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सोमवार, 14 सितंबर 2020

168- हिन्दी की महत्ता

 ज्योति नामदेव (हरिद्वार उत्तराखण्ड)

  भाषाओं में एक है भाषा, नाम है जिसका हिन्दी 

भारतवर्ष में ऐसे चमके, ज्यों दुल्हन की बिंदी 

 पूरे राष्ट्र मे विचार -विनिमय का माध्यम भाषा हिन्दी 

समूचे भारत की भाषाओं की सखी -सहेली हिन्दी 

 राष्ट्रीय अस्मिता बँधी है इससे,  उपादान है भाषा हिन्दी 

प्रिय, प्रयोगात्मक, व्यावहारिक, वैज्ञानिक भाषा हिन्दी 

 पाली -प्राकृत इसके संस्कार, संस्कृत इसकी संस्कृति 

स्वरूप इसका लचीला, सुन्दर भावनात्मक है हिन्दी 

  संस्कृति-समाज, बोलचाल का माध्यम है भाषा हिन्दी 

विभिन्न प्रदेशों की प्यारी,  है भाषा अपनी हिन्दी 

 भाषाओं में एक है भाषा, नाम है जिसका हिन्दी 

भारतवर्ष में ऐसे चमके, जैसे दुल्हन की बिंदी ।

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गुरुवार, 30 मई 2019

बहार

ज्योति नामदेव 

मौसम तो लाया है बहार 
किन्तु बिखर चुका मेरा संसार 
ये प्रकृति मेरे लिए बनी है अंगार 
बस तुम एक बार आ जाओ 

फूलों पर मंडरा रहे है भंवरे 
बादल भी उमड़ -उमड़ कर गरजे 
किन्तु मै बनी निष्ठुर प्राण 
बस तुम एक बार आ जाओ 

बुलाते तुझे वो नदिया के धारे 
पुकारे तुझे वो चन्दा- सितारे 
है कहाँ तू ओ मेरे उजियारें 
बस तुम एक बार आ जाओ 

नैनो के अश्रु भी अब सूख गए 
क्यों वो हमसे आज रूठ गए 
फिर से बनो मेरे जीवन -शृंगार 
मेरी सूनी जिंदगी में आये बहार 
बस तुम एक बार आ जाओ 
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बुधवार, 3 अप्रैल 2019

थोड़ी सी पी



थोड़ी सी पी, ज़माने को शिकायत हो गई 
ज्योति नामदेव

नजरें करम कुछ ऐसी इनायत हो गई 
थोड़ी सी पी, ज़माने को शिकायत हो गई 

रहा ना कुछ होश, अपने से ही बगावत हो गई 
थोड़ी सी पी, ज़माने को शिकायत हो गई 

घने जुल्फों के साये में चाहा था अपना आशियाना 
ओ ज़ालिम !तुझे उससे ही शिकायत हो गई 

कुछ तो करम कर, मेरे रह गुजर 
दिल ही नहीं, सारी उम्र तेरी मिलकियत हो गई 

खिले फूल से है, लब तेरे कातिल 
छपती मुहर सी दिल पर तेरी मुस्कुराहट हो गई 

हाँ मैं महकी हूँ, चहकी हूँ तेरे प्यार में 

थोड़ी सी पी, ज़माने को शिकायत हो गई 

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

खून का रंग हो गया है सुर्ख लाल


आज खून का रंग हो गया है, 
सुर्ख लाल 
इंडियन फोर्स आतंकियों का, 
बन कर आई है काल 
भारत जमीं है शेरों की 
नस -नस में बह रही,
देशभक्ति की धार
बंद कर आंतक का तमाशा, 
मान ले अपनी हार 
जुबान बस में रख अपनी 
ज्यादा बोले तो उतार लेंगे खाल 
आज खून का रंग हो गया है सुर्ख लाल l

हम शान्ति के दूत हैं, कहर बनना भी जानते है 
मत समझ नादान हमें, 
उलझ मत हमसे तूँ 
आज शिव तांडव ने मिलाई, 
भारत वीरों से ताल 
आज खून का रंग हो गया है सुर्ख लाल 

इक्कीसवीं सदी के नायक हम है 
विशाल वेग बहता समुन्द्र हम है 
खुद शक्ति भी आज भारत में है विराजमान 
समुन्द्र के वेग को कौन रोकेगा भला 
फिर आतंकियों की क्या बिसात 
आज खून का रंग हो गया है सुर्ख लाल 

विचारधाराएँ बदलो, वरना हो जाओगे नेस्तोनाबूद, 
हम मशाल राष्ट्रभक्ति की, 
चलते -फिरते हम बारूद 
आसान नहीं, भारत को वश में करना 
आज भारत बन चुका है, 
अंतराष्ट्रीय शक्ति-उन्नति की मिसाल 
आज खून का रंग हो गया है 
सुर्ख लाल 

वन्देमातरम 

ज्योति नामदेव 
सहायक अध्यापिका
हरिद्वार उत्तराखंड

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

तू मानवी है- अखंडित

ज्योति नामदेव

बंद कर बहाना आँखों से पानी

क्या कहूँ, कैसे कहूँ, नारी तेरा बखान
आज तक तू खुद ही है, अपने से अनजान

कस्तूरी मृग जैसे ढूँढता है, अपनी सुगंध
पगला घूमे, देख-फिरे वन-मन में लिये द्वंद्व।

ऐसे ही तू भी अपनी शक्तियों से नहीं परिचित,
छली-ठगी जाती है, पग-पग पर इसलिए निश्चित,

जरा गौर से देख स्वयं को नहीं किसी से कम,
चाहे हो उजला सवेरा या हो घनघोर तम l

नदियों के जल को जहाँ रोज है पूजा जाता,
वहाँ हर रोज गंगा सी काया को निर्मम बेचा जाता l

तू मानवी है- अखंडित, खंड -खंड होकर भी संगठित l
कोई न आएगा बचाने, तू स्वयं सशक्त अकल्पित

कैसे मूर्ख प्राणी है इस समाज में बसते,
गंगाघाट पर रहकर भी गंगा स्नान से तरसते l

तू अगम, सुगम अपने को पहचान,
तू होगी ,तभी तो होंगे, इस समाज में प्राण l

कुदरत की सबसे सुन्दर कृति है तू,
सद्गुणो की पुंज और असीम शक्ति है तू

हा !हा ! हा !मत कर विलाप;  शोषकों का कर विनाश
है तू अपराजिता तू गुंजायमान हास

बनना छोड़ अब तू रसिकों की रसिका।
स्वावलम्बी हो और चला अपनी आजीविका l

शोधक है तू , भोजक नहीं, कर सतीत्व का नृत्य,
क्यों सोचे इतना, तुझ संग अपने ही करते कुकृत्य l

मत बन दुःख का बादल जो आज उमड़े कल मिट चले,
काल बन अपराधियों की, जो तेरी अस्मिता से खेलेंl

तू रीत नहीं ,जो निभाई जाए,तू  बाँसुरी नहीं ,जो बजाई जाए।
तू वस्तु नहीं ,जो भोगी जाए,तू नशा नहीं जो पिया जाए।

तू प्रकृति, गंगाजल, दूध, ममता, शक्तियों का भंडार है दयानिधे!

तू अनंत, अगम्य, रागिनी- सी बजती,

उपमान भी फीके पड़े, जब तू गरजती l

अब तू रच एक कठोर कहानी,
बंद कर बहाना आँखों से पानी ।

क्या कहूँ, कैसे कहूँ, नारी तेरा बखान,
आज तक तू खुद ही है अपने से अनजान।
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बुधवार, 2 जनवरी 2019

99-उत्तराखंड बनाम विकास


 ज्योति नामदेव
[अध्यापिका, कर्णप्रयाग, उत्तराखण्ड]

वाह ! मेरा उत्तराखंड अटठारह वर्ष का हो गया
पहाड़ का कण-कण दर्द से तार -तार हो गया l
वाह ! मेरा उत्तराखंड अटठारह वर्ष का हो गया l
आधुनिकता के दौर में,
फैशन की चकाचौंध में,
रोजगार की दौड़ में,
झटपट-सरपट भाग रहे हैं, अजब सा हाल है l
वाह !मेरा उत्तराखंड अटठारह वर्ष का हो गया l
नारी की भोली -प्यारी सूरत
जिसे देखकर पहाड़ भी इठलाता था
अब जींस -टॉप में देख उन्हें
पहाड़ी परिधान भी शरमा गया
वाह !मेरा उत्तराखंड अटठारह वर्ष का हो गया l
पहाड़ों पर मधुर गीत,
ढ़ोल, दमाउ, बिनाई, तुहरी की मीठी तान,
क्या बताऊँ अब, सब डीजे के शोर तले ढह गया l
वाह !मेरा उत्तराखंड अटठारह वर्ष का हो गया l
पेड़ भी जड़ों से निकलने को आतुर हैं,
बच्चे भी इसे वीरान करने को आतुर हैं l
विकास की धुन में इससे सब पलायन हो गया l
वाह !मेरा उत्तराखंड अटठारह वर्ष का हो गया
नए -नए स्वादिष्ट खाने के इच्छुक,
कुछ नया पाने के इच्छुक,
अपने आप को मॉडर्न बनाने के इच्छुक,
चाउमीन, डोसा, मोमोज के आगे
मंडूवे की रोटी का स्वाद फीका हो गया l
वाह !मेरा उत्तराखंड अटठारह वर्ष का हो गया l
काश इसका दर्द भी समझें कोई,
लेखनी से आगे बड़े भी कोई,
कथनी और करनी का मेल करें भी कोई,
इसके जख्म का मरहम बने भी कोई,
अब तो इसका साँस लेना भी दूभर  हो गया l
वाह !मेरा उत्तराखंड अटठारह वर्ष का हो गया l
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सोमवार, 3 दिसंबर 2018

95- मित्रता


ज्योति नामदेव

एक दिवस की बात,
चारों ओर संग्राम,
संग्राम में दोनों ओर की,
सेना निरंतर थी लड़ रही.
तभी मधुसूदन की उँगली  में चोट लगी,
बह निकली रक्त की धार,
द्रौपदी ने देखा तो,
हुई द्रवित ह्रदय- सार l

ना उधर देखा, ना इधर देखा,
झट फाड़ा अपना अंग वस्त्र,
एक टुकड़ा बस उस अम्बर का,
बाँधा उसने पूरे विश्व को l

देखा द्वारकाधीश ने
तो बोले.. हे सखी
यह क्या किया तुमने?
क्यों फाड़ा तुमने इस चीर को?
सखी परेशान न हो,
कुछ ना होगा इस वीर को l

द्रौपदी बोली.. शान्त रहिए मधुसूदन
जानती हूँ, आप हैं इस जगत् के जीवन,
लेकिन सामने बहती धार ये कैसे देखूँ
जो सबके जीवन के आधार
उसका ही रक्त बहे, ये कैसे देखूँ ?

छोड़ो सखी... चिंता न करो अब,
बाँध लिया तुमने ऋण में मुझे अब,
समय साथ देगा तो बताना है ऐसा,.
कि मित्रता भाव होता है कैसा l

समय चक्र बड़ा,
काल का पहिया चला,
चौरस व्यूह मे शैतानी जंग,
हार गए सब कुछ कौरवों से, पांडव बस रह गए दंग l

भृकुटी तनी थी, दुर्योधन की
विनाश काले विपरीत बुद्धि,
अन्धकारमय सारा हस्तिनापुर,
अंतर्मन बिलख-बिलखकर रो रहा मन l

मौके का फायदा उठा,
केश पकड़ते खींचता दु:शासन,
द्रौपदी को धरती पर घिसटते चला,
हाय हाय ये क्या हो रहा,
इस धरती पर स्त्री का,
चीर हरण हो रहा l

हा हा हा!! हँसते कौरव,
इस भयानक कृत्य पर,
प्रसन्नचित्त होते कौरव,
लगा खींचने दु:शासन द्रौपदी की साड़ी
हाय हाय हस्तिनापुर आज
तुझे क्या लाज नहीं आई?

थी सभा सन्न,
सबके मुख थे सिले हुए,
क्या पांडव, क्या भीष्म,
क्या बड़े, क्या छोटे,
धरती में जैसे पग थे
गड़े हुए l

जैसे ही द्रौपदी ने कृष्ण का
आह्वान किया,
उसे द्रवित ह्रदय से पुकारा,
उनको तो आना ही पड़ा l

दु:शासन खींचता चला, खींचता चला, खींचता चला,
पर यह क्या?
साड़ी है या अनंत आकाश
जो कभी खत्म  न हुआ l

धराशायी हुआ दु:शासन,
नीची दृष्टि गड़ा दुर्योधन,
आज सती को चले लूटने,
उनका ही टूटा अभिमान l

जिसकी रक्षा की सौगंध ली
थी पांडवों ने
उसकी रक्षा की निश्छल
मित्रता ने

मित्रता एक भाव
प्रेम का,
मित्रता नाम है
सुन्दर मन का l

प्रसंग नहीं
यह सत्य है
निर्लज्जों की हुई हार
ये शाश्वत सत्य है
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सहायक अध्यापिका ,राजकीय प्राथमिक विद्यालय ,कर्णप्रयाग  चमोली ,उत्तराखंड