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शुक्रवार, 3 मई 2019
गुरुवार, 1 नवंबर 2018
86
[ डॉ. कुमुद बंसल , निदेशक हरियाणा साहित्य अकादमी के निर्देशन में महाविद्यालय के विद्यार्थियों को लेखन से जोड़ने का एक अभियान चलाया गया । आज हमने ‘नवांकुर’ स्तम्भ के अंतर्गत उनकी रचनाएँ नीलाम्बरा पर देने की शुरुआत की है . आशा है। अन्य रचनाकारों को भी हमारा यह प्रयास पसंद आएगा ।
डॉ.कविता भट्ट, हेमवती नन्दन बहुगुणा ,केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर , गढ़वाल (उत्तराखंड ) ]
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1-मोहन लाल
जरा -सा सँभलकर उड़ना ए परिंदों
परों को काटने वाले अपने भी होते है...
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2- माँ ( माहिया छंद )
राहुल लोहट
1
कष्टों का हरण करें
मिलती हैं खुशियाँ
माथा माँ-चरण धरे।
2
दु:ख, सुख बन हँसते हैं
सारे ईश्वर- गुण
माँ के मन बसते हैं।
3
कड़वाहट मन भाती
मीठी डाँटे माँ
अनुशासन सिखलाती।
4
हँसती शीतल बनके
माँ की सब बातें
हिम्मत बन दिल खनके।
5
भोली माँ सूरत है
पर भोली सूरत
ईश्वर की मूरत है।
6
शीतलता काया में
है आनंद मिले
ममता की छाया में।
7
फूलों की डाली है
माँ सूरज किरणें
माँ सुख की प्याली है।
8
मन हर्ष सजाता है
माँ मुखड़ा दीपक
अँधकार मिटाता है।
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3-कीमत
हिमांशी धीमान (पानीपत)
रोशनी की कीमत वो जानता है,
जिसने कभी अँधेरे को सहा हो।
मकान की कीमत वो जानता है,
जो कभी सड़कों पर रहा हो।।
मेहनत का मतलब वो जानता है,
जिसका कतरा-कतरा ख़ून बहा हो।
खुशियों की कीमत वो जानता है,
जिसने जीवन में दुःख सहा हो।
जीत की कीमत वो जानता है,
जो हर कोशिश में हारा हो।
सम्मान की कीमत वो जानता है,
जो अपनों की नज़र में बेचारा हो।
पैसों की कीमत वो जानता है,
जिसने जीवन में गरीबी देखी हो।
ईमान की कीमत वो जानता है,
जिसने हमेशा की बस नेकी हो।
प्यार की कीमत वो जानता है,
जिसने उसका इंतज़ार किया हो।
विश्वास की कीमत वो जानता है,
जिसने धोखे का घूँट पिया हो।
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सोमवार, 22 अक्टूबर 2018
85
सदा मेरे पास
पूनम सैनी
सुना है लोगों से,
जो नहीं होते ,
वे भी होते है इस जहान में;
दूर टिमटिमाते तारे के रूप में।
देखते है हमें वहीं से ,
दूर से मुस्कुराते हुए।
तो आप किस तारे में छिपे है?
किस ओर खोजूँ मैं आपको?
क्या देखते हो आप मुझे भी वहाँ से?
गर आप भी हो उस आसमान में,
तो चमको ना मेरी आँखों आगे!
जो नहीं होते ,
वे भी होते है इस जहान में;
दूर टिमटिमाते तारे के रूप में।
देखते है हमें वहीं से ,
दूर से मुस्कुराते हुए।
तो आप किस तारे में छिपे है?
किस ओर खोजूँ मैं आपको?
क्या देखते हो आप मुझे भी वहाँ से?
गर आप भी हो उस आसमान में,
तो चमको ना मेरी आँखों आगे!
कह दो ना यहीं हूँ मैं,
पास तुम्हारे।
देखो ना पापा ,ये सावन ,
ये घटाएँ, ये बिजली
क्यों चले आते है?
कहो ना मेघों को
ना बरसें कभी।
कह दो हवा से
बहाले ये इन घटाओं को।
चाँद भी तो नहीं बिखेरता
सदैव यूँ ही रोशनी।
तो कैसे देखूँ मैं आपको7
इन असमर्थ आँखों से।
सच कहूँ!
ये हवाएँ भी अहसास कराती है मुझे,
आपके होने का।
छू लेते हो अपने आशीष भरे हाथों से
मेरे सर को।
उस रात जब जन्मदिन था मेरा,
और कड़की थी बिजली रात के सन्नाटों में,
कहो-
तुम ही थे ना पापा।
जानती हूँ ,
यही हो साथ अपनी बिटिया के,
आस-पास हमेशा...
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पास तुम्हारे।
देखो ना पापा ,ये सावन ,
ये घटाएँ, ये बिजली
क्यों चले आते है?
कहो ना मेघों को
ना बरसें कभी।
कह दो हवा से
बहाले ये इन घटाओं को।
चाँद भी तो नहीं बिखेरता
सदैव यूँ ही रोशनी।
तो कैसे देखूँ मैं आपको7
इन असमर्थ आँखों से।
सच कहूँ!
ये हवाएँ भी अहसास कराती है मुझे,
आपके होने का।
छू लेते हो अपने आशीष भरे हाथों से
मेरे सर को।
उस रात जब जन्मदिन था मेरा,
और कड़की थी बिजली रात के सन्नाटों में,
कहो-
तुम ही थे ना पापा।
जानती हूँ ,
यही हो साथ अपनी बिटिया के,
आस-पास हमेशा...
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रविवार, 14 अक्टूबर 2018
84
[ डॉ. कुमुद बंसल ,
निदेशक हरियाणा साहित्य अकादमी के निर्देशन में महाविद्यालय के विद्यार्थियों को लेखन से जोड़ने का एक अभियान चलाया गया । आज हमने
‘नवांकुर’ स्तम्भ के अंतर्गत उनकी रचनाएँ नीलाम्बरा पर देने की शुरुआत की है . आशा
है। अन्य रचनाकारों को भी हमारा यह प्रयास
पसंद आयेगा ।
डॉ.कविता भट्ट, हेमवती
नन्दन बहुगुणा ,केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर , गढ़वाल (उत्तराखंड ) ]
खुशबू कुमारी की कविताएँ
( हरियाणा साहित्य
अकादमी की लेखन -परिष्कार कार्यशाला की प्रतिभागी
छात्रा )
1-प्यार का दर्द
मैंने पूछा उससे,
मैं तुम्हारी क्या
हूँ ?
उसने कहा -तुम ज़मीं,
मैं आसमान हूँ।
मेल न होगा हमारा
कभी,
तुम आने वाली सुबह,
मैं ढलती शाम हूँ।
प्यार उन लोगों के
बीच होता है,
जिनमें कोई भेद
नहीं,
तुम शीतल जल,
मैं आग का गोला,
ये कहने में मुझे
खेद नहीं।
तुम प्यार की मूरत,
मैं नफरत की सूरत,
हमारे बीच कई हैं
फासले।
फिर किसलिए हम साथ
चलें ?
यह उसका कहना है,
संग न हमें रहना
है।
सब कस्मे -वादे भूल जाओ तुम,
फिर से नई दुनिया
बसाओ तुम।
कैसे उसको भूल जाऊँ
मैं,
सब कुछ पीछे छोड़
जाऊँ मैं।
रिश्ता था जो प्यार
का,
कैसे उसको तोड़ जाऊँ
मैं।
अजीब-सी
कश्मकश में फँसी
हूँ,
नहीं पता मुझे मैं
कहाँ खड़ी हूँ।
रस्ता कोई दिखता
नहीं है,
बिना दाम कुछ टिकता
भी नहीं है।
प्यार का दर्द तो
सहना ही पड़ेगा,
हर किसी को प्यार
मिलता जो नहीं है।
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2- दो सच जीवन के
सुख दुःख हैं दो सच
जीवन के,
जीत मिलेगी तुमको
भी फिर,
तुम खुद का विस्तार
करो ।।
जहाँ अँधेरा घेरे
उदय को,
उजियारा बन नाम करो
।
लक्ष्य को पाने की
खा़तिर,
कोशिश तुम हज़ार करो
।।1।।
चुनौतियों से नहीं
डरो तुम,
पर्वत उच्च विशाल
बनो ।
भय से काँप जाए
शत्रु भी,
तुम ऐसी एक मिसाल
बनो ।।2।।
भारत माँ के लाल हो
तुम,
माँ का अपनी मान
करो ।
इसकी सुरक्षा की
ख़ातिर,
प्राण को अपने दान
करो ।।3।।
मातृभूमि है जान
तुम्हारी,
मातृभूमि से प्यार
करो ।
संस्कार को नहीं भूलना
,
कोई बुरा न काम करो
।।4।।
दुःख जीवन में जब
भी आए,
कदम न पीछे चार करो।
रण में लड़ते वीर की
भाँति,
तुम भी दो-दो वार करो
।।5।।
सुख दुःख हैं दो सच
जीवन के,
कठिन डगर को पार
करो ।।
जीत मिलेगी तुमको
भी फिर,
मन में यही विचार काम
करो ।।
-०-पता-
म न०- 10530,नज़दीक
सुभाष पहलवान अखाड़ा, काबुल
बाग, कुटानी
रोड, पानीपत-132103
ई-मेल -Khushbookumari1312014@gmail.com
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