बुधवार, 17 जनवरी 2024
शुक्रवार, 17 नवंबर 2023
शनिवार, 4 नवंबर 2023
रविवार, 13 अगस्त 2023
बुधवार, 9 अगस्त 2023
बुधवार, 12 जुलाई 2023
467-संघर्षरत बीज
डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
(ऊपर वाले लिंक को क्लिक करके गुजराती अनुवाद भी देख सकते हैं। )
शुक्रवार, 23 जून 2023
गुरुवार, 8 जून 2023
बुधवार, 24 मई 2023
शुक्रवार, 19 मई 2023
शनिवार, 6 मई 2023
सोमवार, 1 मई 2023
गुरुवार, 27 अप्रैल 2023
शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023
गुरुवार, 30 मार्च 2023
शनिवार, 18 मार्च 2023
बुधवार, 15 मार्च 2023
सोमवार, 13 मार्च 2023
शनिवार, 18 फ़रवरी 2023
सोमवार, 6 फ़रवरी 2023
427-प्रेयसी हो तुम!
डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
अभी भी प्रतीक्षा है
उस क्षण की-
जब तुम कहते
कि प्रेयसी हो तुम-
तुम्हारी पलक झपकते ही
साक्षात् और जीवंत
हो उठती हैं
वेदों की ऋचाएँ
हाँ तुम्हारी मंद स्मित
रामायण- सी
पवित्र कर देती है
मेरी प्रत्येक कामना को।
तुम्हारी सघन केशराशि
एकमात्र प्रतीक है
सूत्रकाल के गुँथे हुए
अनगिनत रहस्यों की।
संहिताएँ ही तो हैं
तुम्हारे कंठ पर लिपटी हुई
चमेली के सुगंधित पुष्पहार में
जो मुझे मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
तुम्हारी श्वासों के स्वर ताल पर
नृत्य करती हुई प्रतीत होती हैं
असंख्य अप्सराएँ
स्निग्धा !
तुम्हारी वाणी से
निःसृत शब्दावली
ऋषिकाओं के श्रीमुख से उद्घाटित
अकाट्य सत्य है।
तुम मन्दराचल - समुद्र मंथन से
प्राप्त सुधा का कलश हो।
मैं याचक बनकर
तुमसे कुछ घूँट माँगता हूँ।
भय है तो केवल यही-
कि कभी तुम्हें आघात न दे दूं
तुम्हारा एक अश्रु भी
सृष्टि में प्रलय का सूचक है।
क्योंकि प्रेयसी हो तुम!
-0-डॉ . कविता भट्ट, श्रीनगर, उत्तराखण्ड





















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