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सोमवार, 24 दिसंबर 2018
97
डॉ
.
कविता भट्ट
दिल को खूँटी पर लटका
,
दिमा
ग़
खूब चला
मोहरे।
जीने के लिए मिली थी
,
ज़िन्दग़ी शतरंज बन ग
ई
।
दिन-रात
,कभी
शह
,कभी
मात
,
इस हाथ
,
कभी उस हाथ।
जिंदादिली को मिली थी
,
जी नहीं
सकी,
रंज बन ग
ई
।
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