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शनिवार, 22 मार्च 2025

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निर्दिष्ट दिशा में (सॉनेट )

अनिमा दास 

सॉनेटियर 

कटक, ओड़िशा 

 


 

एक संकेत सा.. एक रहस्य सा.. काव्य प्रेयसी के घनत्व में 

रहते हो तुम, हे कवि! तुम अनंत रश्मियों का हो एक बिंदु 

नहीं होते जब तुम परिभाषित अनेक शब्दों में.. अपनत्व में 

नक्षत्रों में होते तुम उद्भासित बन संपूर्ण अंतरिक्षीय सिन्धु 

 

मेरे जैसे कई कहते हैं तुम लघु में हो वृहद.. वृहद में अनंत 

जब घन अरण्य में चंचल होती चंद्र-किरण, मैं कहती हूँ 

कविवर के शब्द पंच रूप से हो निस्सृत सप्त अक्षर पर्यंत 

पुनः पंच रूप में होते आबद्ध, मैं उस चित्रकल्प में रहती हूँ 

 

प्रत्येक छंद में संचरित प्राण.. तमस में भी होता आलोकित 

यह प्रकाश.. यह निर्झर..शैलशीर्ष की यह लालिमा समस्त 

करते प्रश्न.. कहो कवि कैसे तुम वर्णमाला को किए जीवित 

क्या ये वही अर्ण हैं, जो तुम्हे किया है पाठक हृदयाधीनस्थ? 

 

तुम्हारे अवतरण से महार्णव की शुभ्र-उर्मियाँ हुईं काव्यमय 

हुई महीयसी, कथा हुई संपूर्णा..प्रस्फुटित हुआ किसलय। 

गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

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सॉनेट/ अनिमा दास 

 

1.स्त्री का स्वर (सॉनेट)

मौनता की भाषा यदि होती..मृदुल -सहज व सरल

द्रुमदल न होते अभिशप्त..आ:! न होता अंत वन का 

न स्रोतवती होती शुष्क,न मेघों में होता अम्लीय जल 

न होता अज्ञात अभ्र में लुप्त एक पक्षी.. मृत मन का।

 

न होती यक्ष-पृच्छा..न मिथ्या विवाद की धूमित ध्वनि 

न कोई करता अनुसरण सदा अस्तमित सूर्य का कभी 

न पूर्व न पश्चिम न उदीची से.. प्रत्ययी पवन की अवनि  

न होती नैराश्य-बद्ध..निगीर्ण ग्लानि में रहते यूँ..सभी।

 

यह जन्म उसी प्राचीन इतिहास का है एक भग्नावशेष 

निरुत्तर निर्मात्री..पुरुष-इच्छा की स्त्री.. मौन-मध्याह्न 

स्वर में नीरव अध्वर..शून्य भुजाओं में अंतिम आश्लेष 

प्रतिक्षण ध्वस्त होते इसके कण-कण,हैं अर्ध अपराह्न।

 

यदि हुई अभिषिक्त यह उर्वि..यदि हुआ नादित अंभोधर 

प्रतिगुंजित होगा अंतरिक्ष में तब अविजित स्त्री का स्वर।

 

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2. प्रेम पर्व (सॉनेट -30)

 

मंदर पर सप्तरंग का आँचल,सखी,आओ उत्सव गीत गाओ

मदमत्त भ्रमर करे पुष्प संग प्रीत..कृष्ण रास संग रच जाओ

मुग्ध मन नृत्य करता.. है स्निग्ध किरणों में सम्पूर्णतः तन्मय

रूप यौवन का हो रहा तीर्ण...गमक रहा... कर रहा अनुनय।

 

प्रेम हो रहा व्यक्त सखी कि रक्तिम हुआ आह!प्राच्य आकाश 

स्वप्नगुच्छ हुआ स्फुटित..शतदल के सरोवर में आया प्रभास

पीत रंग ने किया स्पर्श.. मुखमंडल हुआ स्वर्ण सा अरुणित

मंद-मंद स्वर में कहा प्रेम ने 'सुनो प्रिया तुममें मैं हूँ प्लावित।'

 

इस नगर में नहीं रहा जीवन यदि... स्वर्गीय -संभव- सरल

यदि वसंतकुंज में भी... समस्त पीड़ाएँ रहीं. सदैव जलाहल 

कोई प्रतिवाद नहीं होगा..न होगा मृदु वेणु-ध्वन. न वंशीवट 

दृगोपांत में अश्रुमिश्रित परागरेणु से सिक्त होगा कालिंदी तट।

 

 

प्रेम पर्व की वर्तिका हो रही प्रज्वलित.. जीवन हुआ फाल्गुन 

मन के कोण-अनुकोण में गूँज रही गीतप्रिया की..मधुर धुन।

 

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बुधवार, 6 मार्च 2024

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व्यथा का शृंगार (सॉनेट) 

 अनिमा दास 


व्यथा का शृंगार (सॉनेट)
 

श्याम-वर्ण सी व्यथा...श्वेत वर्ण से स्वप्न

इस दूरत्व में हुए हरित...शोण से क्षरित

कस्तूरी सी इच्छा स्पंदित...सदैव गंधित

किंतु मौन..नहीं है इसके कंठ में निस्वन।

 

इस युग में भी एकपर्णी मैं..द्विपर्णी कथा

स्त्री-पुरुष की सभ्यता में बनी हूँ... संदेह

मैं कहूँ -सभी नीरव..अभिशाप- सा स्नेह

मेरी प्रत्येक स्थिति है..व्यथा केवल व्यथा।

 

सुप्त शुक्ति में ऊषा-शुभ्रा..मुक्ति-कामना

में रत..। देव-वेदी पर दीप्त है एक दीपक 

कि स्वतः आ जाए कृष्ण हंस पर...चंद्रक 

तम के तप में न लुप्त हो जाए...प्रार्थना।

 

सम्मिलित स्वर में उठे हैं जलधि में ज्वार

कि उद्वेलित व्यथाएँ करने लगी हैं शृंगार।

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