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नमन/ डॉ. कनक लता
तू ज्ञान का वरदान दे, माँ ज्ञानदा,
माँ भारती
माँ सरस्वती…
धुन तेरी वीणा की बजे, हो हृदय में
तेरा ही वास,
स्वर तेरे गूंजे मेरे स्वर, जीवन बने तुझसे
उजास
करूँ वंदना, करूँ प्रार्थना, अभ्यर्थना, करूँ स्तुति
माँ सरस्वती..
मिट जाएँ सब मन के विकार, जो हो श्वास
में तेरा निवास
अन्तःकरण हो दीप्तिमान, कर ज्ञान
ज्योति का प्रकाश
सब कुछ मेरा तेरी सर्जना, गाऊँ तेरी ही
अनुश्रुति
माँ सरस्वती….
हो आत्म बोध हो, मन प्रबल,
चैतन्य मन में तेरा वास
आनंद हो या वेदना, अवलंब तू,
तेरी ही आस
दृष्टि तू मेरी दिव्य कर, माँ दूर कर सब
विकृति
माँ सरस्वती…
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लेखन-रजतजयंती पर
आना तू आना प्रिय! / डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
आना तू आना प्रिय!
मुट्ठी भर गर्मी लेकर
मेरे अधर की मंद स्मित
जीवन के बीहड़ में
विलीन होने से पूर्व
विरह सिसकती निशा में
शून्य होती दृष्टि दिशा में
आना तू आना इस शिशिर
मुट्ठीभर गर्मी लेकर
शरद जो निष्क्रिय सा
खड़ा है पाने को उत्साह
हटाना तू कुहासे की परत
उष्णता जो करती है प्रसार
असीम ऊर्जा का;
कैसे और किसको व्यर्थ बताना
यह वासना नहीं; अपितु
आत्मीय भाव से पूर्ण प्रेम
जग की रीति क्या जानेगी
विद्युत की प्रबल तरंगों- सा
उन्मुक्त उन्नत उदात्त
आया तू आया
आह! चम्पा का फूल लिये
सुंदर फूल जो सजाना है तुझे
मेरी उन्मुक्त उलझी- सी घुँघराली
लटों में
आया तू आया प्रिय!
मुट्ठी भर गर्मी लेकर
12-11-2025
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वह मजदूरनी/ डॉ.सुरंगमा यादव
अभी है
इसमें मज़दूरों की आवाजाही;
क्योंकि
अभी है ये निर्माणाधीन इमारत
बाँस की
बल्लियों में बँधी पालनेनुमा धोती
उसी में
सोया है मजदूरनी का नौनिहाल
उसके सिर
पर है ईंटों का भार
मन में
ममता भरी है अपार
दूर से
ही लुटाती है बार - बार
सीढ़ियों
पर चढ़ जाती है तेज रफ्तार
पसीना
बहाने में है उसको महारत
अभी कुछ
दिन पहले ही जना है लाल
देह भी
अपनी अभी नहीं पाई है सँभाल
पर क्या
कहे पापी पेट का हाल
ठेकेदार
की नज़रों की सहती है शरारत
साँवला मुखड़ा मगर सलोना है
बड़ी- बड़ी
आँखों में दो जून की रोटी का रोना है
नियति, ईंट-
गारा और बालू ही ढोना है
वो भला
क्या जाने क्या होती है नजाकत
मटमैली
धोती और ब्लाउज है देह पर
मर्दाना
कमीज़ भी पहनी है उसके ऊपर
सकुचाती
है छोटे कपड़ेवालियों को देखकर
बार- बार
देखती है- कब होगी दोपहर
बच्चे
को गोद में लेकर
भूल जाती
है दुनिया की आफ़त।
वह मजदूरनी
।
डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
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