गुरुवार, 20 अगस्त 2026

519

 कैसी अजीब विडम्बना है/  डॉ. वंदना शर्मा 

 

कैसी अजीब विडम्बना है  

चुप रहने से बच जाते हैं रिश्ते  

कुछ बोलो तो बिखर जाते हैं रिश्ते  

 


जरूरत ही नींव होती किसी रिश्ते की  

जरूरत खत्म, अनजान हो जाते हैं रिश्ते  

 

बातों से शुरू रिश्ता कोई  

समाप्त खामोशी पर होता है  

 

कितनी बार मन को मारना पड़ता है  

सम्मान से समझौता करना पड़ता है  

कुछ ख्वाब दफन करने होते हैं  

कुछ आंसू छिपाने होते हैं  

तब कोई रिश्ता निभाना पड़ता है  

 

ज्ञात हैं चालाकियाँ सारी दुश्मन की  

विडम्बना तो देखो मेरी  

हंसकर गले लगाना पड़ता है  

आंख में आंसू लिए मुस्कराना पड़ता है  

 

झूठ सुनना ही पसंद है दुनिया को  

सच कहो तो अपमान ही सहना पड़ता है  

 

पैसों से आज दोस्ती खरीदते हैं लोग

बिना पैसे के हर चेहरा अनजाना लगता है  

 

है एक ही मौसम बारिश का सबके लिए  

छत हो जिसके सर पर  

उसे ही मौसम सुहाना लगता है  

 

दिखावा करने वाले रहते हैं दोस्तों की भीड़ में  

सच में रिश्ते निभाने वाला  

आज भी सबको बेगाना लगता है

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डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 

vandna.reporter@gmail.com 

सोमवार, 29 जून 2026

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 नीलाम्बरा का जुलाई अंक डाउनलोड करने के लिए निम्नलिखित लिंक को क्लिक कीजिएगा  -                             डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'    

                                        

नीलाम्बरा -जुलाई 2026       

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

517

 

नमन/ डॉ. कनक लता 

 


माँ सरस्वती
, माँ शारदे, माँ शारदे, माँ सरस्वती 

तू ज्ञान का वरदान दे, माँ ज्ञानदा, माँ भारती

माँ सरस्वती…

धुन तेरी वीणा की बजे, हो हृदय में तेरा ही वास

स्वर तेरे गूंजे मेरे स्वर, जीवन बने तुझसे उजास 

करूँ वंदना, करूँ प्रार्थना, अभ्यर्थना, करूँ स्तुति 

माँ सरस्वती..

 

मिट जाएँ सब मन के विकार, जो हो श्वास में तेरा निवास

अन्तःकरण हो दीप्तिमान, कर ज्ञान ज्योति का प्रकाश 

सब कुछ मेरा तेरी सर्जना, गाऊँ तेरी ही अनुश्रुति 

माँ सरस्वती…. 

 

हो आत्म बोध हो, मन प्रबल, चैतन्य मन में तेरा वास 

आनंद हो या वेदना, अवलंब तू, तेरी ही आस

दृष्टि तू मेरी दिव्य कर, माँ दूर कर सब विकृति 

माँ सरस्वती…

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रविवार, 11 जनवरी 2026

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 नीलाम्बरा का अंक 11 पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक को क्लिक कीजिएगा                                                    - नीलाम्बरा-11


बुधवार, 12 नवंबर 2025

514- आना तू आना प्रिय!

 

लेखन-रजतजयंती पर


आना तू आना प्रिय! /  डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

 


आना तू आना प्रिय!

मुट्ठी भर गर्मी लेकर

मेरे अधर की मंद स्मित

जीवन के बीहड़ में

विलीन होने से पूर्व

विरह सिसकती निशा में

शून्य होती दृष्टि दिशा में

आना तू आना इस शिशिर

मुट्ठीभर गर्मी लेकर

शरद जो निष्क्रिय सा

खड़ा है पाने को उत्साह

हटाना तू कुहासे की परत


मेरे विकल जिया से

उष्णता जो करती है प्रसार

असीम ऊर्जा का;

कैसे और किसको व्यर्थ बताना

यह वासना नहीं; अपितु

आत्मीय भाव से पूर्ण प्रेम

जग की रीति क्या जानेगी

विद्युत की प्रबल तरंगों- सा

उन्मुक्त उन्नत उदात्त

आया तू आया

आह! चम्पा का फूल लिये

सुंदर फूल जो सजाना है तुझे

मेरी उन्मुक्त उलझी- सी घुँघराली लटों में

आया तू आया प्रिय!

मुट्ठी भर गर्मी लेकर

 

12-11-2025

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गुरुवार, 6 नवंबर 2025

513-वह मजदूरनी

 

वह मजदूरनी/ डॉ.सुरंगमा यादव

 


अभी है इसमें मज़दूरों की आवाजाही;

क्योंकि अभी है ये निर्माणाधीन इमारत

बाँस की बल्लियों में बँधी पालनेनुमा धोती

उसी में सोया है मजदूरनी का नौनिहाल

उसके सिर पर है ईंटों का भार

मन में ममता भरी है अपार

दूर से ही लुटाती है बार - बार

सीढ़ियों पर चढ़ जाती है तेज रफ्तार

पसीना बहाने में है उसको महारत

अभी कुछ दिन पहले ही जना है लाल

देह भी अपनी अभी नहीं पाई है सँभाल

पर क्या कहे पापी पेट का हाल

ठेकेदार की नरों की सहती है शरारत

साँवला मुखड़ा मगर सलोना है

बड़ी- बड़ी आँखों में दो जून की रोटी का रोना है

नियति, ईंट- गारा और बालू ही ढोना है

वो भला क्या जाने क्या होती है नजाकत

मटमैली धोती और ब्लाउज है देह पर

मर्दाना कमीज़ भी पहनी है उसके ऊपर

सकुचाती है छोटे कपड़ेवालियों को देखकर

 

बार- बार देखती है- कब होगी दोपहर

बच्चे को गोद में लेकर

भूल जाती है दुनिया की आफ़त।

वह मजदूरनी ।