काव्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
काव्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

मेरे आलाप

        मेरे आलाप
जब भी सूनी राह में मुड़कर देखा
विकल दृष्टि ने तुम्हें ही पाया
इसको मन का भ्रम कहूँ झूठा या
अंश स्वयं के पदचापों की प्रतिध्वनि का
अधिकांश निरुत्तर ही रहती हूँ
बस खोयी हुई चलती रहती हूँ
कभी आगे-कभी पीछे देखते हुए
तुम्हारे ही अनुभव का भाव लिये।
भाग्य नहीं दयालु इतना मेरा
कि तुम्हें मुझे वह दे दे पूरा
अंशों में जीती हूँ किन्तु यह बंधन,
तुम्हारे आभास का एक पूरा जीवन।
इसी में पीड़ा लेकर मुस्काना,
अर्धचेतन सा तुम्हें रटते जाना।
कुछ सीमाओं की घनघोर विवशता,
और कुछ अपनी ही अनिश्चतता।
सम्भवतः विवशता कभी तो टूटेगी,
पल-पल की अनिश्चतता छूटेगी।
तब तुम पूर्ण मेरे ही होओगे,
जब मेरे आलापों में खोओगे।


-0-

तुम्हारी प्रतीक्षा में

 डॉ.कविता भट्ट

ठंडी रातों को पेड़ों के पत्तों से टपकती व्यथा है
बसन्त की आगन्तुक रंगीन परन्तु मौन कथा है                                                                                         तुम्हारी प्रतीक्षा में......
चौंककर जागती हूँ जब कभी रात में
पास अपने न पाती हूँ तुम्हें रात में
विरहिणी बनी मैं न अब सोऊँगी
इसी पीड़ा के कड़ुवे सच में खोऊँगी
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......
बसंत है परन्तु उदास है बुरांसों की लाली
रंगों की होली होगी फीकी खाली थी दिवाली
खुशियाँ खोखली और हथेलियाँ हैं खाली
राहें देख लौटती आँखें उनींदी ,बनी हैं रुदाली
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......
प्रेमी पर्वत के सीने पर सिर रखकर सोती नदी ये
धीमे से अँगड़ाई लेकर पलटती सरकती नदी ये
कहती मुझे चिढ़ा कहाँ गया प्रेमी दिखाकर सपने झूठे 
चाय की मीठी चुस्कियाँ बिस्तर की चन्द सिलवटें हैं
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......   
अब तो चले आओं ताकि साँसों में गर्मी रहे
मेरे होंठों पर मदभरी लालियों की नर्मी रहे
चाहो तो दे दो चन्द उष्ण पलों का आलिंगन
बर्फीली पहाड़ी हवाओं से सिहरता तन-मन
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......    
अपने प्रेमी पहाड़ के सीने पर
सिर रखकर करवटें बदलती नदी,
बूढ़े-कर्कश पाषाण-हृदय पहाड़ संग,
बुदबुदाती, हिचकती, मचलती नदी।
तुम्हारी प्रतीक्षा में......

-0-

इनमें खो जाऊँ

    डॉ.कविता भट्ट
ये घुँघरू बजाती अप्सराओं -सी नदियाँ
अभिसार को आतुर ये बादल की गतियाँ

बर्फीले बिछौनों पर ये अनुपम आलिंगन
सुरीली हवाओं के उन्नत पहाड़ों को चुम्बन

ये घाटी, ये चोटी ये उन्नत हिमाला
कन्या -सी कड़ी शांति लिये पुष्पमाला

कभी गुनगुनाती, कभी गुदगुदाती
धूप प्रेयसी सी उँगलियाँ फिराती

मंगल गाते वृक्ष-लताएँ लिपटे समवेत
स्वर्ग को जाती सुन्दर सीढ़ियों- से खेत

युगल-पक्षियों की प्रणय रत कतारें
मृग-कस्तूरी सी सुगन्धित अनुपम बयारें

अपनी ही प्रतिध्वनि कुछ ऐसे लौट आए
जैसे प्रेयसी को उसका प्रियतम बुलाए

इस प्रतिध्वनि में डूब ऐसे खो जाऊँ
पद-धन-मान छोड़ बस इनमें खो जाऊँ

-0-

समर्पण

डॉ.कविता भट्ट
आजीवन पिया को समर्थन लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी ।

निज आलिंगन से जिसने जीवन  सँवारा
प्रेम से तृप्त करके अतृप्त मन को दुलारा ।

उसे आशाओं स्वप्नों का दर्पण लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी

प्रणय -निवेदन उसका था वो हमारा
न मुखर वासना थी; बस प्रेम प्यारा ।

उससे जीवन उजियार हर क्षण लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण  लिखूँगी ।

न दिशा थी, न दशा थी जब संघर्ष हारा
विकट-संकट से उसने हमको उस पल उबारा ।

उसमें अपनी श्रद्धा का कण-कण लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी

कौन कहता है जग में प्रेम जल है खारा
मैंने तो मोती-सीप सागर से ही पाया ।

इस जल पे जीवन ये अर्पण लिखूँगी

प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी।