महिमा अपरम्पार / शशि पाधा
प्रथम गुरु थे मात-पिता
जिनसे पाया जीवन दान
संस्कार मिले थे घुट्टी में
और मूल्यों का वरदान
पिता सिखाते रीत नीत
माँ करती लाड़ प्यार
नमन उन्हें जो सदा थे मेरे
जीवन का आधार
ध्रुव तारे से गुरु हमारे
अँगुली थाम चले
संशय दुविधा बाधा में
गुरुज्ञान की ज्योत जले
माटी की मूरत को जैसे
गढ़ता है कुम्हार
ज्ञान की छैनी से गुरुओं ने मुझको दिया सँवार
मोती मानक जैसे
मेरे गुरुओं के उपदेश
पग- पग मार्गदर्शन करते
उनके हर आदेश
नित्य भोर का सूरज जैसे
दूर करे अँधियार
ज्ञान की ज्योत जलाकर
गुरुजन करते हैं उपकार
देव सरीखे गुरुजन की महिमा अपरम्पार
नतमस्तक हो नमन करूँ मैं उनको बारम्बार
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