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शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

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कविताएँ

डॉ.विजय प्रकाश
1
केवल संघर्ष ही नही जिंदगी में
बातें हर दौर की करता हूँ मैं
भूखे-प्यासे बचपन के
 दो कौर की करता हूँ मैं।
सूखती नदियों, कटते जंगलों
की पीड़ा पर गौर करता हूँ मैं
बदलेगी मानसिकता, सँभलेगा मानव
बरसेगी खुशहाली, झूमेगा जीवन
उम्मीद उस दौर की करता हूँ मैं।
2
मस्त मलंग, जोश ही जोश,
उमंग ही उमंग।
अनंत को पाने की लालसा,
जिज्ञासा भरा मन।
भेदभाव, ऊंच-नीच,
तेरे-मेरे से से परे।
मधुबन में फूल सा,
 खिलता रहे बचपन।।
-0- हे... गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर (गढ़वाल) उत्तराखण्ड

ई-मेल - vijaybhatt66@gmail.com