नहीं छिप सकतीं...

2-मैं आदमियों से डरता हूँ

 

पहली बार रेंगते हुए गोजर को देखकर

घिघियाया

थोड़ा बड़ा हुआ तो

खुद पर शर्म आ कि

आदमी का बच्चा होकर डर गया

इंच दो इंच के गोजर से

शर्म कभी समय पर नहीं आती

देर से आना और खिल्ली उड़ाकर नौ-दो ग्यारह

अम्लीय इतना कि पत्थर भी गलते देर नहीं

कितना भी कर लो स्वयं को मजबूत

अतड़ियों के अंतहीन कन्दराओं में छिपा बैठा डर

निकल ही आता है बाहर

अन्हार-धुन्हार

खेत-खलिहान, निपटान आदि

आते-जाते।

जिस बंसवाड़ी से मैं गुजर रहा हूँ

इसी में रहती है सफेद वस्त्रों वाली चुड़ैल

जिसकी चर्चाएँ गाँव के हर पुरुष को है

वाया स्त्रीमुख

गाँव की अधिकतर स्त्रियाँ करती हैं।

इसी कुईं में तो कूद कर मरी थी

जितुवा नट की घरवाली

शराबी पति की आदतों से परेशान होकर

अब हवा बनकर करती है चोप

सीवान वाले रास्ते पर जो आम का पेड़ है

वहीं पर बैठकर निपट रहा था

अशर्फी बिन्न का लड़का

कि कड़क उठी थी बिजुरी...

अब बिजुरिया बाबा का भूत।

खैर;

इनके लिए हनुमान चालीसा है

रामबाण ...

अब बंसवाड़ी नहीं

कुइयाँ भी नहीं

बिजुरिया बाबा का पेड़ खुद पहुँच गया

लोगों के घर

खिड़की, दरवाजा व ईंधन बनकर

विधाता ने उन्हें मुक्त करते हुए कहा

आज से तुम आदमी हुए

मैं आदमियों से डरता हूँ...

-0-

3-आउट ऑफ डे

 तुम कैसी चिड़िया थी

जो ताड़ न सकी शिकारी की नजरें

उड़ने को पंख तो थे तुम्हारे पास

और धरती पर टिके रहने के लिए दो पैर

उसने नहीं दिखलाई कोठियाँ

गाड़ियों की रंग-बिरंगी सीरीज़

ज्वेलरी, ब्राण्डेड कपड़े

और

न ही कोई बैंक-बैलेंस

उसने चारा नहीं फेंका अबकी

और न ही फैलाया कोई मायाजाल

छोड़ो भी;

ये सब पुरानी पद्धतियाँ हैं

चिड़ीमार बहेलियों की

'आउट आफ-डेट'

उसने श्लाघा को बनाया सीढ़ी

तुम तक पहुँचने को

नहीं, नहीं...

तुम तक नहीं;

बस तुम्हारे शरीर तक...

-0-motiprasadsahu@gmail. com

अल्मोड़ा

-0-

2-बाबू राम प्रधान



सुर के साथ साज देखिए

कहने का अंदाज देखिए

 

बातों की तह  में  जाकर

दिल में छुपे  राज देखिए

 

प्यार  में  हुआ था पागल

कैसे गिरी है गाज देखिए

 

कल अहं था आसमाँ पर

पैरो में उसके ताज देखिए

 

रहा गुनाहगारों की सफ़ में

आज उसके नाज देखिए

 

नीचे  निगाह ऊँची  उड़ान 

घात लगाता  बाज देखिए

 

जिसके लिए मरे वही मारे

आती नहीं है लाज देखिए

-0-

मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

302-वक्त बड़ा बलवान


बाबूराम प्रधान

 

शांत समुद्र को  हिलाने जा रहा

दरिया खुद को  मिटाने जा रहा

 

धरती  ने   कहीं  टेर    लगाई है

बादल   पानी  पिलाने   जा रहा

 

मर्ज   उसका  है दिल का पुराना

देखो कहाँ नब्ज दिखाने जा रहा

 

जिसको सलूक का सलीका नहीं

सदर  से   हाथ  मिलाने जा रहा

 

जो बेचता रहा  जमीं  नजूल की सरकारी

हकूकों को हक़ दिलाने  जा रहा

 

समाज में जो विष  फैलाता रहा

बज्म  को अमृत पिलाने जा रहा

 

वक्त  बड़ा   बलवान  है  साहिब

बेअक्ल अदब  सिखाने जा रहा

-0-

baburampradhan8@gmail.com

रविवार, 15 दिसंबर 2019

तुम कितनी हसीन हो


 बाबूराम प्रधान


             देखकर तुम्हें अर्श में जो देखूँ
             शबे नूर हो तुम  महजबीन हो
तुम कितनी हसीन हो
           
  मुझको  जो  देखें   तुम्हारी  निग़ाहें
              तबीयत   संग डोलें  हमारी  निग़ाहें
              इस दिल को  करना पड़ता  है काबू
              मारें   हिलोरें   दिल   की  जो   चाहें
              लचकती  हो  डाली  फूलों  की जैसे 
              खुदा का हो तोहफा अर्शे परवीन हो
तुम कितनी हसीन हो
              खुशबू   तुम्हारी    महकती   सबा  है
              बेदवा  मर्ज   की  भी तू  ही  दवा    है
              मुस्कुरा के जो देखे  दिल पे असर हो
              मरते  मरते  बचा  ले  तू  ऐसी हवा है
              समझके फूल लबों पे बैठ  जाएं भँवरे
              लगती हो ऐसे जैसे सहरा में नस्रीन हो
तुम कितनी हसीन हो
               एक झलक जो देखे हो  जाए दीवाना
               रुखसार वासिफ कोई चश्मे  दीवाना
               तुझको  जो देखे वो  ढूँढे  लकीरों   में
               उठ जाऐं जो नजरें  मुस्कुराए दीवाना
               पाने तुम्हीं  को वो  इबादत  में लगे हैँ
               रोजे  का तप  ईद सी ताजातरीन  हो
तुम कितनी हसीन हो
               दिल में हो  हलचल यूँ इतराके चलना
               हवाओं में  ये आँचल  उड़ाके   चलना
               छाए घटा काली गेसू झटकाके चलना
               शाख ए गुल को हिला हिलाक़े चलना
               जो भी देखे तुम्हें  वो रुक जाए राह में
               हुस्न के  नशे में  कितनी  तल्लीन  हो

तुम कितनी हसीन हो

   महजबीन - चन्द्रमा के समान ,शबे नूर - रात की चांदनी ,अर्श  -  नभ ,  अर्शे परवीन - कृति का नक्षत्र,  सहरा - रेगिस्तान /जंगल ,  नसरीन  - सफेद गुलाब ,  रुखसार वासिफ   - कपोल प्रशंसक ,  चश्मे दीवाना -  चक्षु प्रेमी ,  इबादत  - पूजा ,  शाख ए गुल -   फूलों की डाली ,
--0-
 बाबूराम प्रधान
       नवयुग कॉलोनी , दिल्ली रोड,
        बड़ौत - 250611
        जिला - बागपत , उत्तर प्रदेश

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

गुजर जाता है



सामने से होकर जब भी वो गुजर जाता है
तूफान सा उठता है दिल में गुजर जाता है

किस तरह आता दरिया को जोश जवानी का
सीमा तोड़ता हुआ सैलाब गुजर जाता   है

सुंदर सजे दरिया के किनारे  छोड़  चले  जाते
कालिमा छोड़ जब माहताब गुजर जाता है

उसी के नाम सजने लगती हैं महफिलें
जहां को लुटाके खुशियां जो गुजर जाता है

खास तेल, बाती, वो चराग जो जलता  रहे
जिसके सर से हो के तूफान गुजर  जाता   है

@  बाबूराम प्रधान
     नवयुग कॉलोनी, दिल्ली रोड,
     बड़ौत (बागपत) उ.प्र.  पिन- २५०६११


बुधवार, 3 अप्रैल 2019

कली चटकी



बाबूराम प्रधान

चमन में  कली  चटकी   है,  बहुत  शर्माती  हुई
सहर से  सबा  चली है  खुशबू  बिखराती  हुई

निखर  आती  है  रग -रग जब आता है  शबाब
चाल भी ख़ुद ब खुद हो जाती  है  मदमाती हुई

मयखाने में आया है साकी का  दीवाना कोई
साकी नाज से लेके चली प्याली छलकाती हुई

उन्होंने दुपट्टे को बना लिया है  परचम अपना
शान से चल  रही हैं  खातून  उसे  लहराती हुई

राह ए मंजिल के निशां कोई  मिटा नहीं सकता
यहीं से गुजरा दीवाना सबा चली गीत गाती हुई
  
सहर-प्रातःशबाब-यौवनमदमाती-मतवालीनाज-नखरे
परचम - ध्वजखातून-महिलासबा-वायु/नाम (संज्ञा)

बाबूराम प्रधान,

नवयुग कॉलोनी , दिल्ली रोड ,बड़ौतजिला - बागपत , उ. प्र.,२५०६११

सोमवार, 25 मार्च 2019

अच्छा है


किसी का ख्याल अच्छा है
किसी का  हाल अच्छा है I

कभी तो  इश्क  में डूबो
किसे मलाल अच्छा है I

कभी जवाब अच्छा है
कभी सवाल अच्छा है I

करिश्मा -  ए- खुदा देखो
पाया जमाल अच्छा है I

ये  हैं रंग मौसम  के
डालों पे माल अच्छा है I

भूख नाचती है  रस्सी  पे
कहें  कमाल  अच्छा  है I

मौहल्ले में नींद हराम है
शादी में धमाल अच्छा है I

@   बाबूराम प्रधान
       नवयुग कॉलोनी दिल्ली रोड 
       बड़ौत (बागपत) उ.प्र. 250611


शुक्रवार, 15 मार्च 2019

जब उसने गजल कही


लफ्ज़ लफ्ज सुना गौर से जब  उसने  गजल   कही
अतीत आंखों से होके गुजरा जब उसने गजल कही

उदास थे जो गुंचे चमन में  फिर  उठा  लिया  है  सर
क़ुछ खुशबू के साथ खिल उठे जब उसने गजल कही

ख्वाबों की दुनिया में था  और  नींद  की  आगोश  में
फिर रोम  रोम  जाग  उठा  जब  उसने   गजल  कही

बहकाया  फुसलाया  बहुत   नुकताचीनों    ने    मुझे
उस पर लगे दाग  झूठे  मिले  जब उसने  गजल कही

पत्थर का टुकड़ा  हंस रहा  था   सोने की आगोश में
था उंगलियों  से झलक  रहा  जब  उसने गजल कही

@ बाबूराम प्रधान
नवयुग कॉलोनी, दिल्ली रोड,
बड़ौत ,(बागपत),उ . प्र . २५०६११

रविवार, 10 मार्च 2019

इश्क़


इश्क़ कितना कमाल करता है,
पल पल को हलाल करता है,
उठें नजरें तो उठी रह जाये,
ये कैसा जादू ज़माल करता है,
अर्श से हूर उतर आये ज़मी पे ,
दिल बार बार सवाल करता है,
चांदनी रात को दो दो माहताब ,
स्याह-ए-शब बड़ा मलाल करता है,
जब उनके लिए दिल में जा नहीं,
फिर क्यों दर पे बवाल करता है।
अर्श- आसमान, स्याह-ए-शब - अँधेरी रात  जा- जग़ह
@बाबूराम प्रधान
नवयुग कॉलोनी ,
दिल्ली रोड़ , बड़ौत (बागपत)
पिन - 250611