जानि सरद रितु खंजन आए / डॉ. सुशीला ओझा
बहुत खूबसूरत। शरद् पूर्णिमा की लख लख बधाई। आज कोजगरा है। लक्ष्मी की पूजा,लक्ष्मी आज ही उतरती हैं धरती का अवलोकन करने। देखती कि कौन जागा है? लक्ष्मी और चन्द्रमा दोनों समुद्र से निकले हैं। दोनों भाई बहन हैं। बहन भाई की पूर्णता को देखकर आह्लादित है। शरदोत्सव में पुरुष और प्रकृति का मिलन कितना शाश्वत है। बरखा में नहाया धोया आकाश और नहाई- धोई धरा। न कहीं धूल न गर्द। बरखा रितु बेचारी बूढ़ी होकर अपने उजले केश मेड़ पर फहरा रही है। नदी -पर्वत सब स्वच्छ, शीतल तन्वंगी कमनीय। सागर की उत्ताल तरंगे चाँद की पूर्णता के लिए उछल -उछलकर छूने के लिए व्यग्र है। वास्तव में सोलह कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा सबके आकर्षण का केन्द्र है। प्रकृति और पुरुष का महामिलन। कैसे चाँद उतरकर धरा को अपनी भुजाओं में लेने के लिए व्यग्र है।
आज महारास है, महानृत्य है। राधा प्रेम और सौन्दर्य की अतृप्त प्यास है। प्रेम की असीम तड़प और मिलने की भी आकांक्षा दोनों को हृदय में प्रतिस्थापना, पूर्णता, अमृत्व का बरसना शरदोत्सव है।
शरदोत्सव, अमृतोत्सव पुरुष और प्रकृति का महामिलन। इसमें वैज्ञानिकता और आध्यात्मिकता का अनूठा समन्वय। यमुना का तट, होठों पर कृष्ण की बाँसुरी का सुर लय, कदम्ब की डार से छनती आती ज्योत्स्ना की शीतलता, हरसिंगार का मौन होकर लक्ष्मी के लिए बिछ जाना। कहीं पैरों में कुछ गड़ न जाए। वास्तव में राम ने अयोध्या आने की तैयारी आज ही के दिन से शुरू हुई। पन्द्रह दिन तक अयोध्यावासियों की प्रतीक्षिरत आँखों के तारतल्य ने अयोध्या की भूमि नम बना दी थी। शरत्पूर्णिमा की रात्रि में हरसिंगार का नि:शब्द गिरना और उसकी भीनी -भीनी खुशबू प्रेम की प्रगाढ़ता की अनुभूति है। प्रेम अहं से वयं की यात्रा है। ऐसे प्रेमरस में अमृत छलकता है। कृष्ण और राधा की आँखों का नेह झिर-झिर गिर रहा है और दूर्वा अपने माथे पर उज्ज्वल मंगल कलश लेकर सूर्य को अर्घ्य देने के लिए एक पैर पर खड़ी है। प्रेम की पूर्णता और तड़प दोनों की अनुभूति शरदोत्सव है। प्रेम में मिलन की आकांक्षा नहीं है। मिलन में प्रेम का अपव्यय होता है और तड़पन में प्रेम का संचयन, संतुलन, सामंजस्य बना रहता है।
शरदोत्सव को जानकर नीलकंठ और खंजन पक्षी भी आते हैं। सरोवर भी पूर्ण वैभव पर है। कमल खिलकर सगुण ब्रह्म की अनुभूति कराते हैं- ''फूले कमल सोह सर कैसा /निर्गुण ब्रह्म सगुण भए जैसा।'' शरदोत्सव में खीर रात को खुले आकाश में रखकर अमृतत्व की प्राप्ति करते हैं। यह शरदोत्सव ओषधीय गुणों से युक्त है।
-ओझा बेतिया, प. चम्पारण
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें