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शनिवार, 24 अगस्त 2024

501

 

भूरी पुतली- से बादल /  डॉ. कविता भट्ट

 


आएँगे कब और कैसे बादल

बरखा की बूँदों को लेकर

शीतलता के घरौंदों को लेकर

चुभती धूप का अनुभव भुलाने

काली घनघोर दिशाओं को सहलाने

 

आएँगे कब और कैसे बादल

रेशम का सा ओढ़े आँचल

सम्भवतः स्पर्श हुआ मलमल

बेला साँझ की सुरभित स्वप्निल

घुमड़-घुमड़ और मचल-मचल

लाएँगे कब और कैसे बादल

 

पेड़ों की सरसराती पत्तियों पर

चाँदी की चमकती बूँदें बिखेरकर

अपने कोमल तन को पिघलाकर

जल लाएँगे कब और कैसे बादल

 

कभी-कभी तो तरसा जाते हैं

मेरे मन को चोल़ी पंछी-सा

भीगे स्पर्श की कल्पनाएँ लेकर

मेरे मन को कल्पनाओं को साकार कर

आएँगे कब और कैसे बादल

 

किसी रूपसी के काले केशों-से

किन्हीं नैनों के सुन्दर काजल-से

और भूरी पुतलियों के कजरारे आभास से

भूखण्डों के नीले पर्वत- शिखरों पर

जलधारा के श्वेत सोते

लाएँगे कब कहाँ से बादल

 

ब्रज अनुवाद- रश्मि विभा त्रिपाठी

 


ऐहैं कबुक अरु काहिं बदरा

मेहा की बूँदनि लै

सियराई के घरौंदनि लै

कुचति घाम कौ अनुभव बिसराइबे

कारी घनघोर दिसनि सहराइबे

 

ऐहैं कबुक अरु काहिं बदरा

रेसम कौ सौ ओढ़ैं अँचरा

जु पै अनछुयौ भयौ मलमल

संझा बिरिया गमकति सपुने नाई

घुमड़ि घुमड़ि अरु आरि करत

 

ल्यावैंगे कबुक अरु काहिं बदरा

रूखनि की सरसरावति पातिनि पै

रूपे की चमकति बुँदियाँ बगराइ

अपुने अल्हर आँगु कौं टिघराइ

जल ल्यावैंगे कबुक अरु काहिं बदरा

 

कभऊँ कभऊँ तौ तरसाइ जावत

मोरे हिय कौं चोली पच्छी सौ

भींजे परस की कल्पना लै

मोरे हिय की कल्पना कौं साकार करि

ऐहैं कबुक अरु काहिं बदरा

 

काऊ रूपसी की कारी अलकन नाई

कोऊ नैननि के सुघर अंजन नाई

अरु भूरी पुतरिन के कजरारे आभास नाई

भू खण्डन की लीली परबत चोटिनि ऊपर

जलधारा के सेत सोता

ल्यावैंगे कबुक किततैं बदरा।

-0-

बुधवार, 10 अप्रैल 2024

494-बहन के लिए

 1-ताँका

रश्मि विभा त्रिपाठी


1

सुरभित हों

तुम्हारे आँगन में

सुख के फूल

जीवन में अनंत

तुम्हारा हो वसंत।

2

पूरे हों सब

जो तुम्हारी आखों में

सपने जगे

तुम्हें कभी किसी की

नज़र नहीं लगे।

3

उगे सूरज

तुम्हारे आँगन में

पूर्व से आके

मिटे सब अँधेरा

हो सुख का सवेरा।

4

निकले चाँद

तुम्हारे आँगन में

झरे चाँदनी

हर रात पूनम

चमके चम- चम।

5

बहे सुख की

तुम्हारे आँगन में

ये सदानीरा

गिरि से उतरके

कल- कल करके।

6

तुम्हारी भोर

रजनी हो या साँझ

या दोपहर

हर एक पहर

हो सबसे सुंदर। 

7

तुम्हारे घर

गूँजें हर पहर

गीत खुशी के

चंदा, सूरज, तारे

आँगन में हों सारे।

-0-

2-माहिया- रश्मि विभा त्रिपाठी

 1

सपना हम पाल रहे

अपनी आँखों में

बहना खुशहाल रहे।

2

पूनम की रातें हों

हों दिन सब उजले

खुशियों की बातें हों।

3

ना तुमको नज़र लगे

प्यारी बहन तुम्हें

मेरी भी उमर लगे।

4

खुश हो, आबाद रहो

ओ मेरी बहना

तुम ज़िंदाबाद रहो।

5

पल हों सबसे प्यारे

आँगन में उनके

उतरें चंदा- तारे।

6

रब इतना करो अता

खुशियों को दे दो

उसका तुम आज पता।

7

दिन हों आनंद पगे

उनकी खुशियों को

ईश्वर ना नज़र लगे।

8

इतना भगवान करे

तेरे होठों से

हर पल मुसकान झरे।

9

ईश्वर ऐसा कर दो

उसके दामन में

सारी खुशियाँ भर दो

10

गम की ना धूप रहे

निखरा- निखरा- सा

तेरा ये रूप रहे।

11

सुख का झूला झूलो

ओ मेरी बहना

तुम खूब फलो- फूलो।

12

रब! इतना काम करो

जग भर की खुशियाँ

बहना के नाम करो।

13

कोई न अधूरा हो

प्यारी बहना का

हर सपना पूरा हो।

14

पल को भी ना तरसे

मेरी बहना के

आँगन में सुख बरसे।

15

बिकसें ये सूर्यमुखी 

मेरी बहना का

रब हो संसार सुखी।

16

मेरी प्यारी बहना

अपना ख़्याल रखो

तुम मेरा हो गहना।

17

होठों से हास झरे

मेरी बहना के

दिन हों उल्लास भरे।

18

हरदम पुर-नूर रहो

मेरी बहना तुम

चश्मे बद्दूर रहो।

19

इस जन्मदिवस पर मैं

दुआ करूँ, रहना

तुम खुशियों के घर में।

20

मंदिर में जाकरके 

सुख माँगा तेरा

झोली फैलाकरके। 

(06-04-2024)