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गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

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अनिमा दास



 1.यह भय नहीं... था एक आर्तनाद

आऊँगी... ऐसा कहा था उसने,

किंतु शून्य लेकर आएगी

यह नहीं कहा था।

 

नहीं कहा था कि 

रक्त-मेघों की वृष्टि होगी,

जीवितों को कर्म-ग्रह से 

धर्म-ग्रह पर्यंत की यात्रा में,

इस जन्म की सत्यता 

परिलक्षित होगी... 

नहीं कहा था उसने।

 

सूर्य की भी 

प्रतिछाया जलती रहेगी...

जल के वाह्य स्तर हिमखंड में,

उत्तप्त रहेगा लीन होकर भी...

उस प्रतिछाया में... 

वह उभरती एक 

कुमारी अग्नि कणिका- सी होगी,

यह नहीं कहा था... 

मैं पृथ्वी को उसका 

सौंदर्य पुनः कर प्रदान,

उसका शृंगार करूँगी

यह अवश्य कहा था... 

सुना है मैंने...

सुन रहा था मेरा अंतर्मन...

जब अश्रु- स्रोत में 

दयनीयता बह रही थी,

नीरव वेदना व 

मौन क्रंदन की भिक्षा में,

मूक प्रार्थना में,

विदग्ध रजनी थी...

 

हाँ... उस समय 

वह भी सुन रही थी...

अनंत प्रलय का 

आशीर्वाद भी दिया था उसने...

जब मेरी तूलिका की 

निविड़ एक पीड़ा 

दिगंत स्पर्श कर रही थी...

कर नतमस्तक मैं भी...

महानिद्रा का आवाहन कर रही थी...

मैं उसे सुन रही थी... 

यह भय नहीं... था एक आर्तनाद।

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2. मेरा क्षताक्त इतिहास 

 

आज मैं करती स्मरण

अतीत का,

किस मुहूर्त हुई थी 

काराग्रस्त मैं,

कैसे हुई थी 

मेरी भूमि रक्तरंजित,

शरीर हुआ था शीर्ण

हुई थी ध्वस्त मैं।

 

आज मैं करती स्मरण 

अस्त-अस्मिता का,

क्यों हुआ था मेरा अस्तित्व 

अभिशप्त,

क्यों हुई रचित 

मेरी करुण कहानी,

विध्वंस के नाट्य मंच पर 

कितने घृणित चरित्र

 हुए आविर्भाव।

 

मुझे स्पर्श करते हुए,

 मुझे निर्वस्त्र करते हुए,

मुझे कलंकित करते हुए

मेरे इतिहास को 

क्षताक्त करते हुए...

क्या एक क्षण तुमने 

यह नहीं किया स्मरण,

मैं हूँ तुम्हारी जन्मदात्री

मेरी भूमि पर है तुम्हारा 

समग्र अहं-राज्य...?

इति कविता 

शनिवार, 22 मार्च 2025

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निर्दिष्ट दिशा में (सॉनेट )

अनिमा दास 

सॉनेटियर 

कटक, ओड़िशा 

 


 

एक संकेत सा.. एक रहस्य सा.. काव्य प्रेयसी के घनत्व में 

रहते हो तुम, हे कवि! तुम अनंत रश्मियों का हो एक बिंदु 

नहीं होते जब तुम परिभाषित अनेक शब्दों में.. अपनत्व में 

नक्षत्रों में होते तुम उद्भासित बन संपूर्ण अंतरिक्षीय सिन्धु 

 

मेरे जैसे कई कहते हैं तुम लघु में हो वृहद.. वृहद में अनंत 

जब घन अरण्य में चंचल होती चंद्र-किरण, मैं कहती हूँ 

कविवर के शब्द पंच रूप से हो निस्सृत सप्त अक्षर पर्यंत 

पुनः पंच रूप में होते आबद्ध, मैं उस चित्रकल्प में रहती हूँ 

 

प्रत्येक छंद में संचरित प्राण.. तमस में भी होता आलोकित 

यह प्रकाश.. यह निर्झर..शैलशीर्ष की यह लालिमा समस्त 

करते प्रश्न.. कहो कवि कैसे तुम वर्णमाला को किए जीवित 

क्या ये वही अर्ण हैं, जो तुम्हे किया है पाठक हृदयाधीनस्थ? 

 

तुम्हारे अवतरण से महार्णव की शुभ्र-उर्मियाँ हुईं काव्यमय 

हुई महीयसी, कथा हुई संपूर्णा..प्रस्फुटित हुआ किसलय। 

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

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 1-चुप्पी / रश्मि 'लहर'

  मुझे सपने नहीं आते

रोमांस के

न हॅंसी आती है 

नग्नता पर!

 

मेरे कानों में गूँजती हैं 

चीखें..

युद्ध में अनाथ हुए 

बच्चों की

 

और

सिसकियाँ

वक्षस्थल  ढाँपने को 

प्रयासरत..

अर्ध-जीवित स्त्रियों की।

 मुझे लगता है 

धिक्कारते हैं 

दूर तक बिखरी राख को 

थरथराती  साँसों से छूते हुए बुज़ुर्ग!

 मुझे टीसती हैं 

बिना सपनों की

असंख्य ऑंखें।

 मुझे बहुत बेचैन करते हैं 

उन ऑंखों के 

संघर्षरत.. 

 प्रश्न!

 सुनो..

आजकल 

मुझे 

नींद के साथ-साथ 

सपने भी नहीं आते!

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रश्मि 'लहर' इक्षुपुरी कॉलोनी < लखनऊ -226002

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2-अनिमा दास 

 कुहासा...

  

सबकुछ जैसे कुहासे में 

हो रहा अदृश्य 

नहीं होता आरंभ 

किंतु अंत होता है 

प्रत्येक इच्छा का..

 

इसी कुहासे के आवरण पर 

कई अस्पष्ट अक्षर 

कुछ कहते हुए 

हो जाते हैं विलीन..

मृदुल स्वर्णिम रश्मिओं के 

उष्ण स्पर्श से...

 

कुहासा होता विस्तृत...

यहाँ से...ओ..ओ.. वहाँ तक!!

किंतु नहीं स्पर्श कर पाता 

मन के अतल गह्वर को...

शिथिल अंधकार में 

वाष्परुद्ध होता.. क्षितिज को..

हाँ.. वह क्षितिज..

जो मुझे तुममें तल्लीन होने की 

एक सीमारेखा खींचता है..

 

कोहरे में एक कहानी 

एक कविता.. एक उपकथा 

बिंदुओं में होती विभाजित..

जिसमें पुनः हम 

होते अपरिचित किंतु 

रहते अत्यंत समीप...

इस शीतल सानिध्य में 

दो हंस.. कल्प से कल्प 

करते विचरण...

 क्या है यह कुहासा

 क्या यह एक प्रश्न है?

एक गगनस्पर्शी प्रश्न?

अथवा एक प्रश्न प्रपात?

अथवा प्रश्नों की निहारिका

क्या ग्रहाणुपुंज है अथवा,

है एक विशाल द्रुम-कोटर में 

शायित कोई कालसर्प?

 किंतु इसी कुहासे में 

हम हो रहें निशब्द..

निस्तब्ध...अचेत.. अदृश्य...!!

 

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 3-अनीता सैनी

 1.पाती / 

……

उस दिन पथ ने 

पथिक को पाती लिखी 

बेमानी लिखी न झूठ  

सावन-भादो के गरजते बादल 

सुबह की गुनगुनी धूप लिखी 

मीरा के जाने-पहचाने पदचाप 

 बाट जोहती आँखें 

वही विष  के प्याले लिखे

पनिहारिन के पायल की आवाज़ 

कुछ काँटे कुछ पत्थर लिखे

थोड़े फूल और थोड़ी छाँव लिखी 

और लिखा 

स्मृतियों का पाथेय प्रतीक्षा को

प्रेम के गहरे रंग में रंग देता है 

तुम प्रमाण मत देना

क्योंकि जितनी झाँकती है प्रीत

किवाड़ों और खिड़कियों से 

उतनी ही तो नहीं होती

मौन ने भी लिखे हैं कई गीत 

कई कविताएँ लिखी हैं अबोलेपन ने भी।


2. उदासियाँ  /अनीता सैनी 


मरुस्थल से कहो कि वह 

किसके फ़िराक़ में है?

आज-कल बुझा-बुझा-सा रहता है?

 जलाती हैं साँसें 

भटकते भावों से उड़ती धूल 

धूसर रंगों ने ढक लिया है अंबर को 

आँधियाँ उठने लगीं हैं 

 सूखी नहीं हैं नदियाँ 

वे सागर से मिलने गईं हैं 

धरती के आँचल में

 पानी का अंबार है कहो कुछ पल 

प्रतीक्षा में ठहरे 

बात कमाने की हुई थी 

क्या कमाना है?

कब तय हुआ था?

उदासियों के भी खिलते हैं वसंत 

तुम गहरे में उतरे नहीं, वे तैरना भूल गईं।

….

3. ण्डहर/ अनीता सैनी 


चलन  को पता है

समय की गोद में तपी औरतें 

चूड़ी बिछिया और पायल टूटने से 

ण्डहर नहीं बनतीं  

उन्हें खण्डहर बनाया जाता है

 चलन का 

जूते-चप्पल पहनकर 

घर से कोसों-दूर 

सदियों तक एक ही लिबास में 

अतृप्त...

भूख-प्यास से भटकना 

जल की ख़ोज  

रहट का मौन सूखता पानी  

कुएँ की जगत पर बैठ

उसका 

ण्डहर, ण्डहर … चिल्लाते रहना 

ण्डहर, ण्डहर …का गुंजन ही

उसे गहरे से तोड़कर बनाता है

ण्डहर ।

 

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गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

493

 

सॉनेट/ अनिमा दास 

 

1.स्त्री का स्वर (सॉनेट)

मौनता की भाषा यदि होती..मृदुल -सहज व सरल

द्रुमदल न होते अभिशप्त..आ:! न होता अंत वन का 

न स्रोतवती होती शुष्क,न मेघों में होता अम्लीय जल 

न होता अज्ञात अभ्र में लुप्त एक पक्षी.. मृत मन का।

 

न होती यक्ष-पृच्छा..न मिथ्या विवाद की धूमित ध्वनि 

न कोई करता अनुसरण सदा अस्तमित सूर्य का कभी 

न पूर्व न पश्चिम न उदीची से.. प्रत्ययी पवन की अवनि  

न होती नैराश्य-बद्ध..निगीर्ण ग्लानि में रहते यूँ..सभी।

 

यह जन्म उसी प्राचीन इतिहास का है एक भग्नावशेष 

निरुत्तर निर्मात्री..पुरुष-इच्छा की स्त्री.. मौन-मध्याह्न 

स्वर में नीरव अध्वर..शून्य भुजाओं में अंतिम आश्लेष 

प्रतिक्षण ध्वस्त होते इसके कण-कण,हैं अर्ध अपराह्न।

 

यदि हुई अभिषिक्त यह उर्वि..यदि हुआ नादित अंभोधर 

प्रतिगुंजित होगा अंतरिक्ष में तब अविजित स्त्री का स्वर।

 

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2. प्रेम पर्व (सॉनेट -30)

 

मंदर पर सप्तरंग का आँचल,सखी,आओ उत्सव गीत गाओ

मदमत्त भ्रमर करे पुष्प संग प्रीत..कृष्ण रास संग रच जाओ

मुग्ध मन नृत्य करता.. है स्निग्ध किरणों में सम्पूर्णतः तन्मय

रूप यौवन का हो रहा तीर्ण...गमक रहा... कर रहा अनुनय।

 

प्रेम हो रहा व्यक्त सखी कि रक्तिम हुआ आह!प्राच्य आकाश 

स्वप्नगुच्छ हुआ स्फुटित..शतदल के सरोवर में आया प्रभास

पीत रंग ने किया स्पर्श.. मुखमंडल हुआ स्वर्ण सा अरुणित

मंद-मंद स्वर में कहा प्रेम ने 'सुनो प्रिया तुममें मैं हूँ प्लावित।'

 

इस नगर में नहीं रहा जीवन यदि... स्वर्गीय -संभव- सरल

यदि वसंतकुंज में भी... समस्त पीड़ाएँ रहीं. सदैव जलाहल 

कोई प्रतिवाद नहीं होगा..न होगा मृदु वेणु-ध्वन. न वंशीवट 

दृगोपांत में अश्रुमिश्रित परागरेणु से सिक्त होगा कालिंदी तट।

 

 

प्रेम पर्व की वर्तिका हो रही प्रज्वलित.. जीवन हुआ फाल्गुन 

मन के कोण-अनुकोण में गूँज रही गीतप्रिया की..मधुर धुन।

 

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