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शनिवार, 2 दिसंबर 2017

भारतीय दर्शन परंपरा : सार-संक्षेप

 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री    भारतीय दर्शन परंपरा : सार-संक्षेप  
            विश्वगुरु की उपाधि से विभूषित भारत की सभ्यता जितनी प्राचीन है; उतना ही प्राचीन है यहाँ का दर्शन भी है या ऐसा कहा जाए कि दर्शन यहाँ के मूल में रचा बसा है। संस्कृत की दृश धातु से व्युत्त्पन्न दर्शन शब्द का अर्थ है- देखना- दृश्यते अनेन इति दर्शनम् अर्थात् जिसके माध्यम देखा
जाए वह दर्शन है। इस प्रकार दर्शन सामान्य ढंग से देखना  नहीं अपितु गहन चिंतन का पर्याय है। दर्शन भारतवर्ष के लिए कोई अदभुत क्रिया नहीं अपितु यहाँ के आबालवृद्ध में रचा बसा है। प्राकृतिक संशाधनो के अनुकूलन के कारण मूलभूत आवश्यकताओं की परिधि से उच्च स्तर का बैद्धिक चिंतन प्रारंभ से ही यहाँ के जनमानस में बसा रहा। अर्थात रोटी, कपड़े और मकान जैसी सामान्य सोच का दास यहाँ का जनसामान्य भी नही रहा तो फिर दार्शनिक चिन्तन में निरत महान विभूतियों की तो बात ही निराली है । सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी हमेशा एक मनीषी की भांति चिंतन में व्यस्त रहा। इसी  का प्रभाव है की यहाँ का सामान्य बालक भी नचिकेता के रूप में भी उपनिषद जैसी दर्शन परम्परा का माध्यम बना। आज वेदों, उपनिषदों एवं श्रीमदभगवद्गीता को समस्त विश्व की अनेक भाषाओँ में अनूदित करके उन्हें समझने का प्रयास किया जा रहा है; किन्तु आशचर्यजनक कि इनके मूल में उपस्थित गूढ़ निहितार्थ तक पहुँच पाना आज भी पूर्ण रूप से संभव नही हो सका। विदेशी आक्रमणों में बार- बार यहाँ के ग्रंथो को जलाकर मिटाये जाने पर भी यहाँ के ज्ञान-विज्ञान को समाप्त नहीं किया जा सका। वस्तुत: यह कभी समाप्त किया ही नही जा सकता
              वृक्ष कट-कट कर बढ़ा है, दीप बुझ-बुझ कर जला है”
 कुछ प्रारंभिक प्रश्न ऐसे थे जिनसे दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ जैसे- मैं कौन हूँ, मेरा जन्म किस कारण हुआ, मैं कहाँ से आया, क्यों आया तथा  कहाँ जाऊँगा, इसके कारण मनुष्य यह भी सोचने लगा कि क्या मेरा लक्ष्य भी पशु-पक्षियों के सामान शयन, भोजन और मैथुन ही है या इससे कुछ अलग इन सभी प्रश्नों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रशन था की जीवन के दुखों से मुक्ति का उपाय क्या हो सकता है ये दुःख मात्र मूलभूत आवश्यकताओं से सम्बंधित नही अपितु आत्यंतिक प्रकृति  से सम्बन्धित थे।
             दु:खों के निवारण हेतु प्राकृतिक शक्तियों की उपासना का क्रम प्रारंभ हुआ यही कालान्तर में वेदों की ऋचाओं के रूप में विकसित हुआ। दर्शन की परंपरा को समझना एक गूढ़ एवं जटिल विषय है, और इसके बारे में लिखना इसके विशाल जलनिधि में मात्र एक डुबकी के सामान है, किन्तु सामान्य रूप से समझने हेतु इस लेख में इसे सामान्य ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। पूरे विषय की अपेक्षा करना निरर्थक है; क्योंकि मात्र मुख्य तथ्यों का अतिसंक्षिप्त प्रस्तुतीकरण होगा।
            इस दार्शनिक परंपरा को समझने से पूर्व इसके विषय वस्तु को संक्षेप में जानना अनिवार्य है। उल्लेखनीय है की श्रेष्ठ मानवीय चिंतन दर्शन के तीन अनुभागों की सरंचना करता है- तत्त्व मीमांसा-  सृष्टि के मूलतत्त्व पर केन्द्रित चिंतन; ज्ञान मीमांसा- मूलतत्त्व को जानने की क्रिया अर्थात् ज्ञान एवं उसके साधनों का विश्लेषण तथा नीति मीमांसा- एक सुव्यवस्थित मानव समाज के निर्माण हेतु आचरणगत नियमो का विवेचन। इस प्रकार वेदों एवं तत्जनित तथा उनसे विलग समस्त दर्शन  विभिन्न शाखाओं के रूप में पल्लवित होता चला गया। यह दो प्रकार का था  वेद सिंद्धांतों से सहमत या आस्तिक दर्शन एवं दूसरा वेदों से असहमत या नास्तिक दर्शन। नास्तिक दर्शन तीन हैं- चार्वाक, जैन एवं बौद्ध तथा आस्तिक दर्शन छ: हैं- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा तथा वेदांत। इन्हें षड्दर्शन भी कहा जाता है। 
वेदकालीन परंपरा- ऐसा माना जाता है की भारतवर्ष में अन्यत्र से निवास हेतु आए लोग ,जो आर्य कहलाते हैं उनका यहाँ के मूल लोगों सभ्यता के सम्बन्ध में संघर्ष था। अपनी रक्षा उनसे समन्वय आदि हेतु आर्यों ने विशेष ज्ञान का प्रतिष्ठापन किया। यह ज्ञान देवताओं, स्तुतियों, यज्ञों, सृष्टि संरचना तथा आचारगत नियमन आदि पर केन्द्रित था। उस समय आज के समान प्रिंटिंग के साधन नहीं थे इसलिए यह ज्ञान  गुरु के समीप बैठकर सुनकर प्राप्त किया जाता था । इसे श्रुति कहा जाता था, यह ज्ञान इतने प्रामाणिक स्तर का है की यह भारतीय ही नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव समाज की धरोहर हैं। वेद चार हैं- ऋक, यजु:, साम तथा अथर्व। इनके तीन भाग- मंत्रसंहिता, ब्राह्मण और उपनिषद हैं। अनेक विद्वान इन्हें 6000 ई पू तथा अनेक इसके बाद का मानते हैं; लेकिन इनका काल लगभग १५०० ई पू निर्विवाद रूप से स्वीकार्य है।
पुराणकालीन परंपरा- अठारह पुराण वेदों द्वारा स्थापित भिन्न-भिन्न देवों की शक्तियों पर केन्द्रित, प्रत्येक देव का अद्वितीय शक्ति के रूप में प्रतिष्ठापन का प्रयास है। विश्व की पालन तथा संहार शक्ति का विष्णु-शिव आदि के रूप में यशोगान  विभिन्न पुराणों का केंद्रीय विषय रहा।
उपनिषद् कालीन परंपरा- वेदों का ही ज्ञान उपनिषदों के रूप में आगे बढ़ा।वेदों का अंतिम भाग होने के कारण इन्हें वेदांत भी कहा गया; ये वेदों का सार हैं। उप, नि: एवं सद तीन पदों से मिलकर बने उपनिषद् शब्द का अर्थ है- समीप बैठना- अर्थात ज्ञान प्राप्ति हेतु गुरु के समीप बैठना। उपनिषदों में एक ही तत्त्व के रूप में परम चेतन-ब्रह्म या ईश्वर का चिंतन, सत्य की खोज, ज्ञान की खोज, दुःख का आत्यंतिक निवारण, विशुद्ध आनंद और इसके मार्ग आदि का व्यवस्थित वर्णन है। उपनिषद् संख्या में 108 हैं तथा इनमे से भी ११ उपनिषद प्रमुख हैं, जिन पर शंकराचार्य के भाष्य उपलब्ध हैं। उपनिषदों के ही श्रेष्ठ उद्घोष हैं जो भारतीय जनमानस के चरित्र को उत्त्थान की ओर ले जाने का उद्घोष करते हैं-
                                                असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय  
महाकाव्य कालीन परंपरा- रामायण महाकाव्य एवं महाभारत के युद्ध में श्रीमद्भागवतगीता के द्वारा अधर्म पर धर्म की विजय का उद्घोष करने वाले दर्शन इसी काल के माने जाते हैं। बौद्धिक जागरूकता, स्फूर्ति, आचरण नियमन, दुःख-निवृत्ति, भगवद्भजन, कर्म, ज्ञान एवं भक्ति जैसे श्रेष्ठ मार्ग का प्रतिपादक यह दर्शन विश्व को भारत की अनमोल भेंट हैं। इसका प्रमाण यह है की रामायण एवं श्रीमद्भागवदगीता के विश्व की  विभिन्न भाषाओँ में अनुवाद हो चुके हैं और इन पर निरंतर शोध जारी हैं। 
नास्तिक परंपरा
चार्वाक दर्शन- वेदों का प्रबल विरोध करने वाले एवं भौतिकवाद के मुख्य सिद्धांतो को अपना आदर्श मानने वाले चार्वाक प्रणीत इस मत का मुख्य कथन था- जब तक जिओ इन्द्रिय सुख के लिए जिओ, चाहे ऋण लेकर ही घी पीना पड़े पीओ, मृत्यु के बाद किसने देखा, इस जीवन में खाओ-पीओ और सुख से रहो। यह दर्शन आदर्शात्मक।आचार संहिता के दृष्टिकोण से भारतीय दर्शनों के मौलिक सिद्धान्तों से किसी भी प्रकार मेल नहीं खाता।
जैन दर्शन- जिन” पद से व्युत्पन्न जैन शब्द इन्द्रियों पर विजय प्राप्ति को दु:खों से मुक्ति का मुख्य आधार मानता है। महावीर स्वामी प्रणीत इस दर्शन के समर्थक ईश्वर को नहीं मानते। मात्र अपने मत के प्रवर्तकों को तीर्थंकर कहकर उनकी उपासना करते हैं। सम्यक चरित्र, सम्यक ज्ञान एवं सम्यक दर्शन को आधार मानने वाले जैन दर्शन पांच महाव्रत को मानता है- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह।
बौद्ध दर्शन- जीवन-दु:खो को देखकर वैराग्य की ओर उन्मुख एवं कर्म-उत्कृष्टता पर बल देने वाले महात्मा बुद्ध इस दर्शन के उपदेशक थे। चार आर्य सत्य- हेय (दुःख), हेतु (दुख का कारण), हान- (दुःख निवारण की संभावना) हानोपाय- दुःख निवारण का मार्ग। दुःख- निवारण के साधनस्वरूप अष्टांगिक मार्ग- सम्यक – दृष्टि, संकल्प, कर्मांत, आजीव, व्यायाम, स्मृति तथा समाधि।  
आस्तिक परंपरा
 सांख्य दर्शन- सांख्यसूत्र के रचयिता महर्षि कपिल द्वारा प्रणीत यह दर्शन ज्ञान को दुःख से मुक्ति हेतु आवश्यक मानता है।  इस दर्शन की तत्त्व मीमांसा में दो तत्त्व - प्रकृति (जड़) पदार्थ तथा पुरुष (चेतन पदार्थ या आत्मा) माने गये हैं। तीन प्रकार के दुःख- आध्यात्मिक (शारीरिक-मानसिक रोग से उत्त्पन्न), आधिभौतिक (अन्य प्राणियों- साँप।विच्छू आदि से उत्त्पन्न) तथा आधिदैविक (दैविक आपदा- बाढ़, भूकम्प आदि से उत्त्पन्न) मात्र ज्ञान से ही निवृत्त होते हैं। इसी दर्शन की तत्त्वमीमांसा से योग दर्शन का विकास हुआ। 
योग दर्शन -विश्व में भारतीय दर्शन को गुंजायमान करने वाले योगदर्शन के प्रवर्तक पातंजलयोगसूत्र  के रचयिता महर्षि पतंजलि थे। साधना को जीवन का मुख्य आधार मानने वाले इस दर्शन में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, धारणा, ध्यान एवं समाधि हैं। आज योगदर्शन को आसन आदि सहित स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अपनाया जा रहा है किन्तु इसके विस्तृत नैतिक तथा आत्मिक लक्ष्य हैं। यह दर्शन योगसाधना द्वारा मुक्ति या कैवल्य प्राप्ति को मुख्य लक्ष्य मानता है।  
न्याय दर्शन- न्याय सूत्र के रचयिता महर्षि गौतम इस दर्शन के प्रणेता हैं। इस दर्शन की ज्ञानमीमांसा बहुत ही समृद्ध है। यह प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द प्रमाणों के द्वारा ज्ञान प्राप्ति तथा श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन के द्वारा अपवर्ग या दुःख से मुक्ति की परिकल्पना को प्रस्तुत करता है।
वैशेषिक दर्शन- वैशेषिक सूत्र के रचयिता महर्षि कणाद द्वारा प्रणीत यह दर्शन अणु-परमाणु के सिद्धांत को प्रतिपादित करने के कारण तत्त्व मीमान्सीय दृष्टि से श्रेष्ठ है। इस दर्शन में द्रव्य, गुण तथा कर्म आदि के रूप में सात पदार्थ विवेचित किए गए। यह भौतिक ज्ञान-विज्ञान का दर्शन है।
मीमांसा दर्शन- मीमांसा का अर्थ है- पूजित विचार। जैमिनी सूत्र के रचयिता महर्षि जैमिनी प्रणीत यह दर्शन दुःख निवारण हेतु वैदिक कर्मकांड की पुष्टि करता है; जो तत्त्व तथा धर्म से सम्बन्धित विचारों पर केन्द्रित है। इसमे कर्मकांड द्वारा स्वर्गप्राप्ति के लक्ष्य को मुख्यतः प्रस्तुत किया गया है।
वेदान्त दर्शन- ब्रह्मसूत्र के रचयिता शंकराचार्य प्रणीत यह दर्शन मूलतत्त्व के रूप में एक ही तत्त्व ब्रह्म की विवेचना करता है। एक तत्त्व की व्याख्या के कारन इस दर्शन को अद्वैत वेदांत भी कहा जाता है। वेदांत के अहंब्रह्मास्मि तथा तत्त्वमसि जैसे प्रमुख सिद्धांत हैं। यह ज्ञान द्वारा मुक्ति को जीवन का मुख्य लक्ष्य मानता है।
            इस प्रकार जीवन को दुःख से मुक्त करने हेतु भारतीय दर्शन परंपरा में अनेकानेक समृद्ध शाखाएँ विकसित हुई। ये दर्शन भारतवर्ष ही नहीं विश्व को भी ज्ञान-विज्ञानं का मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी।  उल्लेखनीय है की मात्र ये शुष्क ज्ञान की बात ही नहीं करती हैं; अपितु व्यक्ति को जीवन जीने की कला सिखाती हैं। इन दर्शनों का विधिवत् अध्ययन तथा इनमे प्रतिपादित तथ्यों का अनुगमन मानव मात्र हेतु आवश्यक है इसलिए धर्मं, जाति, संप्रदाय तथा राष्ट्रीयता जैसी परिधियों से ऊपर उठकर दर्शन को आत्मकल्याण हेतु समझना चाहिए।    

-0-राष्ट्रीय महासचिव उन्मेष,हे०न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड
ई मेल- mrs.kavitabhatt@gmail.com

रविवार, 26 नवंबर 2017

‘तमसो मा ज्योर्तिगमय’

तमसो मा ज्योर्तिगमय
-डॉ0 कविता भट्ट
(राष्ट्रीय महासचिव, उन्मेष,हे000गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

प्रकाश का पर्व ‘दीपावली’ अर्थात् ‘दीपकों की पंक्ति’ पुनः-पुनः एक वर्ष के अन्तराल पर  उपस्थित होता है। इस पर्व को मनाने के मूल में उपस्थित यों तो अनेक मान्यताएँ हैं; किन्तु मुख्य मान्यता यह है कि ‘अनैतिक गतिविधियों के प्रतिनिधि रावण’ पर ‘नैतिकता के प्रतिनिधि राम’ अपनी विजयोपरान्त जब स्वदेश अर्थात् अवधपुरी लौटे तो उनके स्वागत में दीपकों की पंक्तियों अर्थात् ज्योतिमालाओं से सभी मार्गों और घर-चौबारों को सजा दिया गया था। यद्यपि उस रात आमावस्या थी; किन्तु अवधनगरी के नागरिकों ने अनैतिकता पर नैतिकता की विजय की प्रतिस्थापनास्वरूप उस काली रात को पंक्तिबद्ध ‘दीपकों’ या ‘ज्योतिपुंजों’ द्वारा प्रकाशोत्सव में परिवर्तित कर दिया। प्राकृतिक पकवान-मिष्ठान्न आदि वितरण एवं नृत्य-गायन आदि के साथ हर्षोल्लास मनाया गया।  ऐसा माना जाता है कि यह परम्परा तब से अभी तक निर्बाध रूप से गतिशील है। वस्तुतः यह पर्व मात्र एक बाह्य या सामाजिक अंधानुकरण नहीं; अपितु इसके मूल में गहन नैतिक संदेश है; किन्तु आज हम इस संदेश को भूलकर मात्र बाह्य प्रकाश के संसाधन एकत्र करने में व्यस्त हैं- अब किंचित् ही दीपक दिखते हैं; दीपक और मिष्ठान्नों का स्थान ले लिया अधिकाधिक मुनाफे का पर्याय मिलावटी मिठाइयाँ, लड़ियाँ-बल्ब-हेलोजेन लाइट्स-आतिशबाजी आदि न जाने क्या-क्या। जितने अधिक ये संसाधन होंगे- स्टेटस उतना ही बड़ा; जबकि ये सभी पर्यावरण को अथाह हानि पहुँचाते हैं।  साथ ही स्टेटस के संसाधनों को जुटाने हेतु जो अनैतिक गतिविधियाँ हम अपनाते हैं; वे वैयक्तिक एवं सामाजिक अहित के मूल कारण हैं। हम बाहरी जगमग में खो गए; जबकि आन्तरिक रूप से हम अनैतिकता के गहन अंधकार में भटक चुके हैं। दीपावली का अभिप्राय बाह्य प्रकाश के संसाधन कदापि नहीं; इसका प्रयोजन तो आत्म-प्रकाश है।
भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के मूल में वेद एवं उपनिषद् साहित्य के संदेश हैं और साररूप में ये जीवन की कला एवं विज्ञान दोनों ही हैं। ‘असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतंगमय।।’ अर्थात् ‘हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो; अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो और मृत्यु से अमरत्व’ की ओर ले चलो जैसे आध्यात्मिक एवं नैतिक संदेशों से भारतीय वाङ्मय भरे पड़े हैं। इस सभ्यता ने हमेशा ही नैतिकता को जीवन का मूल आधार माना; किन्तु प्रश्न यह भी है कि वर्तमान परिदृश्य में भारतीय सभ्यता क्या अपने इन मूल मन्त्रों से भटक चुकी है? या भौतिक मोहपाश के कीच में आकंठ निमग्न हो चुकी है। यह प्रश्न इसलिए प्रासंगिक है; क्योंकि विगत कुछ वर्षों से संसार के मानचित्र पर भारतवर्ष भ्रष्टाचार के पहाडस्वरूप खड़ा है। यह कोई मिथ्या नहीं; स्वयंसिद्ध है; यद्यपि भ्रष्टाचार उन्मूलन के नाम पर नई-नई सरकारें बन जाती हैं; तथापि प्रश्न वैसे ही खड़ा है कि क्या बिना आत्मविश्लेषण के भ्रष्टाचार या अनैतिकता का उन्मूलन सम्भव है। प्रत्येक व्यक्ति समाज में व्याप्त विसंगतियों एवं अनैतिक गतिविधियों का विश्लेषण करता है; किन्तु स्वयं को उस विश्लेषण से विलग रखकर।
प्रश्न यह है कि भारतीय संस्कृति के आत्मस्वरूप ये पर्व क्या मात्र चार्वाक् दर्शन के अनुगमन का प्रतीक बन गए हैंकिन्तु पारम्परिक रूप से भारतीय संस्कृति के मूल में उपस्थित इन पर्वों के नैतिक प्रतीकीकरण से हमने अन्धकार पर कितनी विजय प्राप्त की? यह अत्यंत जटिल प्रश्न है। आइए विश्लेषण करते हैं; इन प्रश्नों के मूल में उपस्थित कारणों एवं उनके सार्वभौमिक निवारण का।
ध्यातव्य है कि विश्लेषणात्मक दृष्टि से ‘दीपावली’ देहगत अन्धकार को आत्मज्ञान के प्रकाश से दूर करने का एक रूपक है। ‘दीपक’  या ‘ज्योतिपुंज’ प्रतीक है- सार्वभौमिक हितों हेतु वैयक्तिक हितों के बलिदान का। यह प्रतीक है- स्थूल या भौतिक परिधियों का उच्छेदन करते हुए चैतन्य के विविध स्तरों को पार करते हुए आत्मचैतन्य के परमचैतन्य में सम्मिलन का।माटी का दीपक मात्र ज्योतिपुंज नहीं होताज्योतिपुंज में तीन संघटक होते हैं- रूई की बाती, तेल एवं माटी का दीपक। दार्शनिक विश्लेषण के अनुसार मानव के व्यक्तित्व की तुलना भी दीपक से की गई है। जिस प्रकार ये तीनों मिलकर ज्योतिपुंज को तैयार करते हैं; उसी प्रकार मानव व्यक्तित्व में त्रिगुण अर्थात् सत्त्व, रजस् एवं तमस् की परिकल्पना आयुर्वेद के साथ ही उपनिषदों, सांख्य, योग तथा गीता आदि दर्शनशाखाओं में की गई है। सत्त्वगुण परोपकार, ज्ञान, प्रकाश, विवेक, नैतिकता, यथोचित निर्णय, सकारात्मकता, शान्ति तथा सद्गुणों का प्रतिनिधि है। रजस् गुण क्रियाशीलता, साहस के साथ ही स्वार्थ, काम, क्रोध, मद, लोभ तथा मोह आदि का प्रतिनिधि है। तमस् गुण अविवेक या अज्ञान, अन्धकार, आलस्य तथा निद्रा आदि का प्रतिनिधि है। इन गुणों का परस्पर विरोध चलता रहता है और जब व्यक्ति पर जो गुण प्रभावी होता है; उसी की परिणति दैनिक क्रिया-कलाप में होती है। यदि तमस् प्रभावी हो तो अविवेक एवं आलस्य से युक्त होकर व्यक्ति नकारात्मक गतिविधियों का स्वामी होता है। यदि उसके साथ ही रजस् की अधिकता इस अज्ञान के साथ मिलकर व्यक्ति को अहंकारी एवं निरंकुश बना देती है। वह अपने व्यक्तित्व में उपस्थित आत्मतत्त्व को भूलकर मात्र सांसारिक एवं भौतिक सुख-सम्पन्नता हेतु समस्त अनैतिक गतिविधियों में लिप्त हो जाता है। इन दोनों ही गुणों का अस्तित्व तो रहेगा ही और रहना भी चाहिए क्योंकि व्यक्ति को आजीवन क्रियाशील रखने हेतु रजस् आवश्यक है। साथ ही जब कार्य करते-करते व्यक्ति थक जाए, तो उसे मनोशारीरिक विश्राम चाहिए। इसके लिए तमस् का अस्तित्व आवश्यक है। इन दोनों गुणों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता; किन्तु व्यक्तित्व पर इनका अतिप्रभाव एक अस्वस्थ, अनैतिक एवं असंतुलित व्यक्तित्व हेतु उत्तरदायी है। अतः इन गुणों के यथोचित नियमन हेतु व्यक्तित्व को सत्त्व गुण की अधिकता द्वारा निर्देशन मिलना आवश्यक है। तभी व्यक्तित्व स्वस्थ, नैतिक एवं संतुलित होगा। जितना सत्त्व अधिक होगा; व्यक्ति उतना ही आत्मतत्त्व के निकट होगा और उतना ही अधिक नैतिक होगा।    
सत्त्व का रंग श्वेत, रजस् का रंग लाल एवं तमस् का रंग काला माना गया है। अब थोड़ा दीपावली की दीपज्योति के रंग पर ध्यान देना चाहिए और इस सन्दर्भ में त्रिगुणों को समझना चाहिए। ज्योति को ध्यान से देखने पर इसमें प्रकाश की तीन परतें दृष्टिगोचर होती हैं। सबसे भीतर काली, उसके बाहर लाल एवं सबसे बाहर या ऊपर शुभ्र वर्ण ,जो अपने चारों ओर व्याप्त कालिमायुक्त अन्धकार को अपने वर्ण में रंजित कर प्रकाश का स्फुरण करता है। इसकी तुलना यदि व्यक्तित्व में उपस्थित त्रिगुणों से करें तो यह समझा जा सकता है कि व्यक्तित्व को प्रकाशमान बनाये रखने हेतु सत्त्व को प्रभावी करने के उपक्रम आवश्यक हैं।
त्रिगुण सिद्धान्त के साथ ही व्यक्तित्व की एक और विवेचना जो उपनिषद् साहित्य में प्राप्त होती है; उसे समझना भी यहाँ प्रासंगिक है। भारतीय दर्शन की अधिकतर शाखाओं द्वारा भी जिसे यथारूप स्वीकृति दी गई है; वह है- व्यक्तित्व की पंचकोशीय अवधारणा। व्यक्तित्व की पांच स्तर माने गये है; जो आत्मतत्त्व या चैतन्य के ऊपर प्याज की परतों की भाँति एक दूसरे को आवृत्त किए हुए हैं; इन्हें पंचकोश कहा जाता है। हमारे व्यक्तित्व में आत्मतत्त्व सबसे भीतर चैतन्यस्वरूप है जो ब्रह्मांडीय या सार्वभौम चेतना या परमचेतना का ही एक अंश है। ऐसा माना गया है कि इसके सबसे निकट आनन्दमय स्तर या कोश एक परत के रूप में है। साथ ही आनन्दमय के बाहर विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय तथा अन्नमय कोश भीतर से बाहर की ओर क्रमशः एक दूसरे के ऊपर हैं। जो सबसे बाहरी है और हमें दिखाई देता है; वह स्थूल शरीर है। समस्त अंग-प्रत्यंग-ज्ञानेन्द्रियाँ-कर्मेन्द्रियाँ आदि इसी का भाग हैं और आत्मचैतन्य के अभाव में यह स्थूल शरीर नितान्त जड़ हैं। अतः इस पर तमस् गुण प्रभावी है। जैसे-जैसे व्यक्तित्व का आन्तरिक कोशों की यात्रा करते हैं; वैसे-वैसे तमस् का प्रभाव न्यून होने लगता है। अन्नमय का नियमन प्राणमय तथा प्राणमय का नियमन मनोमय कोश करता है। प्राणमय एवं मनोमय कोशों में रजस् गुण का आधिक्य होता है। ये विज्ञानमय कोश द्वारा नियन्त्रित होते हैं। विज्ञानमय तक आते-आते रजस् एवं तमस् का प्रभाव कम होने लगता है तथा सत्त्व का प्रभाव बढ़ने लगता है। विज्ञानमय को आनन्दमय कोश अनुशासित करता है; जो नितान्त सात्त्विक होता है। आनन्दमय कोश आत्मप्रकाश से युक्त एवं सत्त्वगुण से युक्त होने के कारण व्यक्ति को सकारात्मक एवं विवेकी बनाता है। इसके भीतर आत्मतत्त्व या विशुद्ध चैतन्य है; जो निर्गुण है। इस प्रकार आत्मतत्त्व किसी भी गुण के प्रभाव में न होने  के कारण तटस्थ द्रष्टा है। यह सांसारिक गतिविधियों को एक दर्शक की भाँति देखता है। यह व्यक्ति को उचित-अनुचित तथा नैतिक-अनैतिक आदि प्रतिलोमों में भेद का दिग्दर्शन करवाता है; किन्तु इन्द्रिय-सुख में लिप्त व्यक्ति को इस द्रष्टा के निर्देश को नहीं मानकर अपने मन एवं शरीर की सुनता है। शरीर तमस् गुण प्रधान एवं इन्द्रिय-सुखों का कारक है। मन रजस् से युक्त होने के कारण अति चंचल है। अतः ये दोनों ही सत्त्व पर प्रभाव जमाकर नैतिक दृष्टिकोण को प्रस्फुटित नहीं होने देते। व्यक्ति को स्वार्थ, काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, अज्ञान तथा अन्धकार आदि नकारात्मकताएँ अपने वश में कर लेती हैं। 
इन्द्रिय-सुख अर्थात् आँख, जीभ, त्वचा, नाक तथा कान को अनुकूल संवेदनाओं क्रमशः सुखद रूप, स्वाद, स्पर्श, गन्ध तथा शब्द का मोहपाश बाँधे रखता है। यह बन्धन इतना जटिल है कि मनुष्य इसके लिए असीम अनैतिक कर्म करता है। समस्त अनियमितताओं एवं भ्रष्टाचार का मूल यह इन्द्रिय-सुख ही है। हम सर्दी में गर्म से गर्म कपड़े तथा वातानुकूलित कक्षों का प्रयोग करना चाहते हैं। गर्मी में अधिक से अधिक वातानुकूलन प्रयोग करते हैं। यह मात्र एक उदाहरण है; ऐसे ही अन्यान्य सुख हम चाहते हैं। परिग्रह (आवश्यकता से अधिक धन-सम्पदा-भौतिक संसाधनों) को जमा करते हैं; ताकि सदैव सुखद इन्द्रियों संवेदनों से युक्त रह सकें। उस सुख के अतिरिक्त हम कुछ भी सोचने-समझने की स्थिति में नहीं रहते; क्योंकि तमस् का अन्धकार इतना अधिक प्रभावी होता है कि सत्त्व का प्रकाश असहाय स्थिति में होता है। आधुनिक परिदृश्य में यही हुआ- स्वार्थ, काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, अज्ञान तथा अन्धकार आदि नकारात्मकताओं ने व्यक्ति को अपने वश में कर लिया। स्वार्थ से अधिक सोचने एवं समझने की स्थिति में वह है ही नहीं।
 श्री अरविंद व्यावहारिक स्तर पर चेतना की चार अवस्थाओं को स्वीकार करते हैं। चेतना की पहली अवस्था, तामसिक, दूसरी राजसिक, तीसरी सात्त्विक एवं अन्तिम या चौथी निर्गुण है। तामसिक एवं राजसिक अवस्था में व्यक्ति इन्द्रिय-सुख एवं आज में विचरण करता है, यह अज्ञान, अंधकार, काम, क्रोध तथा मोह आदि से युक्त है। ध्यातव्य है कि यह तमस् के प्रभाव में होते हुए भी आंशिक रूप से सत्त्व का प्रकाश पड़ते ही ज्ञान की खोज में समर्थ है। यह आन्तरिक ज्ञान-दीप्ति तथा अज्ञानमय मन के आत्मिक चेतना द्वारा रूपान्तर से ही सम्भव है।  यह ज्ञान की व्यावहारिक अवस्थाएँ हैं; किन्तु आत्मचैतन्य या आत्मज्ञान की अवस्था इन सबसे अधिक व्यापक है। वह आत्मचैतन्य के सर्वाधिक निकट आनन्दमय कोश में अवस्थित होती है। जब सत्त्वगुण प्रभावी होता है इसकी प्राप्ति तभी सम्भव है। जब तक सांसारिक क्रिया-कलापों में निमग्न हैं; तब तक ज्ञान की इसी अवस्था तक पहुँचा जा सकता है। आत्मचेतना के परमचेतना में सम्मिलन हेतु इससे भी उच्चतम अवस्था अपेक्षित है। वह तो नैतिकता-अनैतिकता की सीमाओं से परे निर्गुण एवं निर्विकार अवस्था है। वह आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में विवेच्य है; किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से सात्त्विक ज्ञान की अवस्था तक पहुँच सकें तो वैयक्तिक एवं सामाजिक उत्थान सम्भव है।
जब यह ज्ञान हो जाता है; तो व्यक्ति स्वयं ही ‘ज्योतिपुंज’ बन जाता है; बाहर अन्धेरा है या प्रकाश; उससे वह प्रभावित नहीं होता। ये सकारात्मक प्रवृत्तियाँ ही राम जैसे विराट व्यक्तित्व को जन्म देती हैं। इतिहास साक्षी है कि राम ने युद्ध यदि मात्र सीता को शारीरिक रूप से प्राप्त करने हेतु किया होता तो वे एक धोबी के कहने पर उसे त्यागते नहीं। अतएव राम एक सन्देश है; वैयक्तिक हितों का सामाजिक हितों के लिए त्याग; और उसी सन्देश हेतु ‘ज्योतिपुंज’ से प्रकाशित ‘दीपावली’ मनायी जाती है। इसके लिए आवश्यकता है; व्यक्तिगत स्वार्थ की परिधियों को तोड़ते हुए तमस् एवं रजस् धीन हुई अपनी वैयक्तिक चेतना को स्वतन्त्र एवं उन्मुक्त करने की। अन्यथा प्रत्येक व्यक्ति में नकारात्मकता अर्थात् रावण ही निवास करेगा। यदि राम बनना है तो अधिकारभाव को छोड़कर मात्र कर्त्तव्यभाव से कर्म करना। तभी सत्त्व प्रभावी होगा और हमारा व्यक्तित्व ज्योतिपुंज के समान बन सकेगा; जो मानवता को अनन्तकाल तक प्रकाशित करता रहेगा।
          लोकतन्त्र का सिद्धान्त है- समाज के सर्वाधिक उपेक्षित नागरिक की समस्या को भी गम्भीरता से सुनना और उसका समाधान करना। ‘राम’ ने राजतन्त्र में लोकतन्त्र का सिद्धान्त अपनाया और आज लोकतन्त्र में भी राजतन्त्र अपनाया जाता है। इसी की परिणति भ्रष्टाचार में होती है। ‘राम’ का स्वागत उनके विराट व्यक्तित्व के कारण की गयी और ज्योतिपुंज के रूप में उनके सद्गुणों का प्रतीकीकरण किया गया। जो स्वयं प्रज्ज्वलित होकर तथा ताप सहकर दूसरों के लिए प्रकाश प्रसारित करे। आइए- इस दीप-पर्व पर संकल्प लें कि हम सभी ऐसा ही दीपक बनकार ज्योतिपुंज रूपी राम बनें। ताकि हमारा अस्तित्व सुखद हो दुःखद नहीं; आइए प्रार्थना करें-
तमसो मा ज्योतिर्गमय।।’
 ‘तमसो मा ज्योर्तिगमय
-0-