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गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

481

 चैत की रात  /  नंदा पाण्डेय

 


चैत की रात का उत्साह ऐसा कि

बिना किसी अनुष्ठान के उसने

अपनी अतृप्त कामनाओं में

रंग भरने का निश्चय कर लिया

 

आज पहली बार

आँगन में बह रही

पछुआ हवा के विरुद्ध

जाकर वह

अपनी तमाम दुविधाओं को

सब्र की पोटली में बाँधकर

मौन की नदी में गहरे गाड़ आई

 

बहा आई आस्थाओं, संस्कारों,

परम्पराओं और नैतिकताओं के उस

भारी भरकम दुशाले को भी

जिसे ओढ़ते हुए उसके काँधे झुकने लगे थे

 

ढिबरी की लाल-लाल रोशनी

और ढोल मंजीरों की आवाजों के बीच

सबसे नजरें बचाकर

अपने वक्ष में गहरे धँसी सभी कीलों को

चुन-चुनकर उखाड़कर फेंकती गई

अंत कर  दिया उसने अँधेरों के प्रारम्भ को ही

 

अब आँगन का मौसम बदल गया

टूटी हुई वर्जनाओं और मूल्यों की

 रस्साकसी में खींचते

सदियों से उजड़े उस आँगन

की रूह आज फिर से धड़क उठी थी

 

वर्षों से जो ख्वाब !

उसकी बंद मुठ्ठी में कसमसा रहे थे

अब उमें पंख उग आये हैं...!

-0-राँची

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

220-मन का द्वार

 गढ़वाली  में अनुवाद :  ,डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

1-सुदर्शन रत्नाकर

1


स्वर्ण कलश 

सजा आसमान में 

भोर हुई तो।

 

सोना कु घौड़ू

सजी ग्याई द्योरा माँ

बिन्सरी ह्वे त

2

चाँदनी रात 

खिली मधुमालती 

दूध-केसर।

 

जुनाळि रात

खिली मधुमाळती

दूध -केसर

3

तुहिन कण 

गिरते दूब पर 

ज्यों मोती बन।

 

ओंसा क बुन्द

दुबला माँ पड़िन

मोती बणिन

4

ताल सज़ा है 

खिले लाल कमल 

छुपा है जल।

 

ताल सज्यूँ च

खिल्यन लाल कौंळ

लुक्यूँ च पाणी

5

अम्बर थाल 

ओढ़े चाँदनी शाल 

धरा मुस्काई

 

द्योरै थकुली

ओढ़ि जुनाळि पाँख्लु

पिर्थी हैंसी गे

6

रात रोई थी 

धरती ने समेटे 

उसके आँसू।

 

रात रूणि छै

पिर्थी न समोख्यन

वीं का इ आँसु

7

रास्ता है देती 

दूब सिर झुकाती 

मिट न पाती।

 

बाठु च देणु

दुब्लू सीस झुकौंदु

मिटदु नि च

8

धरा ने ओढ़ी 

ज्यों पीली चुनरिया 

सरसों खिली।

 

पिर्थी न ओढ़ि

जन पिंगळी चुन्नी

लय्या खिली गे

9

धूप ज्यों सोना 

खिला अमलतास 

मेरे अँगना।

 

घाम सोनु सि

खिली अमलतास

म्यारा चौक माँ

10

चुप खड़े हैं।

ढाक-अमलतास 

रोके ज्यों साँस।

 

चुप्प खड़न

पलास अमल्तास

रोकी कैं साँस

11

सिन्धु लहरें 

करें अठखेलियाँ 

चाँद बुलाए

 

समोद्री लैर

कन्नीन खेल बोल

जून बुलौणि

12

सागर जल

दूर तक विस्तार

फिर  भी प्यास।

 

समोद्र पाणी

दूर तकैं फैलास

फीर बी तीस

-0-

2-नन्दा पाण्डेय

1.


मन का द्वार

बन स्मृति उत्सव

खींचता ध्यान

 

मन कु द्वार

बणि खुदौ तिवार

खैंचदु ध्यान

2

याद तुम्हारी

प्रतिपल नूतन

स्पंदन रत

 

खुद तुमारी

घड़ि-घड़ि नैं बल

गिडारु जन्न

3

बच्चों की आँखें

खोजती रही चाँद

नींद माँगते

 

बाळौ का आँखा

खुजौणा रैं जून

निन्द माँगणा

-0-