सोमवार, 14 सितंबर 2026

523-हिन्द की पहचान हिन्दी

डॉ. कनक लता मिश्रा

 तुम स्रोत हो

तुम भाव हो 

तुम शक्ति हो

तुम प्रभाव हो 

हस्ती हमारी तुमसे है 

मेरा पथ हो तुम,

तुम्हीं पड़ाव हो

अज्ञान का तम छट गया,

घनघोर बादल हट गया 

अंतः तमस ज्योतिर् हुआ,

तुम वह अलौकिक प्रकाश हो 

अतिशय तुम्हारे रूप हैं

अतिशय तुम्हारी शैलियाँ

कभी गद्य में, कभी पद्य में,

हर रंग में अठखेलियाँ 

डूबी तुम्हारे ज्ञान रस,

तब पार उतरीं कश्तियाँ

उत्कृष्ट तुम, तुम दिव्य हो,

तुम ईश्वरीय नैवेद्य हो 

तुम हिन्द की पहचान हो

हिंदी हो तुम, तुम संवेद्य हो 

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जय हिंदी, जय जय जय हिंदी!

        डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

जय हिंदी,

जय जय जय हिंदी

भारत माँ की सुन्दर बिंदी।

सबसे प्यारी भाषा हिंदी

 

सबके मन को भाती हिंदी

सब पर प्यार लुटाती हिंदी

मीठे बोल सिखाती हिंदी

सबको गले लगाती हिंदी

 

गंगाजल- सी पावन है

तुलसी की रामायन है .

है कबीर का ज्ञान यहाँ

सूरदास रसखान यहाँ

 

हिंदी का हम मान बढ़ाएँ

मिलकर इसका यश फैलाएँ

हिंदी का हम दिवस मनाएँ

एक साथ सब मिलकर गाएँ

 

जय हिंदी,

जय जय जय हिंदी!

भारत माँ की सुन्दर बिंदी।

सबसे प्यारी भाषा हिंदी

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कविता गधे को न दे सुनाई 

कवयित्री डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 

 

 

सुनो दोस्तो एक दिन क्या हुआ  

एक दिन की मैं सुनाऊँ दास्ताँ  

जब हम पांचवी में पढ़ते थे  

स्कूल से घर आ रहे थे  

रस्ते में दिखे दो गधे  

सामने से चले आ रहे थे  

भाई बोला कैसे गधे हैं ये  

रास्ता रोके जा रहे थे  

मैं बोली भाई गधे सुनते ही नहीं  

शायद गधों के कान नहीं होते  

गधे ने सुन ली मेरी बात  

गधे तो बुरा मान गए  

और सुनो लो कर लो बात  

गधे ने हमें सबक सिखाने की सोची  

चुपके से जाकर अपने दोस्तों को बुला लाए  

फंस गए हम चौराहे पर  

जिधर देखे उधर गधे  

सोचे हम किधर जाएं  

इधर जाएं उधर जाएं  

गधे ने दुलत्ती मारी तो  

सीधे स्वर्ग ना पहुंच जाएं  

अब कैसे अपनी जान बचाएं  

भाई गधे कर दो माफ  

घर जाने का रास्ता कर दो साफ  

किस्मत अच्छी थी, बात सच्ची थी

 

दया गधे को आई  

थोड़ी सी दी जगह दिखाई  

भागे घर को  

हम दोनों बहन भाई  

और इस तरह अपनी जान बचाई  

कर ली तौबा, अब ना कहेंगे  

गधे को ना दे सुनाई

डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली 

vandna.reporter@gmail.com

 

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जीवन जाल ( सेदोका)

-जेन्नी शबनम 

 

1. 

जीवन जाल 

जो सुलझे न कभी  

ऐसा यह जंजाल 

मिलता नहीं 

कोई ओर या छोर 

न रास्ता किसी ओर।

2.

तमाम उम्र 

अभिनय में बीता

सच कोई न जाना

मुख पे हँसी 

मन में व्याप्त पीड़ा  

कौन समझ पाया?

3. 

जीवन स्वाँग

पल-पल गँवाया  

जीवन हुआ व्यर्थ 

जी नहीं सकी  

अंत समय आया 

मन है पछताया।  

 

4.

वक़्त देखता  

टकटकी लगाए 

अपना हर खेल

उसे है पता 

किसी का न चलता 

उसपे कोई ज़ोर।    

5. 

चौसठ कला 

लगे चौसठ दिन  

गुरु संदीपनी ने 

सिखाई कला 

कृष्ण और सुदामा 

बलराम भी साथ।  

  6.

मेरी सहेली  

नहीं है तू अकेली 

साथ है छाया तेरी  

साहस रख  

मत छोड़ना आस 

रखना तू विश्वास।  

7. 

सुन्दर जग 

बेजोड़ शिल्पकारी 

किसने कब की थी

धरा-गगन 

नदिया व पहाड़ 

अजब कलाकारी। 

8.

वक़्त प्रहरी 

चौकीदारी करता 

रात हो या दिन हो

पर झेलता 

सबका रंजो-ग़म 

मगर न थकता। 

9.

भेष बदले  

वक़्त बहुरूपिया  

सबको भय दिखा 

ठठाके हँसे 

ये नहीं नादानी  

उसकी मनमानी। 

10. 

सब्र के फल 

दुःख के पकवान 

मैंने जीभर खाए 

अंततः हारी  

जीवन बना ख़ार  

मन है तार-तार। 

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कृष्णा वर्मा
1
हो गया आज
मोबाइल गुरु औ
गुरु  विकल्प।
2
अक्षर नहीं
मानवता का पाठ
पढ़ाता गुरु।
3
मोबाइल ने
लिया गुरु का पद
बौना विवेक।
4
ज्ञान की धारा
गुरु बिन अधूरा
शिक्षा का पारा।
5
करे दुरुस्त
दृष्टि को दे आकार
गुरु का साथ
6
खोया जो गुरु
समझो पीढ़ियों के
अंत का शुरू
7
मिले गुरु को
सच्चा उपहार तू
ख़ुदी सँवार।
8

देके हौसला
जो हिम्मत बढ़ाए
गुरु कहाए।
9
ज्ञान- प्रसार
गुरु बनाए पुल
शिष्य हो पार।
10
गुरु- सम्मान
मिटाए पीढ़ियों का
तम तमाम।

 

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सत्यं,  शिवं,  सुंदरम् 

डॉ.वंदना शर्मा 

 

सच कड़वा होता है

वीभत्स, कुरूप

जब सामने आ जाए,

सुन्दर होता है

तभी तक

जब तक पर्दे में रहता है

 

सच देखना

और भी मुश्किल

स्वीकारना तो

और भी मुश्किल

बोलना कभी-कभी

आसान लगता है

लेकिन सच सुनना

और भी मुश्किल

 

फिर क्यों कहा गया

सत्यं शिवं सुन्दरम्

सच तो अकेला

सबके मुखौटे

उतार देता है

 

सच बोलने वाला ही

सबको बुरा लगता है

झूठ कितना सुंदर होता है

बचे रहते हैं रिश्ते

झूठ के कारण

खुशी का भ्रम रहता है

झूठ के कारण

सारी खुशियाँ झूठ का पर्दा

हटते ही गायब हो जाती हैं

 

कलयुग है ये जनाब

सच अकेला मिलता है

झूठ के साथ मेला चलता है

 

जो हितकर है

कल्याणकारी है जो सबके लिए

वो झूठ भी सुंदर होता है

जनहिताय बोला गया

झूठ जब सत्य बन जाए

तब ही सत्यं शिवं सुंदरम् होता है।

vandna.reporter@gmail.com

 

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शिक्षक दिवस की पीड़ा / डॉ. पूनम चौधरी

 

पूरे साल तौली जाती है उसकी निष्ठा,

परखी जाती है उसकी ईमानदारी,

हर रोज़ नई कसौटी पर

कसी जाती है उसकी नीयत।

 

फिर पाँच सितम्बर को

कुछ फूल और सम्मान-पत्रों के साथ

एक दिन के लिए

तय कर दिया जाता है कि

शिक्षक आदर के योग्य है।

 

अजीब है यह समय—

जहाँ इज़्ज़त भी

कैलेंडर देखकर आती है।

 

पूरे दिन

मोबाइल की स्क्रीनें जगमगाती हैं—

‘Happy Teacher’s Day’

 

संदेश, कुछ सुंदर शब्द, कुछ तस्वीरें,

कुछ औपचारिक शुभकामनाएँ—

और सबको लगता है

इतना ही पर्याप्त है।

 

शायद शिक्षक की गरिमा

इतने भर से अपनी जगह लौट आएगी,

एक दिन की शुभकामनाओं से

मिट जाएगी वर्षों की उपेक्षा।

 

जिसकी आवाज़ बरस भर

सवालों, आदेशों और जाँच के दायरे में

दबती रही,

क्या एक दिन का स्तुतिगान

उसके हिस्से का मान  लौटा सकता है?

 

एक ओर

सुविधाओं से सुसज्जित कक्षों में

निर्धारित समय,

और काम की निश्चित सीमाओं के साथ

वे बना रहे हैं मानक,

कस रहे हैं कसौटियाँ,

कर रहे हैं आकलन

उस शिक्षक का—

 

जो दुर्गम रास्तों से गुजरता हुआ,

चिलचिलाती दोपहर में

बिना पंखे, बिना बिजली

उस कक्षा में बैठा है

जहाँ हवा से पहले

बच्चों तक पहुँचती है

उनके घरों की विवशता।

 

वे बच्चे

जो सिर्फ़ पढ़ने नहीं आए—

 

किसी के घर में रोटी का प्रश्न है,

किसी के माँ-बाप मज़दूरी के लिए गए हैं,

कोई घर की कामों से बचने 

के लिए आ बैठा है,

किसी का भाई पढ़ेगा 

वो देखभाल के लिए आयी है।

 

वह पढ़ाता है—

और पढ़ाते-पढ़ाते

उनकी आँखों में वह सब पढ़ता है

जो किताबों में नहीं लिखा।

वह अक्षर देता है,

तो साथ में आत्मविश्वास भी।

वह गणित सिखाता है,

तो जीवन का हिसाब भी।

वह गलती सुधारता है,

तो कभी-कभी

टूटता हुआ मन भी सँभालता है।

 

इसके अलावा भी

 उसके कामों की फेहरिस्त है लंबी —

कभी मध्याह्न भोजन की व्यवस्था,

कभी जनग-णना,

कभी बी. एल. ओ.  का दायित्व,

कभी सर्वे,

कभी छूटे हुए बच्चों की तलाश,

कभी टीकाकरण की चिंता,

कभी गाँव की किसी दूसरी

सरकारी ज़िम्मेदारी का बोझ।

 

काग़ज़ और काम बढ़ते जाते हैं,

दिन छोटा पड़ता जाता है।

 

फिर भी उसके कंधों पर है जिम्मेदारी—

इन अधूरी जिंदगियों को

निपुण बनाने की।

 

उसकी दो मिनट की देरी

घड़ी देख लेती है,

उसकी एक गलती

कार्यालय तक पहुँच जाती है,

उसकी छुट्टी

बहुतों की नज़र में आ जाती है,

उसकी तनख़्वाह तो 

गाँव वालों भी मुँहज़बानी 

याद रखते हैं ।

 

बस भूल गए हम

कितनी बार

वह अपने हिस्से का विश्राम

किसी बच्चे की ज़रूरत पर

छोड़ आया है।

 

हाँ, शिक्षक भी मनुष्य है।

उससे भी भूल होती है।

 

जो अपने दायित्व से विमुख है,

उसे अपने भीतर

कठोरता से झाँकना चाहिए।

 

पर एक की भूल से

पूरे वर्ग की निष्ठा पर

संदेह करना भी

कहाँ का न्याय है?

 

किसी शिक्षक को

उसके वेतन से मत आँकिए,

उसकी छुट्टियाँ गिनना बंद कीजिए,

उसकी घड़ी से

मत जाँचिए उसकी उपस्थिति—

 

कभी उस बच्चे की आँख से देखिए

जिसने पहली बार

उसी के हाथों

सीखा है अपना नाम लिखना।

 

तब शायद समझ आए—

शिक्षक का सबसे बड़ा पुरस्कार

किसी मंच पर नहीं,

किसी सम्मान-पत्र में नहीं;

बल्कि बच्चे के भविष्य में लिखा होता है।

 

इसलिए इस शिक्षक दिवस

मोबाइल पर एक और शुभकामना

भेजने से पहले

अपने भीतर पूछिए—

 

क्या सचमुच हम शिक्षक का आदर करते हैं?

नहीं,

एक दिन के संदेश

एक शिक्षक का समय नहीं बदल सकते,

एक दिन की तालियाँ

उसकी परिस्थितियाँ नहीं बदल सकतीं।

 

समय तब बदलेगा

जब आदर

संदेश से निकलकर

व्यवहार में आएगा।

जब उसके अधिकारों के साथ

उसके उत्तरदायित्व की भी

न्यायपूर्ण बात होगी।

 

और जब सरकारी विद्यालय की

दूरस्थ, तपती हुई कक्षा में खड़ा शिक्षक

सिर्फ़ व्यवस्था का कर्मचारी नहीं;

बल्कि राष्ट्र के भविष्य का

विश्वस्त संरक्षक समझा जाएगा।

 

बनानी है नियमावली—

तो सरल बनाइए।

 

स्थानांतरण की नीतियाँ

सरल और पारदर्शी बनाइए।

 

पदोन्नति की व्यवस्था

न्यायपूर्ण बनाइए।

 

शिक्षकों के लिए

एक स्वस्थ शैक्षिक वातावरण बनाइए;

क्योंकि

शिक्षक को केवल

कर्तव्यों की सूची नहीं,

गरिमा के साथ काम करने का अधिकार भी चाहिए।

 

तभी असल में

हम कर पाएँगे

शिक्षक का मान।

 

और फिर नहीं बचेगी आवश्यकता

साल में एक दिन

उसके लिए मंच सजाने की—

 

क्योंकि

जिस शिक्षक का मान

हर दिन उसके काम में होगा,

उसे मान देने के लिए

एक दिन की ज़रूरत नहीं होगी।

 

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परदेसी कान्हा/ शशि पाधा 

 

कैसा उत्सव, कैसी होली 

कान्हा तो परदेस गए 

राधा से पूछें हमजोली 

लौट आने को क्या कह ग ?


भूलके सारा साज शृंगार 

राधे ने हँसना छोड़ दिया  

कलकल बहती यमुना की  

लहरों ने बहना छोड़ दिया 


सब गैयाँ इत-उत ढूँढ रही 

किस नगर-डगर गोपाल गए 

कब लौटेंगे, क्या  बोल ग ?


सूनी- सी गलियाँ गोकुल की 

मुरझाया- सा है नंदनवन 

ग्वाल-पाल सब मौन पड़े 

निर्जन- सा लगता वृन्दावन 

 

मुरली की तानें मौन पडीं 

क्यों कान्हा इतने निठुर हुए?


मटकी में माखन दूध लिये 

आ मात यशोदा  द्वार खड़ी 

क्यों देर हुई अब आने को 

अँखियाँ डग में जडीं-जडीं 

 

 राजपाट ने कैसा बाँधा

 क्यों माँ की ममता भूल ग ?

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वर्जीनिया, यू एस ए 

Email: shashipadha@gmail.com

 

 

 

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1- ओ कन्हैया / कनक मिश्रा 

 

ले लो अपनी शरण में कन्हैया 

रखलो हमको भी पलको की छइयाँ

ओ कन्हैया…

सौप दिए अपने सब रंग तुमको 

अपने ही रंग में अब रँग लो ना हमको 

कुछ भी मेरा ना मैं क्या दूँ रंगया 

ओ कन्हैया 

ले लो अपनी…

 

अपना नहीं जग में कुछ भी ओ कृष्णा 

मन से मिटे मोह माया न तृष्णा 

पार तुम ही करो मोरे बंसी बजया 

ओ कन्हैया 

ले लो अपनी…

 

झूठ कपट छल में डूबा जगत है 

बिखरा जीवन में बिखरा अँधेरा विकट है 

लिखके कान्हा भरो मोरी कोरी चुनरिया 

ओ कन्हैया 

ले लो अपने..

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ओ कान्हा! आया जन्मदिन तेरा/ डॉ . वंदना शर्मा [ यहाँ नाम अवश्य लिखा कीजिए।   डॉ . का डॉट भी लगाना ज़रूरी है]

 

ओ कान्हा! आया जन्मदिन तेरा

फूल चढ़ाऊँ, माखन खिलाऊँ

घर को सजाऊँ, बता

तुझे कैसे रिझाऊँ

 

ओ कान्हा! आया जन्मदिन तेरा

फल चढ़ाऊँ, मेवा चढ़ाऊँ

मन के सुमन भी सारे

तुझे अर्पण कर जाऊँ

बता तुझे कैसे रिझाऊँ

 

ओ कान्हा, आया जन्मदिन तेरा

भजन गाऊँ, आरती गाऊँ

सुबह शाम, आठो याम

नाम तेरा बस रटती जाऊँ

बता तुझे कैसे रिझाऊँ

 

ओ कान्हा! आया जन्मदिन तेरा

 

सबकी बिगड़ी बनाए

मुरली ऐसी सुनाए

पल में कर दे

खुशियों की छाँ

बता तुझे कैसे रिझाऊँ

ओ कान्हा आया जन्मदिन तेरा

vandna.reporter@gmail.com

 

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स्त्रियों का आपसी प्रेम/ डॉ. योगिता जोशी

1

जब स्त्रियाँ
आपसी प्रेम में होती हैं,
हर मौसम बसंत होता है।
धरती स्वर्ग-सी लगती है।
हर दुःख का मरहम होता है
इनका आपसी प्रेम।

इनके आँसुओं से
एक साथ न जाने
कितने गिले-शिकवे
धुल जाते हैं।

जब स्त्रियाँ
आपसी प्रेम में होती हैं,
न जाने कितनी यात्राएँ
विलुप्त हो जाती हैं।

जब स्त्रियाँ
एक-दूसरे की
पीठ थपथपाती हैं,
बेमौसम
बारिश होने लगती है।
एक साथ अचानक
कई फूल खिल जाते हैं।

आपसी प्रेम में
उतरी स्त्रियों ने
ज्यादा लम्बी छलांगें लगाई हैं।
इनका प्रेम इनकी
आँखों से झलकता है।

उबार लाती हैं
एक-दूसरे को
हर मुश्किल से,
मुश्किल घड़ी से।

ये स्त्रियाँ
अपने प्रयासों से
मुकम्मल जहाँ बना लेती हैं,
जब स्त्रियाँ
आपसी प्रेम में होती हैं।

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2-खूबसूरत स्त्री/ डॉ. योगिता जोशी

 

एक थी स्त्री,
हाड़-मांस से थी बनी।
फिर उसने
लाज का आँचल ओढ़ लिया,
माथे पर कुमकुम सजा लिया।

खुद को
मर्यादाओं में जकड़ लिया।
पैरों में पायल पहन ली।
संस्कारों को गहना माना।

पुश्तैनी कंगन पहन
नारी-धर्म स्वीकार लिया।
पति को देवता मान लिया।

ओढ़ चूनर
रीति-रिवाजों की,
परंपराओं को
अपने पल्लू से बाँध लिया।

इस तरह वह
खूबसूरत स्त्री कहलाई।

--

3-शालीन स्त्रियाँ/ डॉ. योगिता जोशी

 

शालीन थीं वे स्त्रियाँ
जिन्होंने कभी
अपने अपमान का
विरोध नहीं किया।

सभ्य कहलाई वे स्त्रियाँ
जिन्होंने आँखों देखी
मक्खी बिन पानी
निगलना सीख लिया था।

समझदार थीं वे स्त्रियाँ
जिन्हें दुनियादारी का
हिसाब-किताब नहीं आता था।
खुद की अहमियत का भी
अंदाजा नहीं था।

शांत स्वभाव की थीं
वे स्त्रियाँ, जिन्होंने
जीते जी बिन आग के
जलना सीख लिया था।

सुसंस्कारी थीं वे स्त्रियाँ
जो ब्याह के बाद
पति को देवता मानती रहीं।

एक दिन ये स्त्रियाँ
अपने अधिकारों के लिए
आवाज़ उठाने लगीं।

तब से सबकी सब
बदचलन-बेहया-बेशर्म,
संस्कारविहीन हो गईं।

 

-0-

भीकम सिंह 

1

दूर है कंत 

रुआँसे लौट रहे 

सारे बसंत।

2

उपेक्षित हैं 

किसान की कथाएँ 

खेत क्या गाएँ।

3

मेघों के स्वर 

बगावत के हैं तो?

क्या करें घर।

4

ढूँढते पाँव 

सुबह और शाम 

खेतों में गाँव।

5

सैंकड़ों बार 

स्मृतियों ने बाँधे हैं 

बन्दनवार 

6

चुप ही रहूँ

अँधेरों के खिलाफ 

क्या सच कहूँ ?

7

जगते दीये 

अँधियारा बैठा है 

होठों को सिये।

8

दरो-दीवारें 

आँगन के भी तारे 

माँ ही क्यूँ हारे।

9

बीड़ी फूँकता 

खेतों में बैठकर 

गाँव का डर।

10

नभ को हारे 

चाँद जस का तस 

दिखाता तारे।

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-0-प्रणाम आदरणीय महोदय। आपका दिन शुभ हो। मेरी यह कविता प्रकाशन हेतु है। आप भी मेरे गुरु हैं आपको भी कोटि कोटि नमन है।

 

शिक्षक दिवस पर मेरे सभी गुरुजनों को समर्पित

 

सौभाग्य है जो ऐसे गुरु मिले  

सबकी कृपा है मैंने पायी  

हुई मेरे महादेव की कृपा जो  

ऐसे गुरुजनों से शिक्षा मैंने पाई  

 

भोला भाला मन था मेरा  

संस्कार और नीति मुझे सिखाई  

पाकर स्नेह उनका हुआ प्रफुल्लित मन  

भाग्य पर अपने मैं भी इतराई  

 

शब्दों का मर्म सिखवाया  

अर्थ में गहनता तब आई  

मेरी गलती पर मुझे सुधारा  

लेखन की बारीकी समझाई  

 

थी अनजान चालाकियों से जग की  

दे ज्ञान मुझे नई राह दिखलाई  

बन प्रेरणा मेरी मुझे रास्ता दिखवाया  

हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाया  

 

सत्य और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया  

आशीर्वाद से उनके मैंने ये सफलता पाई  

बारम्बार धन्यवाद मेरे गुरुजन को  

देती हूँ शिक्षक दिवस की आपको बधाई  

 

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 

vandna.reporter@gmail.com 

 

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तुम बिन नैहर छूटा/  डॉ . पूनम चौधरी

 

[एक बेटी के भाव है, जब पिता के न रहने पर त्योहारों पर मायके जाने की सोचती है.....]

 

 


 एक बेटी के भाव है जब पिता के न रहने पर त्योहारों पर मायके जाने की सोचती है.....

 

 

तुम बिन नैहर छूटा पापा....

सारे उत्सव फीके तुम बिन,

मन के कोष भी रीते तुम बिन

नेह के बंधन टूट गए सब 

बदली हर परिभाषा 

तुम बिन नैहर छूटा पापा 

 

तुमसे हर विश्वास जुड़ा था,

जीवन का उल्लास जुड़ा था,

तुम से थी रौनक उस घर की 

मायके का एहसास जुडा था।

तुम रूठे तो रूठ गया सब 

रूठ ग हर  आशा,

तुम बिन नैहर छूटा पापा 

 

तुम थे तो सुख-साज बड़े थे,

आशीषों से भाग्य जड़े थे ,

आँसू, पीड़ा, हार, व्यथा सब 

ड के हमसे दूर खड़े थे,

छोड़के बंधन, मोड़ के मुख को,

 तोड़ गए हर नाता,

पापा, बहुत कठिन है जीना,

कैसे धरु दिलासा,

तुम बिन नैहर छूटा पापा

 

मन में साहस भरा था तुमने 

सही गलत का भेद सिखाया।

कभी डाँट और कभी प्रेम से 

जीवन कुंदन सा चमकाया

बिना तुम्हारे सब बदले है 

बदली सबकी भाषा,

 अब ना रहा अधिकार भाव ही,

 ना कोई अभिलाषा।

तुम बिन नैहर छूटा पापा।

तुम बिन नैहर छूटा पापा।

 

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तो मिले उपहार 

-डॉ. जेन्नी शबनम  

1.
राखी- त्योहार
भाई है शर्मसार
जेब है ख़ाली

कैसे ले उपहार
मँहगाई की मार।

2.

राखी है आई 

भाई है परदेस 

बहना दुःखी  

वीडियो-कॉल आया 

बहन मुस्कुराई। 

3.

स्नेह का धागा 

जोड़े रखता नाता 

भाई-बहन 

भले हों दूर-दूर 

पर प्रेम अटूट। 

4.

नन्ही बहना 

पहनके गहना 

चहक रही 

राखी पर भइया 

लाया प्यारा तोहफ़ा। 

5.

राखी त्योहार 

क्यों आता एक बार

बहना सोचे

हो हर इतवार   

तो मिले उपहार।

-0-

 

--

 

2-वर्तमान के दाग़/ डॉ.सुरंगमा यादव

 

बिना दवा के मर जाते हैं, कितने ही बीमार

कहीं नोट गद्दों में भरकर, सोते जिम्मेदार

हाय गरीबी ! उठी न डोली, देखो फिर इस बार

कबाड़ तक में जलते देखे, नोटों के अंबार

न्याय तुला पर धन- बल भारी, किससे करें पुकार

कोर्ट -कचहरी के चक्कर में, बिक जाते घर-द्वार

लगे मुखौटे कई- कई, पहचान हुई दुश्वार

बड़े निवाले खाने वाले, बच जाते हर बार

वर्तमान के दाग़ छिपाए, जाते बारम्बा

इतिहासों के काले पन्ने, दिखलाकर सौ बार

 

-0-

परदेसी मन /  शशि पाधा 

 

ता- ठिकाना पूछता 

जड़ें पुरानी ढूँढता

  घूम रहा परदेसी मन ।



काकी, चाची, मामा, मौसा 

एक गली का इक परिवार 

बीच सजा वो चाट खोमचा 

आसपास बसता संसार

     रोज़ हवा को सूँघता

   खुश्बू वो ही ढूँढता 

   तड़प रहा परदेसी मन ।



जुड़ी- सटी सब छत, मुँडेरें 

आधी रातें, कथा- कहानी 

खाट, दरी, बस चादर, तकिया 

माटी-रची सुराही –पानी 


        
यादों में ही झूमता 

        छत वही फिर ढूँढता 

       पछताया परदेसी मन ।


दोपहरी की धूप गुनगुनी 

आँगन, तकिया लंबी तान 

पके रसोई चाय,कौड़ी 

सर्दी से तब बचते प्राण 

 

     उनींदा- सा ऊँघता 

     हरी चटाई ढूँढता 

     पगला सा परदेसी मन । 



संग मनाए मेले- ठेले

चौगानों में तीज, त्योहार

आपस में बाँटे थे कितने 

चूड़ी, रिब्बन के उपहार



   बिन झूले के झूलता

   ठाँव वही फिर ढूँढता

   बेचारा एकाकी मन

    -0- शशि पाधा, वर्जीनिया, यू एस ए 

email : shashipadha@gmail.com

-0-

 

 [आपने स्त्री जीवन के संघर्ष को पीड़ा को समझा अपने शब्दों से उसके मौन स्वर को मुखरित किया। साधुवाद आदरणीय। उसी कविता की अंतिम पंक्ति से जोड़कर मैंने-‘ स्त्रीहै’  कविता अभी लिखी है।]

 

  स्त्री है /  डॉ. वंदना शर्मा 

 

 

वह निष्प्राण- सी है अपनी मर्यादाओं के कारण

लेकिन मरती नहीं है

क्योंकि स्त्री है 

सृजन करती है दर्द सहकर 

विनाश भी कर सकती है महाकाली बनकर 

वह  शक्ति है जग की 

उसकी जिजीविषा को कोई नहीं हरा सकता 

समाज ने डाली बेड़ियाँ पैरों में उसके 

ताकि उसकी उड़ान रोक सके 

पर बहती हवा को 

कौन रोक पाया है आज तक 

उसके लिए कोई व्रत नहीं रखा जाता 

कोई मन्नत नहीं माँगी जाती 

फिर भी वह  जीती है ज्यादा 

बो जाते हैं बेटे उग आती हैं बेटियाँ 

स्प्रिंग देखा है कभी आपने 

जितना दबाओं उतना उछलता है 

स्त्री की असीम शक्ति से डर 

लगाई पाबंदी पुरुष समाज ने 

पर वह  शक्ति और अधिक मुखरित हुई 

अपनी राह खुद बनाई 

वह  चांद पर जा वापिस आई 

हर अभेद क्षेत्र में परचम लहराया 

नभ अपने कदमों में झुकाया 

क्योंकि व स्त्री है 

हार नहीं सकती 

परिस्थितियाँ अनुकूल भले न हो 

वह  ड़ना जानती है 

वह  स्त्री है 

हर सीमा से परे 

हर बाधा उससे डरे 

वह  कुछ भी कर सकती है 

शक्ति बिना शिव अधूरे 

शक्ति से हो सारे कार्य पूरे 

कण- कण में व्याप्त है जो

जो ऊर्जा, जो प्राण है 

वह  स्त्री है

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चूमकर मेरी हथेली

 

बहुत सुकोमल नहीं

खुरदुरी- सी हैं, हथेलियाँ मेरी;

स्पर्श का सुख हो, न हो;

किन्तु निष्ठा है इनमें।

रेखाएँ दिखती नहीं इनमें,

बहुत परिश्रम किया है इन्होंने;

क्योंकि संघर्ष अस्तित्व का था।

अब तुम चूम लो हाथ मेरे;

ऐसे, जैसे कोई सिद्धपुरुष या योगी

अभिमन्त्रित कर देता है-

एक काला धागा या भोजपत्र।

तुम भी चूमकर मेरी हथेली-

इस पर कुछ रेखाएँ बना दो।

कोई कुछ भी कहे, मत सुनना।

तुम मेरे लिए हठ करके;

यदि सिद्ध बन जाओ;

तो मेरा वचन है- मिथ्या न होगा।

हमारी विजयगाथा पीढ़ियाँ बाँचेंगी।

 

 

2-कैसी अजीब विडम्बना है/  डॉ. वंदना शर्मा 

 

कैसी अजीब विडम्बना है  

चुप रहने से बच जाते हैं रिश्ते  

कुछ बोलो तो बिखर जाते हैं रिश्ते  

 

जरूरत ही नींव होती किसी रिश्ते की  

जरूरत खत्म, अनजान हो जाते हैं रिश्ते  

 

बातों से शुरू रिश्ता कोई  

समाप्त खामोशी पर होता है  

 

कितनी बार मन को मारना पड़ता है  

सम्मान से समझौता करना पड़ता है  

कुछ ख्वाब दफन करने होते हैं  

कुछ आंसू छिपाने होते हैं  

तब कोई रिश्ता निभाना पड़ता है  

 

ज्ञात हैं चालाकियाँ सारी दुश्मन की  

विडम्बना तो देखो मेरी  

हंसकर गले लगाना पड़ता है  

आंख में आंसू लिए मुस्कराना पड़ता है  

 

झूठ सुनना ही पसंद है दुनिया को  

सच कहो तो अपमान ही सहना पड़ता है  

 

पैसों से आज दोस्ती खरीदते हैं लोग

बिना पैसे के हर चेहरा अनजाना लगता है  

 

है एक ही मौसम बारिश का सबके लिए  

छत हो जिसके सर पर  

उसे ही मौसम सुहाना लगता है  

 

दिखावा करने वाले रहते हैं दोस्तों की भीड़ में  

सच में रिश्ते निभाने वाला  

आज भी सबको बेगाना लगता है

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डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 

vandna.reporter@gmail.com 

 

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भोजपुरी गीत/ डॉ. शिप्रा मिश्रा 

 

 

 1- जा रे बदरवा

 

जा रे बदरवा सनेसवा ले जा रे!

कारे बदरवा सनेसवा ले जा रे!

अबकी सावन घर आजा ओ सइयाँ! आजा!

 

अमुवा के डढ़िया हिड़ोलवा डलाइल

हरी- हरी चूड़ियाँ आ चुनरी ओढ़ाइल!

हिड़ोलवा हमें नाहीं भावे ओ बिदेसिया आजा!

 

सखी सब झुलुआ घुमरी परावे हो!

मुँहवा झुराइल देखी के चिढ़ावे हो!

अब कइसे धीर धरी बोल निरमोहिया आजा!

 

बरसे बदरिया त कड़के बिजुरिया हो!

गतर -गतर सिहरेला धड़केला छतिया हो!

भय लागे पिया बिनु कटे नाहीं रतियाँ आजा! 

 

देसवा के ओरी-छोरी देखी के बदरिया हो!

हमरा बोला के ले जा अपनी नगरिया हो!

बिना तोहरे कइसे काटीं भरल जवनिया आजा!

 

2 सुन हो कन्हाई

 

उठाव ना कन्हाई गगरी बड़ी भारी

दुनिया परल बा भरम के मझारी। 

 

नन्ही चुकी गोड़ हमर नन्ही चुकी हाथ बा

अगड़ी पिछाड़ी कवनो संगी ना साथ बा

संझा होई त घरवा चहुँपेम अबेरी।

अंखिया खोल ना कन्हाई!

 

चढ़ल जवानी हमार लचकत कमरिया

गरजे बदरिया आजु चमकत बिजुरिया

बजरी दुल्हवा हमरा दी बड़ी गारी।

 

आइल बुढ़ारी त अँखिया धुधुआई

देह के मोटरिया अब नाहीं ढोवाई

मउत सउतिया हमके घर से निकारी।

सँवार ना कन्हाई!

 

मटिया के देह ह ई पनिया परान बा

धरती अकासे में दुनिया हरान बा

तोहरा के छोड़ अउरी के सँवारी।

 

डॉ. शिप्रा मिश्रा 

शिक्षण एवं स्वतंत्र लेखन 

बेतिया, प० चम्पारण, बिहार 

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 मनवा हरसे/  शीला मिश्रा

बाग-बगीचा सब है हरसे।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

सूनी सूनी काली रतियाँ।
बरसन रहतीं मोरी अँखियाँ।।
कँगना चूड़ी रूठीं मुझसे ।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

बहुत सताये तेरी सुधियाँ
मीठी मीठी प्यारी बतियाँ।।
आँखों का कजरा है तरसे
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

महके महके फूल व कलियाँ।
  झूला झूलें मेरी सखियाँ।।
वन उपवन कैसे हैं हरसे।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

सखियाँ पहनें लहंगा चनियाँ।
चूड़ी से सजाई कलइयाँ।।
सजने को आतुर हूँ कबसे।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

सखियाँ खींचें मेरी बहियाँ।
तेरे बिन ना भाये सइयाँ।।
आ जाओ तो मनवा हरसे
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

         शीला मिश्रा
     9977655565 

 

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इतना भी बेसब्र न हो/ प्रदीप रावत

 

इतना भी बेसब्र न हो

कि यूँ ही गिर जाना है,
थोड़ा सब्र रख,

मंज़िल में तुझे

अडिग खड़ा हो जाना है।

क्या मंज़िल है तेरी

, क्या तुझे पाना है?
यूँ ही दुनियादारी में

 क्यों यूँ ही उलझ जाना है?

सूरज की तपती धूप में,
सर्द हवाओं की रातों में,
यूँ ही दिन, यूँ ही

 रातों को गुजर जाना है।

इतना भी बेसब्र न हो,
दो पहर ठहर कर,
थोड़ा सुकून, आह भरकर,
थोड़ा सोचकर,

थोड़ा समझकर,
यूँ ही क्यों कशमकश में

 जीना-जाना है?

शांत हो, विश्राम हो,
वृक्षों की सरसराहट,
नदियों की कल-कल,
प्रकृति को आत्मसात् कर जाना है।

बस अपनी मंज़िल पाकर
अडिग हो जाना है........

प्रदीप रावत
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड

pardiprawat1986@gmail.com

 

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हिस्सा

रचना श्रीवास्तव 

 

पिता की मृत्यु के बाद तीनों भाई-बहन घर आए थे। अंतिम संस्कार से लेकर तेरहवीं तक के सारे काम निपट गए। रिश्तेदार और परिचित भी एक-एक करके लौट गए। शाम को घर अचानक बहुत बड़ा और खाली-खाली लगने लगा।

बैठक में चुप्पी पसरी थी। तभी बड़े बेटे ने कहा अब हम सभी यहाँ आएँ हैं, तो बटवारे की बात कर लेते हैं ,

मकान मैं रख लेता हूँ। आखिर इसकी किश्तें मैंने ही चुकाई हैं।”

छोटा तुरंत बोल पड़ा,“तो खेत मेरे। इतने साल मैंने ही सँभाले हैं। और मकान बेचें तो उसकी अच्छी कीमत मिलेगी। उसमें से मेरा हिस्सा भी होना चाहिए।”

बड़ा भाई कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “तो खेत भी बेच देते हैं। जो मिलेगा, तीनों में बाँट लेंगे।”

तीनों में क्यों?” छोटे ने बात काटी, “जब खेती मैंने की है तो मेरा हिस्सा ज्यादा होना चाहिए।” छोटा बेटा बोला।

बात धीरे-धीरे तकरार में बदल गई। दोनों अपनी-अपनी गिनती सामने रखने लगे—किसने कितना खर्च किया, किसने कितना काम किया, किसने पिता की कितनी सेवा की।

बहन एक कोने में बैठी चुपचाप सुन रही थी। अचानक बड़े भाई की नजर उस पर पड़ी।

तुम बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?”

बहन कुछ क्षण दोनों भाइयों को देखती रही। फिर उठी और पिता की पुरानी अलमारी के पास चली गई।अलमारी खोलकर उसने कपड़ों के नीचे से एक पुरानी डायरी निकाली।

मुझे बस यह चाहिए।”

बड़ा भाई हल्का-सा हँसा। “इतने बड़े घर में तुम्हारा हिस्सा बस एक डायरी?”

बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया। डायरी अपने बैग में रखी और चुपचाप घर लौट गई।

          कुछ महीने बीते।मकान और खेत के बँटवारे को लेकर दोनों भाइयों का विवाद इतना बढ़ गया कि मामला अदालत पहुँच गया। सुनवाई से एक दिन पहले बड़ा भाई बहन के पास पहुँचा।

तुम मेरे पक्ष में गवाही दे देना। पिताजी के बारे में तुम बहुत कुछ जानती हो।”

वह अभी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि छोटा भाई भी आ गया।

नहीं बहन, तुम मेरे पक्ष में गवाही देना। तुमने देखा है, मैंने पिताजी और खेत दोनों को कितने साल सँभाला है।”

बहन दोनों को देखती रही। उसने कुछ नहीं कहा। दोनों भाई अपनी अपनी बात कह कर चले गए। अगले दिन वह समय पर अदालत पहुँच गई। दोनों भाई अपनी-अपनी बात पर अड़े थे। कोई अपनी किश्तों का हिसाब बता रहा था, कोई खेत में किए गए वर्षों के श्रम का।

बहन का नाम पुकारा गया। वह कटघरे में जाकर खड़ी हो गई। वकील ने पूछा, “आप इस मामले के बारे में क्या कहना चाहती हैं?”

बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने अपने बैग से वही पुरानी डायरी निकाली और जज की ओर बढ़ा दी। जज ने डायरी खोली।

 पहले पृष्ठ  पर लिखा था—'बड़े बेटे की कॉलेज की फीस—सुशीला ने अपनी जमा पूँजी से दी।

अगले पृष्ठ पर—'छोटे की दुकान के लिए पैसे—सुशीला ने अपने गहने बेचकर दिए।

फिर एक तारीख के सामने लिखा था— मकान की पहली किश्त—सुशीला ने भेजी। कहती है, बच्चों का घर है।

जज ने कुछ क्षण डायरी को देखा, फिर उसे बंद कर दिया।अदालत में खामोशी छा गई।

दोनों भाई लगभग एक साथ बोल पड़े—तुमने कभी बताया क्यों नहीं?”

बहन ने पहली बार उनकी ओर देखा।

जिसे अपना दिया हुआ गिनाना पड़े, वह अपना कहाँ रह जाता है?”

जज ने पूछा,“आप इस संपत्ति में अपना हिस्सा चाहती हैं?”

बहन ने दोनों भाइयों की ओर देखा।

नहीं।”

यह सुनते ही दोनों भाइयों ने जैसे रहत की साँस ली।।

जज साहब ,मेरा हिस्सा तो मुझे बहुत पहले मिल गया था।”

दोनों भाई उसे देखते रहे।

उसने डायरी बंद की और धीरे से कहा—जब पिताजी को कुछ भी  आवश्यकता  होती थी, वे भाइयों को नहीं... मुझे पुकारते थे। वही मेरा हिस्सा था।”

रचना श्रीवास्तव 

 

 

 

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पं. कैलाशचंद्र पंत : सरलमना का सफ़रनामा

 

विजय जोशीपूर्व ग्रुप महाप्रबंधकभेल

 

जो भी पुरूष नि:ष्पापनिष्कलंकनिडर है
उसे प्रणाम. कलियुग में वही हमारा ईश्वर है

            भाषा केवल संप्रेषण का ही माध्यम ही नहींअपितु सभ्यतासंस्कृति एवं विरासत की वाहिनी हैबशर्ते इस बात के मर्मधर्म को आत्मसात करते हुए हम इसे निजी जीवन में भी सार्थक कर सकें। बकलम भारतेंदु हरिश्चंद्र : निज भाषा उन्नति अहै निज उन्नति को मूल। यह हुई पहली बात।

            दूसरी यह कि आजादी तुरंत पश्चात के स्वार्थ समाहित राजनैतिक नेतृत्व ने इस पहलू का तिरस्कार कर मैकाले का शिष्यत्व स्वीकारते हुए हिंदी हित को ताक पर रख दिया।

             इस सबके बावजूद भी यदि हिंदी उभर कर निखर सकी तो इसका श्रेय इस बात को जाता है कि यह कभी राज्याश्रित नहीं रही। भक्तिकाल के कवियों और संतों के माध्यम से यह जन जन की शिराओं में समाहित हो गई। स्वाधीनता उपरांत यह दायित्व निभाया तत्कालीन रचनाधर्मी संस्कारित  पीढ़ी ने जिनकी समर्पित सेवा के परिप्रेक्ष्य में ही हिंदी प्रतिष्ठित हो सकी।

             इस संदर्भ में जो प्रमुख नाम उभरते हैं उनमें शीर्ष पर हैं श्री कैलाशचंद्र पंत। एक निर्मलनि:ष्पाप मुखाकृति। सहजसरलसादगीयुक्त। कहीं कोई छल या रहस्य नहीं। अनूठा व्यक्तित्व। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा या स्वार्थ से सर्वथा परे। वही जिसकी कल्पना स्वयं राम ने की :

     निर्मल मन जन सो मोहि वा                                                                        

    मोहि कपट छल छिद्र न भावा

             मैं साठ के दशक में शासन प्रशासन द्वारा हिंदी की उपेक्षा का चश्मदीद गवाह रहा हूं। एक छोटे से भवन में स्थापित तत्कालीन हिंदी भवन प्रमुख नेत्र सुख वंचित बैजनाथ दुबेजी की व्यथा का प्रत्यक्षदर्शी। तब हिंदी दिवस भी मनाया जाता था भेल सभागार में भेल के सहयोग से।

 

            और फिर पदार्पण हुआ एक सेवाभावी समर्पित युवा शख्सियत श्री कैलाशचंद्र पंत काजिन्होंने बहैसियत मंत्री संचालकम. प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति हिंदी भवन से जुड़ते हुए हिंदी के पौधे को अपने निष्काम कर्मी प्रयत्नों से सींचते हुए न केवल पुष्पित पल्लवित किया अपितु संपूर्ण समाज को वटवृक्ष की शीतल छांह प्रदान करते हुए साहित्यकारों को प्रतिभा निखार मंच की सुविधा।

 

            एक कहावत है रोम वाज़ नॉट बिल्ट इन ए डे अर्थात रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ था। हिंदी भवन के वर्तमान स्वरूप के संदर्भ में यह स्वयंसिद्ध हैजिसकी सुदृढ़ नींव में समाहित है दादा पंत का स्वेद उर्फ़ खून पसीना।

 

 दुनिया में वही शख़्स है तारीफ़ के काबिल                                         

 जिस शख़्स ने हालात का मुख मोड़ दिया हो

 

            जहां तक वर्षों से निरंतर प्रवाहमान प्रतिष्ठित आयोजनों की बात है तो उसकी एक लंबी फेहरिस्त है पावस व्याख्यानमालासमाजसेवी एवं हिंदीतर भाषी हिंदी सेवा सम्मानवरिष्ठ विमर्शहोलीदिवाली उत्सव सहित मासिक साहित्यिक पत्रिका अक्षरा आदि।

 

        हाल ही में आपने आयु के 90 वर्ष पूर्ण होने पर उन्होंने स्वत: अपना दायित्व अनासक्त भाव से अगली पीढ़ी के युवा व्यक्तित्व को सौंप दिया थाजो इस दौर की कुर्सी प्रेमी जमात के लिये बहुत बड़ा संदेश है। जीवन काल में पद्मश्री जैसे अनेकानेक पुरस्कारों से आपको सम्मानित किया गया था। इन सद्प्रयासों से सम्मान की महिमा में भी श्रीवृद्धि ही हुई।

 

            शिव समर्पित श्रावण माह शुभारंभ की शुभ वेला में उन्होंने अपने महाप्रयाण की राह चुनी। चिता ने जिसे विदा किया वह था केवल उनका पार्थिव शरीर, क्योंकि वे व्यक्ति नहीं विचार थे और विचार सदैव कायम रहता है जाग्रत, जिंदा एवं ज्वलंत आगे के मार्ग के दिशा दर्शन हेतु।  आइये इन पलों में हम सब उन्हें पूरी कृतज्ञता सहित प्रणाम करें। 

                  

             उठ गए दुनिया से लेकिन एक दुनिया हो गए

              बुलबुले पानी के थे फूटे तो दरिया हो गए 

 

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नज़्म/ लिली मित्रा

 

फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है

जहद- ए -मुसलसल के बाद

लम्हा - लम्हा तितलियों की कहानी है

दरख्तों की ज़ुबानी है

 

ख़ुश्क हसरतों पे 

बादलों की मेहरबानी है

रेज़ा- रेज़ा ये बारिश

सेहरा पे बागवानी है...

गुज़रती मसर्रत से ज़िंदगानी है

 

फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है

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नारी संवेदना : पाँच नवगीत

            रमेश गौतम

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  1

 

एक

चुप्पी बाँध कर

बैठे हुए हैं दिन अभागे।

 

देह नोंची

जा रही है

तितलियों की मधुवनों में

व्यस्त रखवाले सभी

अपने निहित प्रयोजनों में

कुछ

कहें तो तंत्र भी

आँखें तरेरे तोप दागे।

 

काँपती-सी

 रातरानी

किस तरह सपने गढ़ेगी

चाँदनी कब तक अकेली

इन  अंधेरों  से  लड़ेगी  

साँस ले

 कैसे हवा

नीले ज़हर के आज आगे।

 

लूट लेते

दिन दहाड़े

जो नवह दित किरण का तन

पैरवी  में उन  पिशाचों

 की  खड़े  हैं  देवतागन

डबडबाती

आँख  की

दारुण व्यथा पर कौन जागे।

 

                *

2

 

मेरे ही अधर

जागरण गातें हैं

मैं नवप्रभात की पहली स्वरलहरी।

 

मेरे आँचल में

जीवन बड़ा हुआ

धरती नापी जिसने

आकाश छुआ

तिनका-तिनका- चुन

नीड़ बुने मैंने

अपने घर-आँगन की मैं ही प्रहरी।

 

मैं सम्बन्धों के सेतु

बनाती हूँ

 रिश्तों में  मिसरी बन

घुल जाती हूँ

मुझको मत

केवल आँखों से आँको

मैं देह नहीं,अन्तर्मन से गहरी।

 

मैं मलय-गंध

तन-मन सुरभित करती

संवेदन सबके

सिरहाने रखती

भीगे नयनों को

मुस्कानें देती

शीतल छाया बन ढकती दोपहरी।

 

मैं ही खेतों-खलिहानों

में बिखरी

पत्थर तोड़े तो

सोने सा निखरी

मैंने ही धुन्ध

धूप में बदली है

मैं तम में दीपशिखा बनकर ठहरी।

 

              *

3

 

चुभ रही है

 चीख

निर्वसना कहानी की

 

रात रोती

रोशनी के छटपटाने पर

 सुबह रोती

 धूप के फिर डूब जाने पर

बोलने पर

लाठियाँ बौछार पानी की।

 

वक्षस्थल पर

सड़क के देह बिखरी है

ताश अपने

फेंटती अंधेर नगरी है

फिर व्यवस्था ने

तमस  पर  मेहरबानी की।

 

पँखुरी कैसे

खिलेगी फिर गुलाबी कल

भर गया है

क्यारियों में जब विषैला जल

साख

मिट्टी में मिली है बागवानी की।

                   

                  *

4

 

 

तुम

स्वयंसिद्धा

बनो वन्दन तुम्हारा

बस समय की आहटों को बांच लेना ।

 

आजकल

उपभोक्ता सामग्रियों पर

देह के उत्सव

मनाती तितलियाँ अब

टंग गईं

विज्ञापनों की बाहुओं में

आत्ममुग्धा

रूप की उपलब्धियाँ सब

जाल

फैलाया

गया सोचा विचारा

पग धरो बाजार में तो जाँच लेना।

 

मूल्य

जीवन के पतंगों से नहीं हैं

डोर से बंध कर

इशारों पर मुड़ेंगे

मान्यताओं

के धनुष भारी बहुत हैं

जानकी बनकर

उठाओ तो उठेंगे

विपथगामी

तमस के

भ्रम जाल में तुम

भोर की उगती किरण की आँच लेना।

 

नव्य पूँजीवाद

की इस कालगति में

बस चमक के

साथ चलते हैं यहाँ सब

जब छलावा

रोशनी भी छीन लेता

छोड़ देती संग हैं

परछाइयाँ तब

बहुत

हितकारी

यहाँ होता नहीं है

एक सीमा से अधिक कुलाँच लेना।

 

               *

5

 

अब नहीं

रुकती उड़ानें

एक चिड़िया की सुनहरी।

 

मुक्तिकामी

मन हुआ है

चेतना आकाशगामी

कर लिया कंठस्थ उड़ना

छोड़ पिंजरों की गुलामी

बांध पंखों

 में उजाला

चीरती है धुंध गहरी।

 

राह में

पर्वत शिखर,जंगल सघन

या फिर मरुस्थल

पार जाना है सुनिश्चित

अग्निपथ या हो महाजल

भूमिका

गूंगी नहीं अब

और न किंचित है बहरी।

 

हर अमावस

की सतह पर

जानती दीपक जलाना

दिन हुआ घायल कहीं

भूली नहीं मरहम लगाना

है अगर

शीतल सुबह तो

समय पर तपती दुपहरी।

 

             *

 

रंगभूमि,78 बी,संजय नगर,

बरेली -243005  (उप्र)

मो-8394984865

 

-0-

 

 

Anuradha Priyadarshini

Tue, Jul 28, 12:50PM (15 hours ago)

to me

धरा की शान

 

 

जंगल झाड़ी धरा की शान

ये निधियों की अद्भुत खान

आप निखारे अपना जहान

क्यों बनता है कोई प्रधान 

 

पीपल बरगद की जो छाँव

धरा  पे  चलना  नंगे  पाँव

तटिनी मध्य चलती इक नाव

प्रतिपल खुद को लगाए दाँव

दस्तक  हौले  से  दे तुफान

कभीं संभल जा ऐ इंसान 

 

जंगल झाड़ी धरा की शान

ये निधियों की अद्भुत खान

 

 

प्राण वायु तु साध ले बंदे

त्रास मिटे हट  जाएं  फंदे

मोह  छोड़ना  देकर  चंदे

वसन नहीं कर माँ के गंदे

गंगा यमुना नदियाँ महान

संस्कृतियों का छोड़ निशान 

 

जंगल झाड़ी धरा की शान

ये निधियों की अद्भुत खान

 

निर्मल निर्झर नहीं हो म्लान

स्वच्छ धरा अंबर नित ध्यान 

प्रेम पुष्प खिले मधुरिम गान

दुर्गम पथ गढ़ अब तुम ठान 

अँधेर गली को चीर विहान

संघर्षो  में असली  मुस्कान 

 

 

जंगल झाड़ी धरा की शान

ये निधियों की अद्भुत खान

 

डॉ अनुराधा प्रियदर्शिनी

T-15 Officer's colony civil Lines Mathura Utter Pradesh 281001

Mob 9935058297

apinky2011@gmail.com

 

 

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माँ कहाँ जाएगी?

-प्रियंका गुप्ता 

 

मुझे लगा था 

माँ चली गईं

कहीं दूर...

ऐसी जगह जहाँ 

मैं पहुँच न पाऊँ

उन्हें देखने, छूने, सुनने 

और 

गले लगाने को...

मुझे लगा था कि अब कभी

नहीं होगा ऐसा कुछ भी मेरे पास 

उनका बचा हुआ

पर उस दिन सुबह 

तैयार होते-होते 

माँग के पास झड़ते हुए

कनपटी के बगल से सफ़ेद होते बालों में,

आँखों के नीचे पड़ते काले घेरों में,

और

कुछ अलग सी आवाज़ में 

बच्चों पर बड़बड़ाते हुए,

अपने चेहरे पर दिखती रेखाओं को 

अपनी हाथों की रेखाओं से झाड़ते हुए 

मैंने माँ को देखा 

मेरी तरफ अपलक ताकते हुए 

उस एक पल में माँ 

फिर मुस्कराई 

वही मीठी सी मुस्कान...

मैं जान गई 

माँ कहीं नहीं गईं, यहीं हैं 

वह  कहीं जा भी नहीं सकती 

क्योंकि 

मैंने उन्हें अभी अभी देखा 

अपने भीतर से झाँकते हुए...। 

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ये हरी कांच की हरी-हरी चूड़ियाँ / वंदना शर्मा

 

मन को भाएँ ये हरी हरी चूड़ियाँ

 

आया सावन, बड़ा मनभावन 

रिमझिम बूँदें बरस रही हैं 

डाली-डाली झूम हैं 

काले-काले बदरा छाए रे 

मन होकर मगन, झूमे गगन 

गीत कोई प्रेम का गाए रे 

 

हरी-हरी चूड़ियाँ देख 

गौरी का मन ललचाए रे 

हरी साड़ी, हरी चूड़ियाँ 

हरी बिंदी, हरी चुनरिया 

धरती हरी, काली बदरिया 

झूम-झूम देखो ये 

सारी बगिया शोर मचाए रे 

 

सर-सर पत्ते झूम रहे 

पी-पी पपीहा गूंज रहे 

मन भी बहका-बहका जाए रे 

 

चूड़ी हरी मन को भाने लगी 

याद पिता की आने लगी 

रिमझिम रिमझिम ये बारिश

मुझे यूँ चिढ़ाने लगी 

झर-झर झरता ये सावन

 सखी झरता जाए रे 

चूड़ी हरी मन को भाए रे 

---

 

डॉ वंदना शर्मा

वह  बचपन कितना प्यारा था

 

वे चारों हमेशा साथ रहते 

खाना भी ना खाते, एक-दूजे के बिना 

बीती कितनी मस्ती भरी दोपहरियाँ सोय बिना 

चोट एक को लगती थी,

दर्द सभी को होता था 

 

शाम को अंत्याक्षरी सजती थी 

जीतने के लिए शब्दकोश रटते थे  दिन भर

कैरम, लूडो भैया ने सिखाए

खूब चाट पकौड़ी भैया ने खिलाए

 

अपने हिस्से का भी दीदी मुझे खिलाती थी 

नींद खराब कर अपनी 

रात को रोज पढ़ाती थी 

 

जब मम्मी बाजार जाती थी 

ऊधम बहुत मचाते थे 

तोड़-फोड़कर घर की चीजें 

भोले बन पढ़ने बैठ जाते थे 

 

पापा जब घर आते थे 

बहुत सारी चीजें लाते थे 

दिनभर की आपबीती सुनाते थे 

 

वह  बचपन कितना प्यारा था 

हम एक साथ रहते थे 

 

क्यूं हम इतने बड़े हो गए 

एक-दूजे के लिए मेहमान हो गए 

अब तो राखी पर भी नहीं मिलते 

सब अपनी जिंदगी जीते 

भाई बहन चारों जुदा हो गए

 

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चेतना शून्य युग /कनक लता 

 

 

बस दो ही पल के जीवन में, जाने कितनी तैयारी है 

अगले पल की आस तो है, पर वक्त से ही लाचारी है 

 

अनंत काल से चली आ रही, अधिकार की मारामारी है 

एक दिन जाना है निश्चित, क्यों लूट की कारोबारी है 

 

अपने ही दुश्मन हुए जा रहे, रिश्तो में बढ़ी गद्दारी है 

यह खून-खराबा मार-काट, सब स्वार्थ की महामारी है 

 

गूंगे बहरों की दुनिया में, कुछ कहने की दुश्वारी है 

हर जान की कीमत शून्य यहाँ, हर सांस पे पैसा भारी है

 

अब तुम ही पार लगाओ ठाकुर, नइया भी तो तुम्हारी है 

हे अंतर्यामी करो उजाला, बिखरी चहुओर अँधियारी है 

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व्यंग्य/

सड़क गुण गड्ढ गुणी अनंता/ अशोक गौतम

 

बंधुओ! आम आदमी के सिर पर  कुछ और हो या न, पर शिकायतों की वैसी ही भारी भरकम  ग़ठरी होती है, जैसी अविवाहित प्रेमियों के दिल पर पास शिकवों की । प्रेमी की आयु सीमा से मैं बहुत पहले गुजर चुका हूँ: इसलिए अब मेरे पास केवल और केवल शिकायतों की गठरी है। अगर आप भी मेरी तरह के आम आदमी होंगे< तो तय मानिए, आपके पास भी शिकायतों का मेरी तरह का ही अंबार होगा। ये अलग बात हो सकती है कि आप उन्हें अपने जीवन का अनिवार्य हिस्सा मान अब चुप रहने लग गए होंगे।

 आम आदमी किसी और चीज का बोझ उठाए यहां वहां फिरे न फिरे, वह शिकायतों की गठरी यहां वहां , इस उस विभाग उठाए जरूर देखा जा सकता है। जिस किसीके सिर पर भी उसके भार से भारी बोझ की गठरी आपको दिखे, उसके बारे में दूसरी और कोई राय बनाने में कतई देर मत कीजिए, आंखें मूंद फाइनल कर लीजिए कि वह एक तो आम आदमी है और दूसरे उसने अपने सिर पर जो गठरी उठा है, वह पारिवारिक , व्यवस्थागत शिकायतों की गठरी के सिवाय और कुछ नहीं।

 आम आदमी को बीवी से शिकायत होती है। आम आदमी को बच्चों से शिकायत होती है। आम आदमी को यार दोस्तों से शिकायत होती है। आम आदमी को अपने से शिकायत होती है। और कई बार तो उसे भगवान से भी शिकायत हो जाती है। आम आदमी को हर मौसम से शिकायत होती है। आम आदमी को हर सिम से शिकायत होती है।

आम आदमी होने के नाते  आम आदमी  सिर पर शिकायतों की गठरी उठाए कभी इस विभाग भटकता है तो कभी उस विभाग। पर एक उसकी शिकायतें होती हैं कि कम होने का नाम नहीं लेतीं। उन्हें सुनते तो सब हैं, पर उनका निवारण किसीके हाथ नहीं हो तो तब जो उसकी शिकायतों का निवारण करने वालों हाथों के पास हाथ हों। उत्तरोतर उसके सिर पर उठी शिकायतों की गठरी भारी होती जाती है।

 इधर मानसून आया , शिकायतीले आम आदमी को मानसून से भी शिकायत हुई तो उसने मानसून के सामने सिर पर दूसरी शिकायतों की गठरी उठाए उठाए उसके सामने  शिकायत का सवाल खड़ा करते कहा,‘ हे मानसून! एक बात बताओ! आखिर तुम आते ही क्यों हों?’

 क्यों आने का मतलब ? क्या हो गया! वैसे माफ करना! मैं आम आदमी के लिए बिल्कुल आता भी नहीं। ऐसे में वह गलती से जो मुझे अपने लिए आया मान ले तो गलती उसकी।

 डियर! मैं तो सरकारी विभागों के लिए आता हूं। तुम मेरी कद्र क्या जानो! मैं उनके लिए आता हूं जो मेरा मान करते हैं, सम्मान करते हैं। जो मेरे जाने के बाद से ही मेरे आने की बेसब्री से बाट जोहते रहते हैं। जो मेरे इंतजार में साल भर सोए सोए भी पलकें बिछाए रहते हैं।

सच कहूं तो मैं किसानों का कल्याण करने भी नहीं आता। असल में मैं आपदा विभाग वालों का कल्याण करने आता हूं। मैं लोक निर्माण विभाग वालों का कल्याण करने आता हूं। तुम्हारे लिए तो सरकारी राशन की दुकान पर आटा दाल ही समय पर आ जाएं वही बहुत है। हे आम आदमी! तुम क्या जानो मानसून का महत्व! मानूसन ने सीना चौड़ा कर कहा तो आम आदमी टूटे छाते के नीचे भीगने से शिकायतों की गठरी छिपाते बोला,‘ यार! सड़कों के गड्ढे दो दिन पहले ही भरे गए थे कि तुम आ गए? लगता है आम आदमी की टांगों की किस्मत में बारह महीने बावन सप्ताह गड्ढों में ही चला गिरना लिखा है। 

 देखो आम आदमी! हर जगह शिकायत करने से पहले किसी चीज की तकनीकी स्तर पर जांच कर उसके अप्रत्याशित लाभों के बारे में भी सोच लिया करो। माना , तुम जन्म से ही निगेटिव हो ,पर व्यवस्था के प्रति हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण मत रखो । एक बात बताऊँ? पता है मेरी मेहनत से सड़क में पड़ते गड्ढों से कितने लाभ होते हैं?  रे पामर! तुम क्या  जानो गड्ढों के गुण!

मतलब !लो साहब! अब मानसून से सुनिए सड़क पर पड़ते गड्ढों के लाभ! अब मानसून से सुनिए सड़क पर पड़ते अवगुणी गड्ढों के गुण! आम आदमी कुछ आगे कहने पूछने के बदले मानूसन का मुंह एकटक निहारता रहा तो मानूसन अपना छाता बंद करता बोला,‘ सड़क में मेरे द्वारा डाले गड्ढों का सबसे बड़ा पहला लाभ यह होता कि लोग बाग संभल संभल कर चलते हैं। पता है ऐसा होने से क्या होता है?’

क्या!आम आदमी एक बार फिर अवाक!

ऐसा होने से वाहन की स्पीड कंट्रोल में रहती है। आदमी की स्पीड कंट्रोल में रहती है। तब दुर्घटना होने की संभावना बिल्कुल कम हो जाती है। दुर्घटना होने की संभावना कम होने पर आदमी अस्पताल के चक्कर लगाने से छूट जाता है। जब वह अस्पताल के चक्कर लगाने से छूट जाता है तो उसका बेकार की दवाइयों पर का खर्चा बच जाता है। तब उसे गाड़ी, अपने हुए नुकसान के क्लेम के लिए बीमा कंपनियों के चक्कर लगाने में अपना कीमती समय बरबाद नहीं करना पड़ता। जब मेरे आने पर मिट्टी से भरे गड्ढों वाली सड़कों पर और गड्ढे पड़ते हैं और जब उनमें पानी भरता है तो मोहल्ले के बच्चों को उनमें स्वीमिंग पूल की फील आती है। तब वे उनमें तैरते स्वीमिंग किसी शाही पूल का सुख प्राप्त करते हैं। वर्ना बेचारे वे कहां जा पाएंगे पेड स्वीमिंग पूल में तैरने। मैं सड़क में गड्ढे डालता हूं तो बच्चे उनमें कागज की नौका बना उनमें नौका विहार कर फ्री में गोवा का सुख प्राप्त करते हैं। इसमें बुरा क्या है? जब जनता गड्ढे! गड्ढे! चिल्लाती है तो जनता के प्रिय नेताओं को अपने अगल बगल चले अपने अधिकारियों का जनता से परिचय करवाने का सुअवसर मिलता है। जनता को मेरे आने पर ही पता चलता है कि उनके इलाके का किस विभाग का अधिकारी कौन है। मात्र एक मैं ही ऐसा मौसम हूं जिसमें नेता और उनके अधिकारी जनता से मिलने के लिए सहर्ष ऑफिसों से बाहर आते हैं। शेष मौसम तो वे अपने ऑफिसों में ही दुबके रहते हैं। कभी एसी के नीचे तो कभी हीटर के सामने।  

 एक और पते की बात बताऊँ? तुम्हें शायद पता हो कि न हो। जिनकी हिली हड्डियाँ बड़े से बड़े डॉक्टर नहीं बैठा पाते उनकी हिली हड्डियाँ मैं अपने द्वारा बनाए गड्ढों में कदम पड़ते ही बैठा देता हूं। तब उनके लिए मेरे द्वारा बनाए गड्ढे गड्ढे,  नहीं सफल इलाज होता है।

मैं सड़क में गड्ढे डालता हूं तो पता है मैं क्रेडिटरों तो क्रेडिटरों , डिफाल्टरों को भी कितना काम देता हूं? कितने विभाग के कर्मचारियों को कमीशन के तौर पर इनाम देता हूं? इसलिए हे आम आदमी! तुम क्या जानो सड़क में पड़े गड्ढों के पीछे के सुख! तुम्हें तो कवल अपने पेट की चिंता होती है। पर मैं ही जानता हूं मुझे कितने पेटों की चिंता होती है! कभी दूसरों के लिए भी जीना सीखो तो बात बने,’ मानसून ने कहा और आम आदमी के सामने ही मुस्कुराता हुआ बरसाती किनारे फेंक गड्ढीली सड़क में और गड्ढे बनाने पूरी ईमानदारी से जुट गया। 

अशोक गौतम, गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड़, नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

ashokgautam001@gmail.com

अशोक गौतम  मो 9418070089

 

 

 

 

हाइबन

                    अगले जनम... /    प्रियंका गुप्ता

 

आज सुबह सोकर उठी तो आँगन में दीदी की अजीब सी गुनगुनाहट आ रही थी...अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो...। आवाज़ कुछ रुँधी थी या फिर माँजे जा रहे बर्तनों और नल के पानी का शोर था, तुरन्त समझ नहीं पाई। पास जाकर देखा तो दीदी की आँखों से टपाटप आँसू गिर रहे थे। मैं घबरा गई थी...दी और आँसू...इम्पॉसिबिल...। मेरी दी तो कितनी हँसमुख हैं...हमेशा खिलखिलाने वाली...फिर आज क्या हो गया?

 

उनके हाथ से भगौना छीनकर मैने किनारे डाल दिया, "बताओ दी, क्या हुआ...? रो क्यों रही...?"

 

कुछ बोलने की बजा दी की सुबकियाँ बँध गई। मेरा जी घबराने लगा...कहीं किसी प्यार-व्यार का चक्कर तो नहीं? पर नहीं...अगर ऐसा होता तो दी मुझे तो ज़रूर बताती...तो फिर...?

 

"तुम्हें मेरी कसम दी, बताओ तो...मेरा दिल घबरा रहा है...।" मैने अपने हाथों में उनका चेहरा लेकर जबरिया अपनी ओर घुमा दिया।

 

किसी तरह शान्त होकर दी ने जो बताया, उसका लब्बोलुआब ये था- कल शाम को जब दी ऑफ़िस से लौट रही थी, तो रिक्शे की तलाश करते-करते वह  पैदल ही चली जा रही थी। थोड़ा झुटपुटा हो गया था, सो सावधानीवश उन्होंने सूट की चुन्नी से अपना सिर और मुँह भी लपेट लिया था। तभी जाने कहाँ से पीछे से आता एक साइकिल सवार मानो जानबूझ कर उनके ऊपर गिर पड़ा। इस गिरने की एक्टिंग के दौरान उसके लिजलिज़े हाथ दी के शरीर पर जिस तरह से रेंग गए, बताते-बताते दी गिनगिनाहट से भर गई।

 

"तुम्हें उसे घुमाकर एक थप्पड़ देना था दी...वह  कमीना भी याद रखता ज़िन्दगी भर...।" सुनकर मैं गुस्से से तमतमा गई।

 

"मारा था गुड़िया, उस समय मेरा भी यही इंस्टेण्ट रियक्शन था...पर जानती हो, उस बेशर्म, घिनौने इंसान ने क्या किया...? मेरा हाथ पकड़कर चूम लिया और फिर जो कहा न...वह  मैं बोल नहीं पाऊँगी। मेरे मन और तन दोनो से उसके गन्दे, घिनौने स्पर्श की याद नहीं जा रही। मुझे अपने लड़की होने से नफ़रत हो रही। न मैं लड़की होती, न कोई मेरे साथ ऐसा करता। क्या जीवन में आगे बढ़ने, कुछ करने का सपना देखना एक लड़की के लिए गुनाह है...? क्या बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, जन्म से लेकर मौत तक हम सिर्फ़ भय में जीते रहेंगे? क्या तन-मन से जीवन भर किसी पुरुष के अधीन रहकर, उसकी चाकरी करना ही हमारी नियति है...? क्या हम इंसान नहीं...? इंसान के नाम पर हमारे समाज में खुले घूम रहे हैवानों को काबू में करने की बजाए सिर्फ़ हम लड़कियों पर बन्दिशें क्यों लगाई जाती हैं...? क्यों सिर्फ़ हमें सिखाया जाता है कि हम कैसे हँसे-बोलें, कैसे पहने ओढ़ें, कैसे घुट कर जिएँ...? क्यों नहीं लड़कों को बचपन से सिखाया जाता कि एक लड़की भी जीने का हक़ रखती है, खुली हवा में साँस लेने की चाहत होती है उसे...और सबसे बड़ी बात...एक लड़की भी इंसान है...।"

मैं तो दी की बात से निरुत्तर हूँ अब तक...आप के पास इसका जवाब है कोई...?

 

अगले जन्म

बेटी होकर जीना

चाहेगा कौन?

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 (प्रियंका गुप्ता)

   ‘प्रेमांगन’

एम आई जी- 292, कैलाश विहार, आवास विकास योजना संख्या- एक, कल्याणपुर,

कानपुर-208017 (उ.प्र)

 

 

 

 

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सॉनेट

अनिमा दास (कटक, ओड़िशा )

 

 

1-आशावरी (सॉनेट)

 

जिस मरु की अपेक्षा में, प्रत्येक ग्रीष्म को किया है आमंत्रित

आयुकाल के प्रत्येक श्रावण ने किया है तप्त मरुथल एकत्रित 

उसी मरुथल का बन शाद्वल तुम,धमनियों को  किया जीवंत

निष्प्रभ नक्षत्र सा था सत्व मेरा,करती स्पर्श अब विद्युत् अनंत 

 

निद्रा रहित निशा के मौन संगीत में,श्वासरुद्ध होती थी क्षिति

स्वप्न-तल्लीन प्रहर में पक्ष्म होते थे रिक्त,थी आशाओं की इति 

बन आशावरी तुम गूँजते हो अब, पल्लवित हुई है ऊसर भूमि 

शशि-किरण सा रजतमय है जीवन,कामनाएँ हैं अर्णवी- उर्मि 

 

गूँथ कर शब्दों को किया था सृजित कभी व्यथा की वाटिका 

प्रत्येक पुष्प में थी कृष्णिमा,लतिकाएँ थी जैसे मृत कोशिका 

उस वाटिका में तुम बन मयूख, किया अंकुरित श्रृंगार सुमन  

माधविका से पूर्ण है, सुरभित है अब मेरा रास-झंकृत उपवन 

 

 

नहीं,अब नहीं है इच्छा शून्य ग्रह की,मौन मृत्यु की,प्रलय की 

स्यात्, प्रतीची के प्रतिबिम्ब में हो.. रक्तजबा की अग्नि सी।

 

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2-यवनिका

 

निशीथ की  निविड़ता में मायाविनी अरण्या 

समस्त आवेगों की महानदी,अव्यक्त अवर्ण्या 

पर्णपटल पर अंकित रिक्तता के रक्तिम अक्षर 

अस्पृश्य है वर्तमान,प्रतित प्रश्न का प्राक प्रस्तर

 

प्राजक्ता का प्रेम केवल निशार्ध की नहीं नियति 

अंतिम महोदधी की परिधि में आबद्ध स्वीकृति 

तिल मात्र व्यथा में क्षताक्त यह सुदीर्घ अंतराल 

केवल नहीं है स्वप्नहीन निद्रा का अंतहीन काल 

 

काम्य है अनृत मुहूर्त की.. एक अदिष्ट अभीप्सा  

अपहृत यौवन के अर्धजीवित श्वास की प्रतीक्षा 

अग्नि-पुष्प के प्रणय में,दग्ध होता विछिन्न विरह 

कहो, तरंगित तृषा में क्यों है मरीचिका निवह?

 

 

मुग्धगंधा के पक्ष्म पर है मेघप्रिया की मधुलिका 

आह! हो रही अवनत शेष अभिनय की यवनिका।

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