शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

520-चूमकर मेरी हथेली

 

चूमकर मेरी हथेली/ डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'


 

बहुत सुकोमल नहीं

खुरदुरी- सी हैं, हथेलियाँ मेरी;

स्पर्श का सुख हो, न हो;

किन्तु निष्ठा है इनमें।

रेखाएँ दिखती नहीं इनमें,

बहुत परिश्रम किया है इन्होंने;

क्योंकि संघर्ष अस्तित्व का था।

अब तुम चूम लो हाथ मेरे;


ऐसे
, जैसे कोई सिद्धपुरुष या योगी

अभिमन्त्रित कर देता है-

एक काला धागा या भोजपत्र।

तुम भी चूमकर मेरी हथेली-

इस पर कुछ रेखाएँ बना दो।

कोई कुछ भी कहे, मत सुनना।

तुम मेरे लिए हठ करके;

यदि सिद्ध बन जाओ;

तो मेरा वचन है- मिथ्या न होगा।

हमारी विजयगाथा पीढ़ियाँ बाँचेंगी।

 

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

519

 कैसी अजीब विडम्बना है/  डॉ. वंदना शर्मा 

 

कैसी अजीब विडम्बना है  

चुप रहने से बच जाते हैं रिश्ते  

कुछ बोलो तो बिखर जाते हैं रिश्ते  

 


जरूरत ही नींव होती किसी रिश्ते की  

जरूरत खत्म, अनजान हो जाते हैं रिश्ते  

 

बातों से शुरू रिश्ता कोई  

समाप्त खामोशी पर होता है  

 

कितनी बार मन को मारना पड़ता है  

सम्मान से समझौता करना पड़ता है  

कुछ ख्वाब दफन करने होते हैं  

कुछ आंसू छिपाने होते हैं  

तब कोई रिश्ता निभाना पड़ता है  

 

ज्ञात हैं चालाकियाँ सारी दुश्मन की  

विडम्बना तो देखो मेरी  

हंसकर गले लगाना पड़ता है  

आंख में आंसू लिए मुस्कराना पड़ता है  

 

झूठ सुनना ही पसंद है दुनिया को  

सच कहो तो अपमान ही सहना पड़ता है  

 

पैसों से आज दोस्ती खरीदते हैं लोग

बिना पैसे के हर चेहरा अनजाना लगता है  

 

है एक ही मौसम बारिश का सबके लिए  

छत हो जिसके सर पर  

उसे ही मौसम सुहाना लगता है  

 

दिखावा करने वाले रहते हैं दोस्तों की भीड़ में  

सच में रिश्ते निभाने वाला  

आज भी सबको बेगाना लगता है

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डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 

vandna.reporter@gmail.com