रविवार, 7 अगस्त 2022

380-प्रयत्न

 

राजीव रत्न पाराशर (केलीफोर्निया)

 

 सम्भावना हर स्वप्न को साकार कर देगी। 


प्रेरणा,कौतुक का,  आविष्कार कर देगी॥

 

हर मर्म का संकोच, मीमांसा रही होगी

समाधान का स्रोत जिज्ञासा रही होगी

उत्तर उन्हीं को प्राप्त जिनके प्रश्न थे पर्याप्त

खोज की  पतवार,  नैया पार कर देगी। 

 

उत्सुक विधा, परिपक्व का जब साथ पाएगी। 

थाम कर उँगली  अतुल उत्साह  पाएगी। 

बस मार्गदर्शन चाहिए मौलिक विचारों को

फिर स्वतः प्रज्ञा भी उन्हें स्वीकार कर देगी

 

प्रश्न को सम्मान दें, अधिभार ना कर दें। 

ज्ञान को विस्तार दें, व्यापार ना कर दें। 

जब सभी उपलब्धियाँ सबको सुलभ होंगी

तब सफलता प्रयत्न को नमस्कार कर देगी।

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बुधवार, 3 अगस्त 2022

378-नीलाम्बरा-4 (महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ )

 

1-रमेशराज

 

 नीलाम्बरा' का अमृतमंथन अंक अभिनन्दन-योग्य

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डॉ कविता भट्ट
'शैलपुत्री' एवं डॉ रत्ना वर्मा द्वारा संपादित व  रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' तथा कृष्णा वर्मा के विशिष्ट वैचारिक विमर्श व सहयोग से प्रकाशित नीलाम्बरा का अमृतमंथन जुलाई-2022 अंक बेहद सारगर्भित और सार्थक इसलिए लगा क्योंकि यह एक ऐसा समय है, जिसमें छद्म देशभक्ति का उन्माद पूरे विश्व के स्तर पर मानवीय मूल्यों को तहस नहस करने पर तुला है। पूरे विश्व में राष्ट्रीय गौरव का छद्म मुखौटा लगाए पूंजीवाद का पिशाहच अब नए-नए तरीकों से भोली जनता को गुमराह कर उसका दोहन करने को आतुर है। उसने शोषण के नए-नए तरीके ईजाद कर लिए हैं।

इस कुचक्र को विराम लगे। सर्वमंगल हो, इसके लिए ही क्रांतिवीर धरती पर जन्म लेते आ रहे हैं। अंग्रेजों के शोषणकारी साम्राज्य को मिटाने के लिए जिन आज़ादी के दीवानों ने भारतवर्ष में क्रांति की मशाल जलायी, अपने प्राणों का उत्सर्ग किया, उनकी साहसिक गाथाओं पर नीलाम्बरा का उक्त अंक फोकस ही नहीं डालता, सबसे बड़े अफसोस के साथ यह सवाल भी करता है कि अब क्रांतिकारियों को क्यों बिसराया जा रहा है? इस बात को अपने एक दोहे के माध्यम से यूँ रखा जा सकता है-

यूँ हम पर हाबी हुआ, इस युग पूंजीवाद

अब अच्छे लगते नहीं, भगतसिंह, आज़ाद।

क्रांतिकारियों का पावन स्मरण कराता यह अंक क्रांतिकारी भगवानदास माहौर, बटुकेश्वर दत्त, तात्याटोपे आदि क्रांतिकारियों के अमूल्य संस्मरणों का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। इसके अतिरिक्त समाज के विविध ज्वलंत विषयों/समस्याओं पर भी विभिन्न आलेखों के माध्यम से पाठकमन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। लोकप्रिय लघुकथाओं का गढ़वाली अनुवाद इस अंक को बेहद महत्वपूर्ण बनाता है। काव्य का पक्ष भी बड़े दक्ष तरीके से संजोया गया है। अंक में मेरे बालगीतों को स्थान देने हेतु आभार। अंक की जितनी तारीफ की जाए, कम।

*रमेशराज

सम्पादक-तेवरीपक्ष, अलीगढ़

कई दिन से बीमार चल रहा था, इसी कारण नीलाम्बरा के अमृतमंथन अंक पर टिप्पणी न दे सका। आज उपरोक्त टिप्पणी डाल दी है।कविताओं को स्थान देने हेतु आपका शतशत आभार।

सादर

रमेशराज

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2-रघुवीर शर्मा

 

लोकप्रिय वैश्विक पत्रिका “नीलाम्बरा” जुलाई 2022 का अमृत-मंथन अंक विविध वर्णी साहित्यिक रचनाओं से संपन्न है। परामर्शदाता आदरणीय रामेश्वर


काम्बोज “हिमांशु” जी
, संपादक डॉ कविता भट्ट “शैलपुत्री” जी तथा पत्रिका परिवार का श्रम स्तुति योग्य है. पत्रिका का संपादकीय “स्वतंत्र राष्ट्र और कर्तव्य परायणता” समसामयिक और पठनीय है। “धरोहर”स्तंभ में हमारी साहित्यिक धरोहर, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी और रामनरेश त्रिपाठी जी की राष्ट्रीय रचनाओं की उपस्थिति अमृत महोत्सव काल में चिंतन के स्तर पर मन को सुख दे रही हैं। “नीव की ईट”स्तंभ में शहीद भगत सिंह के साथी बटुकेश्वर दत्त पर आलेख, चंद्रधर शर्मा गुलेरी के साहित्य में राष्ट्र चिंतन जैसे कई सम सामयिक आलेख चिंतन को नई दिशा देते हैं। कहानियां,यात्रा संस्मरण, डायरी और काव्य-वीथी स्तंभ भी उत्कृष्ट और आकर्षक हैं।

    मेरे तीन गीतों को भी इस अंक में स्थान देने के लिए पत्रिका “नीलाम्बरा” परिवार का आत्मीय आभार.

          रघुवीर शर्मा

          खंड़वा म.प्र.

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सोमवार, 1 अगस्त 2022

377-रक्षा-कवच / कुलदीप जैन

(बहुत ही  दु:खद समाचार है कि श्री कुलदीप जैन का  31 जुलाई  2022  रात शाहदरा दिल्ली  में देहान्त हो गया। वे लघुकथा -जगत् के पुराने एवं चर्चित लेखकों में  से एक थे। उनकी 1989 में बरेली लघुकथा  सम्मेलन में पढ़ी गई लघुकथा -रक्षा-कवच  का मेरा गढ़वाली अनुवाद ,श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत है)

 गढ़वाली अनुवाद: डॉ. कविता भट्ट

 

उ चारि नेवादै कि बदनाम बस्ती क उछियदि आज बि अपडा शिकारै कि खोजम छा। भले ई स्टेट


पुलिस टकटकि हुईं छै

, पर पुलिस वळो तैं चकमा देण वु जणदा छा। भलु हो वीं अण्डरवर्ल्ड पत्रिका कु, जम्मा सिकार पर कनमां झपटे जाउ, यु चित्र कि दगडि समझयूं छौ।

"क्लार्क देखा, सैत क्वी कार च।"

"सैत, सैत से तुमरु क्य मतलब च, तुम इतगा दिन बिटि हम दगडि छां-तुम इतगा बि अंदाज नि लगै सकदां कि" कु वळि मैक कि गाड़ी च। "

गाड़ी फोर्ड कारखानै कि नयि मॉडल लगणी च। विचार क हिसाब से वु चारि सड़कि म पोडी गे छा। जोर सि ब्रेका दगडि 'मिनी लिण्डा' रुकी और धड़ाम सि दरवाजा खुलिन-बिगरैलि नौनी क हत्थ म पिस्तौल छै।

 -देखा तुरन्त भगी जावा, तुमरी बदमासी सैरू अमरीका जाण गे।

उ चारि बेरोजगार ज्वान घबरै गेन। उ चुपचाप उठिक अर एक तरफ जाण लगि गेन। ज्वान नौनी विजयी अंदाज माँ लापरवाह चाल से पलटी अर ठंडू करिक कारौ कु दरवाजु ख्वेली। उ चारि बाजै कि सि फुर्ती सि वीं ज्वान नौनी पर झपटिन अर अँधेरै तरफां लिजाण लगि गे। ज्वान नौनी भले ई उं कि ये कमाण्डो कि तरां तरिका सि हैरान छाई, पर व न तो चिल्लाई च अर न ई चिल्लै-चिल्लैकि हथ-खुटटा मारेन।

' फाड़ द्या ईं का कपडा फैड्रिक" नफरत सि जॉन हिट्टन न बोली। आदेसौ कु पालन ह्वे। ज्वान नौनी नांगी ई रेगिस्तानी धरती पर पणी छै अ र वु झपटण सि पैलि अपडा सिकर तैं परेखण लग्याँ छा।

 -पीटर देख धौं, कन मुल-मुल हैंसणी च-मि तैं त रन्डी लगणी च।

कुलदीप जैन

 
-पर मि तैं त कालेज गर्ल या सेल्स गर्ल लगणि च। नौनी अब भी मुल-मुल हैंसणि छै।

 –सैत ईं का सौंजड़ीया न ईं तैं ध्वका दे ह्वाल, इलैई ईंन हल्ला किलै मचौण।

"ऐ छोरी! क्य त्वी तैं हम देखिकी डौर नि च लगण लगीं?"

"अपडु काम करा अर जावा," आराम से नांग्गी पड़ी नौनी न बोलि। वीं की यीं बात पर चारियों न एक-दूसरै कि तरफां देखि अर कुछ असमंजसै कि स्थिति माँ ऐ गेन।

"दरसल, जब तक हमारू सिकार चिलाउू-तड़पू ना, हम मज़ा ई नी आन्दु।"

"चुप हरामी औलाद" , जान चिल्लै अर नौनी पर झुकि गे, वा अब बि मुल-मुल हैंसण लगीं छै। जान परेशान ह्वे ग्याई।

"अच्छा अगर तु इन बतै दे कि त्वे हम देखि डौर किलै नि लगदु, ह्वे सकदु हम त्वे तैं छोड़ द्यौं।"

 –"पर मि छुटण नी चान्दु, अपडु काम जल्दी खत्म करा, मि तैं देर हुणी च।"

ईं बात पर चरियों न एक दूसरै तरफां देखि। अचानक फैड्रिक न नौनी की तरफां खचाक से चाकू ताणी दे-"बोल-जल्दी बोल कि तू हम देखि डन्नि किलै नी छैं।"

नौनी तैं अपडु अस्तित्व मिटदु दिखे। वींकी हैंसी गैब ह्वे गे छै। वा कौंपण लगि गे-उन बि नांगी

कुंगळु सरीर ठण्डी रेत माँ कौं हि छौ।

 -"जु मि नी चान्दु छौ, आप मि तैं वीं बातौ तैं ई मजबूर कन्ना छां। मि 'एड्स' की मरीज छौं। सैकिण्ड स्टेज म चन्नु छौं।"

इतगा सुण छौ कि वु चारि भूतै कि तरां अँधेरा म गैब ह्वे गेन। नौनी न इनां उन्नां पड़याँ फट्याँ कपड़ा उठैन अर कार म जैक बैठि गे। वा पत्रकार नौनी अपडी सफलता पर मन ही मन मुल-मुल हैंसणी छै।

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मूल हिन्दी लघुकथा पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक को क्लिक कीजिए-

 रक्षा-कवच


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शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

376-नदी माँ (हरिगीतिका)

रोशनी पोखरियाल (चमोली, उत्तराखंड)

     1  

आवाज देती है कहीं माँ, आ रही हूँ शैल से,


माँ दौड़ती कैलाश से
, है भीत नंदी बैल से ।

आधार धारा है बनी माँ, छोड़ आई रूप को ,

कैलाश में भोले शिवाला, छोड़ आई भूप को ।।

2

बाधा अनेकों राह में हैं, माँ सभी को लाँघती,

संसार को देने चली वो, है नहीं माँ माँगती ।

शाखा-विशाखा पेड़ -पौधे, हैं खड़े तेरे लिए,

देते तुझे वे फूल -पाती, वे खिले आभा लिए ।।

3

मोती बनी है श्वेत बूँदें, फूल- माला हाथ में ,

आशीष भोले का लिये ,आई शिवानी साथ में ।

माँ ज्ञानधारा को लिए,  है बाँटती संसार में,

आती लुटाती जा रही माँ, प्यार गंगा धार में ।।


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सोमवार, 25 जुलाई 2022

374-छोटी सी जिंदगी

 जितेंद्र राय 'जीत'(उत्तराखंड)

 

 


मरियल
- सा हो गया था वह, कंकाल मात्र। पिछले माह उसके आस पास बहुत चहल पहल थी, बहुत लाड़ प्यार से लाया गया था उसे यहाँ। बहुत से लोगों की आँखों का तारा- सा हो गया था वह। फूले नहीं समा रहा था वह भी।फिर अचानक न जाने क्या हुआ, उसके आसपास जो चहल पहल थी, वह उस दिन के बाद फिर न दिखी उसे। जिस स्नेह की वर्षा उस पर की जा रही थी, वह बादल फिर बने ही नहीं ।

          उस दिन के ठीक एक माह और 12 दिन बाद अचानक फिर से वही चहल-पहल उसे महसूस हुई अपने आसपास। मरणासन्न था वह, तब भी धुँधली आँखों से कुछ कुछ देख पा रहा था। बहु-त से लोग थे, जिस हर्ष और उल्लास के साथ उसे यहाँ लाया गया था, आज कुछ और लाए जा रहे थे। हँसी, ठहाकों से गुंजित हो उठी थी मरुधरा। आँखें बंद होने लगीं, तब भी कुछ कुदालों की आवाजें, मिट्टी हटाने की खर- खर और तालियों की गड़गड़ाहट वह सुन पा रहा था।


 
फिर उसे रौंदते हु
ए कई लोग जाने लगे, वह मृत्यु के आगोश में समा गया।

  5 जून को रोपी गई उस नन्ही जान की जान कब निकल गई, उसे रोपने वाले को भी नहीं पता। नया पौधा हर्षित है अभी, किन्तु कल....

-0-्चित्रः गूगल से साभार