कैसी अजीब विडम्बना है/ डॉ. वंदना शर्मा
कैसी अजीब विडम्बना है
चुप रहने से बच जाते हैं रिश्ते
कुछ बोलो तो बिखर जाते हैं रिश्ते
जरूरत ही नींव होती किसी रिश्ते की
जरूरत खत्म, अनजान हो जाते हैं रिश्ते
बातों से शुरू रिश्ता कोई
समाप्त खामोशी पर होता है
कितनी बार मन को मारना पड़ता है
सम्मान से समझौता करना पड़ता है
कुछ ख्वाब दफन करने होते हैं
कुछ आंसू छिपाने होते हैं
तब कोई रिश्ता निभाना पड़ता है
ज्ञात हैं चालाकियाँ सारी दुश्मन की
विडम्बना तो देखो मेरी
हंसकर गले लगाना पड़ता है
आंख में आंसू लिए मुस्कराना पड़ता है
झूठ सुनना ही पसंद है दुनिया को
सच कहो तो अपमान ही सहना पड़ता है
पैसों से आज दोस्ती खरीदते हैं लोग
बिना पैसे के हर चेहरा अनजाना लगता है
है एक ही मौसम बारिश का सबके लिए
छत हो जिसके सर पर
उसे ही मौसम सुहाना लगता है
दिखावा करने वाले रहते हैं दोस्तों की भीड़ में
सच में रिश्ते निभाने वाला
आज भी सबको बेगाना लगता है
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डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
