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लेखन-रजतजयंती पर
आना तू आना प्रिय! / डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
आना तू आना प्रिय!
मुट्ठी भर गर्मी लेकर
मेरे अधर की मंद स्मित
जीवन के बीहड़ में
विलीन होने से पूर्व
विरह सिसकती निशा में
शून्य होती दृष्टि दिशा में
आना तू आना इस शिशिर
मुट्ठीभर गर्मी लेकर
शरद जो निष्क्रिय सा
खड़ा है पाने को उत्साह
हटाना तू कुहासे की परत
उष्णता जो करती है प्रसार
असीम ऊर्जा का;
कैसे और किसको व्यर्थ बताना
यह वासना नहीं; अपितु
आत्मीय भाव से पूर्ण प्रेम
जग की रीति क्या जानेगी
विद्युत की प्रबल तरंगों- सा
उन्मुक्त उन्नत उदात्त
आया तू आया
आह! चम्पा का फूल लिये
सुंदर फूल जो सजाना है तुझे
मेरी उन्मुक्त उलझी- सी घुँघराली
लटों में
आया तू आया प्रिय!
मुट्ठी भर गर्मी लेकर
12-11-2025
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डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
राजमार्ग को लगा
मैं गाँव के कपोलों पर लिख
सकता हूँ
अनंत जीवन, प्रसन्नता और सपने
गाँव की मुस्कान को
मैं ऐतिहासिक गीत में परिवर्तित
कर दूँगा
स्वर लहरियाँ गूँजेगी
मंदिर की घंटियाँ
घोलेंगी मधुमिश्रित शांति
खेतों में लहलहाएँगी
धान, सरसों, कोदू, कौणी
पंचायती चौंतरे पर हुक्के
गुड़गुड़ाएँगे
पशुकुल की गलघंटियाँ खनकेंगी
थड़िया, चौंफलें और मंडाण
घोलेंगे वातावरण में जीवंतता
मदमाती बालाएँ खिलखिलाती
गाँव में विचरण करेंगी
साड़ियों के पल्लू लहराते
हुए।
छुटके खेलेंगे पिट्ठू - राज
- पाट - गारे
जाने क्या - क्या और भी
पंचायती विद्यालय में
पहाड़े रटने के स्वर
गूँजेंगे गगनभेदी नारे
स्वतंत्रता दिवस पर-
“भारत माता की जय”
गणतंत्र दिवस होगा
विशेष लड्डुओं के डिब्बों
से मीठा
रंग- बिरंगे सपने लिये
राजमार्ग बढ़ा गाँव की ओर
लेकिन यह क्या
उसके पहुँचने से पहले ही
गाँव अंतिम साँसें गिन रहा
था
उसकी बूढ़ी हड्डियाँ मरणासन्न
थी
अब आए हो, जब मेरा यौवन हो चुका विदा
अब नहीं बचूँगा, कितना भी औषध करो
किंतु फिर भी
राजमार्ग ने आँखों की चमक
नहीं खोई
बोला, “सच करूँगा तुम्हारे सपने
क्योंकि मुझे बताया गया है
और सच है
'भारतमाता ग्रामवासिनी!'
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चम्पा के फूल
डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
प्रेमी ने बाहें फैलाते
हुए कहा -
सुनो सुनैना
मैं बाहर खड़ा हूँ
हाथों में
कुछ चंपा के फूल लिये
हुए,
फूल जो तुम्हारी घुँघराली
लटों पर
सजकर इतराना चाहते हैं,
फूल जो विश्वास दिलाना
चाहते हैं-
कि प्रेम ऐसा भाव है,
जो अगाध है, अनंत है:
आओ इन फूलों को विश्वास
दिलाओ
कि ये तुम्हारे पावन
प्रेम के योग्य हैं।
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भूरी पुतली- से बादल / डॉ. कविता भट्ट
आएँगे कब और कैसे बादल
बरखा की बूँदों को लेकर
शीतलता के घरौंदों को लेकर
चुभती धूप का अनुभव भुलाने
काली घनघोर दिशाओं को सहलाने
आएँगे कब और कैसे बादल
रेशम का सा ओढ़े आँचल
सम्भवतः स्पर्श हुआ मलमल
बेला साँझ की सुरभित स्वप्निल
घुमड़-घुमड़ और मचल-मचल
लाएँगे कब और कैसे बादल
पेड़ों की सरसराती पत्तियों
पर
चाँदी की चमकती बूँदें
बिखेरकर
अपने कोमल तन को पिघलाकर
जल लाएँगे कब और कैसे बादल
कभी-कभी तो तरसा जाते हैं
मेरे मन को चोल़ी पंछी-सा
भीगे स्पर्श की कल्पनाएँ
लेकर
मेरे मन को कल्पनाओं को
साकार कर
आएँगे कब और कैसे बादल
किसी रूपसी के काले केशों-से
किन्हीं नैनों के सुन्दर
काजल-से
और भूरी पुतलियों के कजरारे
आभास से
भूखण्डों के नीले पर्वत-
शिखरों पर
जलधारा के श्वेत सोते
लाएँगे कब कहाँ से बादल
ब्रज अनुवाद- रश्मि
विभा त्रिपाठी
ऐहैं कबुक अरु काहिं बदरा
मेहा की बूँदनि लै
सियराई के घरौंदनि लै
कुचति घाम कौ अनुभव बिसराइबे
कारी घनघोर दिसनि सहराइबे
ऐहैं कबुक अरु काहिं बदरा
रेसम कौ सौ ओढ़ैं अँचरा
जु पै अनछुयौ भयौ मलमल
संझा बिरिया गमकति सपुने नाई
घुमड़ि घुमड़ि अरु आरि करत
ल्यावैंगे कबुक अरु काहिं बदरा
रूखनि की सरसरावति पातिनि पै
रूपे की चमकति बुँदियाँ बगराइ
अपुने अल्हर आँगु कौं टिघराइ
जल ल्यावैंगे कबुक अरु काहिं बदरा
कभऊँ कभऊँ तौ तरसाइ जावत
मोरे हिय कौं चोली पच्छी सौ
भींजे परस की कल्पना लै
मोरे हिय की कल्पना कौं साकार करि
ऐहैं कबुक अरु काहिं बदरा
काऊ रूपसी की कारी अलकन नाई
कोऊ नैननि के सुघर अंजन नाई
अरु भूरी पुतरिन के कजरारे आभास नाई
भू खण्डन की लीली परबत चोटिनि ऊपर
जलधारा के सेत सोता
ल्यावैंगे कबुक किततैं बदरा।
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डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
मेरे भीतर उतर आई हो
कहीं जैसे;
करने को आतुर हों
अनन्त यात्रा
मेरी आत्मा तक
उसकी आँखें
यों देख रही हैं
एकटक मुझे
भीतर से भीतर तक
अभी तो स्पर्श भी न किया
फिर ये कैसा जादू है!
डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
(ऊपर वाले लिंक को क्लिक करके गुजराती अनुवाद भी देख सकते हैं। )
मूल: डॉ.
कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
आजु ई आँखीं
टोहइ करिन बाटि तुम्हरी
पलकन का तोपि
बूड़इ करिन सपनन माँ तुम्हारइ
आजु हमरे ई कान
अहकि गे आरा तुम्हार श्रवनइ का
मीठ हाँसी मीठ बैना तुम्हरे श्रवनइ का
आजु हमरा ई चोला
छँउकान अस तलफि गा
परस तुम्हार लहइ का
आजु क्यार यू दिनु
सून कातिक कै लम्बी राति अस
ज्याठ कै गरमी अउर भदउँहाँ बरसाति अस
आजु यू हिय
तुम्हरे लाम ते भा बेकल केतना
तुम्हरे खातिर अहकिस केतना
चरका दइकै संघ छाँड़ि गा
अउर तुम्हरे सन हुइ गा।
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आज ये मन- डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
आज ये आँखें
देखती रही राह तुम्हारी
पलकें मूँदकर डूबी रही सपनों में
तुम्हारे
आज मेरे ये कान
तरस गए आहट तुम्हारी सुनने को
मीठी हँसी मीठे बोल तुम्हारे सुनने को
आज मेरा ये तन
अतृप्त सा तड़प गया
स्पर्श तुम्हारा पाने को
आज का ये दिन
सूना-सूना कार्तिक की लम्बी रात सा
जेठ की गर्मी और भादों की बरसात सा
आज ये मन
हो गया कितना विकल दूरी से तुम्हारी
तरसा कितना खातिर तुम्हारी
धोखा देकर छोड़ गया मेरा साथ
और साथ तुम्हारे हो गया।
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