मंगलवार, 4 जुलाई 2023

465-चार रचनाकार

 1-डॉ.सुरंगमा यादव

पीड़ा का संसार

 


विचलित कर पाएगा मुझको

क्या यह पीड़ा का संसार

पीड़ाएँ बन अंतर्दृष्टि

जीवन रहीं निखार

सुमन देखकर लोभी बनना

मुझे नहीं स्वीकार

मुस्काते अधरों से ज्यादा

सजल नयन से प्यार

गहरा है करुणा का सागर

कितने हुए न पार

कुहू-कुहू में रमकर भूलूँ

कैसे करुण पुकार

दुख है अपना सच्चा साथी

सुख तो मिला उधार

तुम्हें रुठना था ही मुझसे

भाती क्यों मनुहार

प्रेम तुम्हारा कैसा था ये

जैसे हो उपकार।

-0-

2-सुरभि डागर

माँ


 

शब्दों में भी कम हैं

वह पुस्तक है माँ

जीवन देकर दुनिया में

लाती है माँ

तप रहे हो पाँव

धूप में, फिर भी

मुस्कुराती है माँ

जीवन के अँधियारे में

संग रहती है माँ

तपती धूप में आँचल

बन जाती है माँ

घर के कोने-कोने में

खुशबू बन जाती है माँ

फटकारती है तो भी

ममता लुटाती है माँ

तेज़ झोंके में साया

बन जाती है माँ

सही राह की ओर

फेर दे रुख़ख जो

वह‌ शक्ति है माँ

नौ दिन बन दुर्गा

भरती है झोली

वह भक्ति है माँ

-0-

3-स्वाति बर्णवाल

1-जीवन और साहित्य

 


जीवन में साहित्य का होना

और साहित्य में जीवन का होना

चाहे मुश्किल हो, लेकिन बहुत जरूरी है।

 

बालमन का 

अरमानों से सजना 

चाहे मुश्किल हो, लेकिन बहुत जरूरी है।

 

कठिन समय में,

उम्मीदों से धैर्य बँधाना 

चाहें मुश्किल हो, लेकिन बहुत जरूरी है।

 

मन-अपंग, टूटी-सोच को 

भावों की पट्टी बाँधना 

चाहें मुश्किल हो, लेकिन बहुत जरूरी है।

 

जीवन में कमजोरी होना,

अनदेखा, अनहोनी हो

तुलसी के जैसे, मन पर काबू पाना 

चाहें मुश्किल हो, लेकिन बहुत जरूरी है।

 

रंग मिलें न मिलें 

मन से मन का मिलना

चाहें मुश्किल हो, लेकिन बहुत जरूरी है।

 

जीवन में साहित्य का होना

और साहित्य में जीवन का होना

चाहे मुश्किल हो, लेकिन बहुत जरूरी है।

-0-

2-खुद से लड़ती लड़कियाँ 

 

 बाहर-बाहर छवि दिखती है 

अन्दर-अन्दर तम रहता है।

खुलती हैं जब चौंधियाई ऑंखें

सब्र की कलई भी खुल जाती है।

 

समय के पृष्ठ पर 

मटमैली भी अजनबी के 

फ़ुटप्रिन्ट्स पर

अपनी पहचान बनाए चलती है!

 

बार- बार किस्मत की चाबी भी

सतपुड़ा के घने जंगलों में खो जाती है l

एक मेरा मन जो धरती की 

हरियाली ऊपर सफे़दी ओढ़े सो जाता है!

 

गेरुआ में रँगी एक जोगिन 

भटकती रहती है

वृंदावन की गलियों में 

माँगती है हक अपना और

बढ़ता जाता है कर्ज मन्नतों का! 

 

जब भी बारिश होती है

वहम का सिक्का उछलता है! 

खुद से लड़ती लड़कियाँ 

एक दिन दुनिया जीत लेती हैं।

-0-

 4- पूजा 'शून्य'

कर रही हूँ सफर


 

सफर तेरे सपनों का

जानती हूँ, संघर्ष की मेरे

कोई कीमत नहीं किसी के लिए।

फिर भी पता नहीं क्यों,

बही जा रही हूँ समय के साथ।

कुछ अपने लिए, कुछ अपनों के लिए।

एक क्षण लगता है-

कहने में कि तू किसी काम की नहीं है।

कोई मेरे दिल से पूछे,

कैसा लगता है इसे।

जिनके लिए क्षण-क्षण पिसते हैं,

उन्हें वह चक्की ही दिखाई नहीं देती

 या... देखना ही नहीं चाहते।

जानती हूँ प्यार है, लगाव है,

सँभाल भी है; लेकिन मान नहीं मिलता।

तुमसे प्यार है परंतु माफ़ करना,

कोशिश बहुत की;

पर अभिमान न कर सकी तुम पर।

तुम जब, जैसे चाहो और जो चाहो,

वह सब सही।

इसलिए सब कुछ छोड़ तेरे लिए,

तेरे सपनों के लिए जीना सीखा,

लेकिन फिर भी तेरा साथ न मिला,

दुत्कार ही मिली हर मोड़ पर, हर कदम पर।

कितना भी चाहूँ तेरे संग चलने की,

तुम आगे निकल ही जाते हो।

और एहसास करवा ही जाते हो

 कि मैं तेरे बराबर नहीं, पीछे ही रहूँगी।

ख़ुश हूँ तेरे पीछे चलकर भी,

पर हाथ तो थाम ही सकते हो।

जैसे सात फेरे लेते हुए मुझे साथ रखा था,

क्या पूरी उम्र नहीं बीत सकती ऐसे।

समझ नहीं आता कि क्या करूँ!

थक गई हूँ।

नहीं मन करता अब और लड़ने का,

इस भाग्य से, इस जीवन से।

कहीं से हौसला भी तो नहीं मिलता,

अब तो शरीर भी साथ नहीं देता।

फिर भी कर रही हूँ सफर,

ज़िन्दगी का भी, तेरे सपनों का भी।

-0-

 

 

गुरुवार, 29 जून 2023

464-चार रचनाकार

1-प्रेम करती हो /सुदर्शन रत्नाकर

 




हाँ, करतीं हूँ मैं तुमसे प्रेम

पर तुम्हें पाना नहीं चाहती

देखती हूँ तुम्हें,

सितारों की झिलमिलाहट में

चाँद की चाँदनी में

नक्षत्र बन चमकते हो।

छूती है जब शीतल हवा

मेरे बदन को

महसूसती हूँ तुम्हारा स्पर्श

बर्फ की तरह ठंडा

बिन एहसास के।

जब महकते हैं चटक लाल गुलाब  

उनकी ख़ुशबू  से होते हुए  

मेरे दिल में उतरते हो

और छू लेते हो मेरी रूह को

जो भटकती है तुम्हें पाने के लिए

लेकिन, तुम केवल तृष्णा हो

मेरे मन की

अस्थायी है यह प्रेम

मुझे चाहिए पूरा प्रेम

जो आत्मा में बस जाए।

झिलमिलाहट नहीं  तारे चाहिए

चाँदनी नहीं, चाँद चाहिए

स्पर्श नहीं हवा चाहिए

ख़ुशबू नहीं, फूल चाहिएँ

दे सकते हो मुझे!

नहीं ना

फिर यह कैसा है प्रेम !

जो आत्मा में बसा ही नहीं

फिर क्यों पूछते हो मुझसे,

प्रेम करती हो

हाँ, करती हूँ मैं प्रेम

पर ऐसा प्रेम

जो आत्मा में समाकर

एकाकार हो जाए।

-0-ई-29,नेहरू ग्राउंड,फ़रीदाबाद 121001

-0-

2-बच्चे / डॉ. पद्मजा शर्मा

 


जिस घर में बच्चे

खिल-खिल हँसते हैं

उस घर में

किसी प्रार्थना की जरूरत नहीं

 

अभी सब चैन की नींद सो जाओ

कि जाग रहे हैं बच्चे

पृथ्वी पर

 

इस रात हम सब टहलने जा सकते हैं

कि बच्चों की निगरानी पर हैं

आसमान के सारे तारे

 

आओ बच्चों से तुतलाकर बात करें

कल ये बड़े हो जाएँगे

 

बच्चे चिड़ियों की तरह चहक रहे हैं

सीख लें इनसे चहकना

हम भी

 

अभी बच्चे सपनों में उड़ रहे हैं

अनंत आसमान में

ध्यान रहे कोई बाज न आ जाए

 

यह दृश्य कितना मनभावन है

कि ट्यूशन का समय है

और बच्चे गेंद खेल रहे हैं

 

सर्दी की धूप - से बच्चे

कच्चे सूत - से बच्चे

पहुँचे हुए अवधूत - से बच्चे

-0-डॉ. पद्मजा शर्मा,15 – बी, पंचवटी कॉलोनी ,सेनापति भवन के पास रातानाडा, जोधपुर (राज.) 342011

ई मेल – padmjasharma@gmail.com ।

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3-उत्फुल्ल नयन / डॉ. उपमा शर्मा

 


मैं धरती तुम निस्सीम गगन

तुमको तकते उत्फुल्ल नयन

 

जाना तुमने प्रिय सच कह दो

है बीच हमारे क्या बंधन

तुम हो पारस मैं लौह भले

तुमको छूकर  मैं हूँ कुंदन

माथे से छू कर ली जाती

तुम दीपक की वो लौ पावन।

मैं धरती तुम निस्सीम गगन

तुमको तकते उत्फुल्ल नयन।।

 

क्या जोड़ें हमको आपस में

नदिया के हम  दो छोर लगे

बँधकर अनुबंधों की जैसे

कोई रेशम की डोर लगे

मीरा जैसा ये प्रेम बना

कान्हा- सा तुझमें सम्मोहन ।

मैं धरती तुम निस्सीम गगन

तुमको तकते उत्फुल्ल नयन।।

 

कैसे  मैं  सारी  बात कहूँ

खोलूँ  ये  सारे   अवगुंठन

ऊसर मन का कोना- कोना

तुमसे हो जाता वृंदावन।

डूबा तुझमें मेरा तन- मन

जाने यह कैसा आकर्षण ।

मैं धरती तुम निस्सीम गगन

तुमको तकते उत्फुल्ल नयन।।

 

तेरी   मूरत  यूँ  मन  में  है

देवालय में हो देव कोई

पूजा करती निशदिन तेरी

सुध-बुध अपनी खोई-खोई।

 सुमिरन तेरा ही अब हर क्षण

करती  तेरा   मैं   हूँ  वन्दन।

मैं धरती तुम निस्सीम गगन।

तुमको तकते उत्फुल्ल नयन।।

 -0-डॉ. उपमा शर्मा, बी-1/248, यमुना विहार, दिल्ली-110053


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4-जन्मों का गठबंधन / अनिता ललित

  

बोली मुस्कान आँसू से

एक दिन आकर -

क्यों आते हो तुम -अँखियों में भर-भर?

हो मजबूर, मैं जाती हूँ बिखर!

 

बोला आँसू -

तुम आओ जो खिल-खिलकर,

मैं भी तो हो जाऊँ बेघर!

दया तुम्हें न आए मुझ पर?

दुख की गगरी संग मेरे -जब नैनों में भर-भर आती,

मेरे घर भी, उस पल हर सू -बहारें ही बहारें छातीं!

लेकिन जैसे ही चौखट पर, दबे पाँव से तुम आतीं -

देख के तुमको झूम ही जाती!

दुनिया मुझको भूल ही जाती!

दुनिया में सबको तुम प्यारी, अदा तुम्हारी सबसे न्यारी,

ओढ़ा दो अपनी चादर मुझको -ज़ालिम! साँसें रोके मेरी!

 उलझे दोनो आपस में -हुई खट्टी-मीठी तक़रार!

फिर मिल बैठे, लगे सोचने -होता ऐसा आख़िर क्योंकर?

दोनों जब जज़्बात के बस में –

फिर दुश्मनी क्यों आपस में?

देख नम मुस्कान की आँखें, आँसू हौले से मुस्काया,

दोनों के शिक़वों का उसको, राज़ समझ में अब आया!

 

थाम हाथ मुस्कान का, आँसू फिर उस से बोला -

अँखियों में जब मैं, भर आता -मुझमें वजूद तेरा मुस्काता!

जब भी तुम लब पर लहराती -अँखियों से मैं बह-बह जाता!

तुम मेरी! मैं तेरा! दोनों हम -

एक-दूजे के पूरक हैं हम!

ग़र तुम न हो -क्या हस्ती मेरी?

जो मैं नहीं -क्या क़दर तुम्हारी?

 

दुनिया क्या जाने साथ निभाना, ये ठहरी बेईमान!

ग़रज़परस्त, मतलबी यहाँ के - हैं सारे इंसान!

अपने अंधे सुख-दुःख में ये -हमको लाट बनाए है!

कभी सजाए, कभी बहाए, जी भर हमें नचाए है !

ग़ुलाम सही हालात के हैं हम -मगर अधूरे अलग-अलग हम!

अपना तो बस अनूठा बंधन -

ये है -जन्मों का गठबंधन!!!

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