शनिवार, 12 सितंबर 2026

522

 महिमा अपरम्पार / शशि पाधा


प्रथम गुरु थे मात-पिता 

जिनसे पाया जीवन दान 

संस्कार मिले थे घुट्टी में 

और मूल्यों का वरदान


पिता सिखाते  रीत नीत

 माँ करती  लाड़ प्यार  

नमन उन्हें जो सदा थे मेरे 

जीवन का आधार 


ध्रुव तारे से गुरु हमारे 

अँगुली थाम चले 

संशय दुविधा बाधा में 

गुरुज्ञान की ज्योत जले 


माटी की मूरत को जैसे 

गढ़ता है कुम्हार 

ज्ञान की छैनी से गुरुओं ने मुझको दिया  सँवार


मोती मानक जैसे 

 मेरे गुरुओं के उपदेश 

पग- पग मार्गदर्शन करते 

उनके हर आदेश 


नित्य भोर का सूरज जैसे 

 दूर करे  अँधियार 

ज्ञान की ज्योत जलाकर 

गुरुजन करते हैं उपकार


 देव सरीखे गुरुजन की महिमा अपरम्पार

 नतमस्तक हो नमन करूँ मैं उनको बारम्बार 


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रविवार, 6 सितंबर 2026

521-सत्यं, शिवं, सुंदरम्

डॉ.वंदना शर्मा 

 


सच कड़वा होता है

वीभत्स, कुरूप

जब सामने आ जाए,

सुन्दर होता है

तभी तक

जब तक पर्दे में रहता है

 

सच देखना

और भी मुश्किल

स्वीकारना तो

और भी मुश्किल

बोलना कभी-कभी

आसान लगता है

लेकिन सच सुनना

और भी मुश्किल

 

फिर क्यों कहा गया

सत्यं शिवं सुन्दरम्

सच तो अकेला

सबके मुखौटे

उतार देता है

 

सच बोलने वाला ही

सबको बुरा लगता है

झूठ कितना सुंदर होता है

बचे रहते हैं रिश्ते

झूठ के कारण

खुशी का भ्रम रहता है

झूठ के कारण

सारी खुशियाँ झूठ का पर्दा

हटते ही गायब हो जाती हैं

 

कलयुग है ये जनाब

सच अकेला मिलता है

झूठ के साथ मेला चलता है

 

जो हितकर है

कल्याणकारी है जो सबके लिए

वो झूठ भी सुंदर होता है

जनहिताय बोला गया

झूठ जब सत्य बन जाए

तब ही सत्यं शिवं सुंदरम् होता है।

vandna.reporter@gmail.com

 

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

520-चूमकर मेरी हथेली

 

चूमकर मेरी हथेली/ डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'


 

बहुत सुकोमल नहीं

खुरदुरी- सी हैं, हथेलियाँ मेरी;

स्पर्श का सुख हो, न हो;

किन्तु निष्ठा है इनमें।

रेखाएँ दिखती नहीं इनमें,

बहुत परिश्रम किया है इन्होंने;

क्योंकि संघर्ष अस्तित्व का था।

अब तुम चूम लो हाथ मेरे;


ऐसे
, जैसे कोई सिद्धपुरुष या योगी

अभिमन्त्रित कर देता है-

एक काला धागा या भोजपत्र।

तुम भी चूमकर मेरी हथेली-

इस पर कुछ रेखाएँ बना दो।

कोई कुछ भी कहे, मत सुनना।

तुम मेरे लिए हठ करके;

यदि सिद्ध बन जाओ;

तो मेरा वचन है- मिथ्या न होगा।

हमारी विजयगाथा पीढ़ियाँ बाँचेंगी।

 

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

519

 कैसी अजीब विडम्बना है/  डॉ. वंदना शर्मा 

 

कैसी अजीब विडम्बना है  

चुप रहने से बच जाते हैं रिश्ते  

कुछ बोलो तो बिखर जाते हैं रिश्ते  

 


जरूरत ही नींव होती किसी रिश्ते की  

जरूरत खत्म, अनजान हो जाते हैं रिश्ते  

 

बातों से शुरू रिश्ता कोई  

समाप्त खामोशी पर होता है  

 

कितनी बार मन को मारना पड़ता है  

सम्मान से समझौता करना पड़ता है  

कुछ ख्वाब दफन करने होते हैं  

कुछ आंसू छिपाने होते हैं  

तब कोई रिश्ता निभाना पड़ता है  

 

ज्ञात हैं चालाकियाँ सारी दुश्मन की  

विडम्बना तो देखो मेरी  

हंसकर गले लगाना पड़ता है  

आंख में आंसू लिए मुस्कराना पड़ता है  

 

झूठ सुनना ही पसंद है दुनिया को  

सच कहो तो अपमान ही सहना पड़ता है  

 

पैसों से आज दोस्ती खरीदते हैं लोग

बिना पैसे के हर चेहरा अनजाना लगता है  

 

है एक ही मौसम बारिश का सबके लिए  

छत हो जिसके सर पर  

उसे ही मौसम सुहाना लगता है  

 

दिखावा करने वाले रहते हैं दोस्तों की भीड़ में  

सच में रिश्ते निभाने वाला  

आज भी सबको बेगाना लगता है

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डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 

vandna.reporter@gmail.com 

सोमवार, 29 जून 2026

518

 नीलाम्बरा का जुलाई अंक डाउनलोड करने के लिए निम्नलिखित लिंक को क्लिक कीजिएगा  -                             डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'    

                                        

नीलाम्बरा -जुलाई 2026       

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

517

 

नमन/ डॉ. कनक लता 

 


माँ सरस्वती
, माँ शारदे, माँ शारदे, माँ सरस्वती 

तू ज्ञान का वरदान दे, माँ ज्ञानदा, माँ भारती

माँ सरस्वती…

धुन तेरी वीणा की बजे, हो हृदय में तेरा ही वास

स्वर तेरे गूंजे मेरे स्वर, जीवन बने तुझसे उजास 

करूँ वंदना, करूँ प्रार्थना, अभ्यर्थना, करूँ स्तुति 

माँ सरस्वती..

 

मिट जाएँ सब मन के विकार, जो हो श्वास में तेरा निवास

अन्तःकरण हो दीप्तिमान, कर ज्ञान ज्योति का प्रकाश 

सब कुछ मेरा तेरी सर्जना, गाऊँ तेरी ही अनुश्रुति 

माँ सरस्वती…. 

 

हो आत्म बोध हो, मन प्रबल, चैतन्य मन में तेरा वास 

आनंद हो या वेदना, अवलंब तू, तेरी ही आस

दृष्टि तू मेरी दिव्य कर, माँ दूर कर सब विकृति 

माँ सरस्वती…

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