गुरुवार, 30 जुलाई 2020

153-आके मिल जाओ


डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'



शाम -ए -महफ़िल है- मेरे दिल के मेहमान हो तुम।
मेरी चाहत है समंदर! फिर क्यों परेशान हो तुम?

सबने मुख मोड़ लिया, आँखें हैं नम, व्याकुल मन
दीप आँधी में जला लूँगी  कि मेरे भगवान हो तुम।


आके मिल जाओ- बादलों से गिर रही रिमझिम,
जानेमन,  जानेचमन, जानेवफ़ा, मेरी जान हो तुम।
       
 प्रियतम! दीपों की टोली, तुम रंग भी हो रंगोली।
 थाल पूजा का हो पावन कि मेरे घनश्याम हो तुम।

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

152-पत्थरों से लड़ी मैं


 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'


धड़कने बदलतीं  करवटें आजकल।   
 चाँद के भाल पर सलवटें आजकल।

यों तो अपना था वो मेरा, दोस्तों!     
महफिलों की जुबाँ नफ़रतें आजकल। 

आँखें हैं मौन , दिल भी खामोश है।
 देखो  सदमें में  गुरबतें आजकल।

 जिसे देखो वह रंग-रलियों में है।
 अब ना राँझे- सी   उल्फ़तें आजकल। 

पत्थरों से लड़ी मैं नदी की तरह।
उसकी सागर- सी हरक़तें आजकल।

बस समंदर ही था इक राहे- सफ़र।
नदी से उसे मोहब्बतें आजकल।

सोमवार, 27 जुलाई 2020

151- आज ये मन

डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री 
 कुमार सानू के साथ मेरी  आवाज़ में  युगल गीत सुनने के लिए स्वर-लहरी के इस   लिन्क को क्लिक कीजिए-
तुम देना साथ मेरा

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

150-इस सावन


डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री



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149-आज ये मन

डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री, 
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मुझे दे दो        

सोमवार, 20 जुलाई 2020

148-अभिरंजित काया



 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री, 

'रात की रानी' महक रही थी,


पिय आलिंगन बहक रही थी।

सपने सजाए, मधु-गीत गाए,
निज अधर धरे नैना उलझाए।

रख हृदय पर पिय के शीश।
माँगा अंजुरीभर शुभाशीष।

साँस- साँस तक नित प्रसार,
अभिरंजित काया अभिसार।

अहं मिटाया, किया समर्पण,
झाँका प्रिय आँखों में दर्पण।

नित बैठे पिय क्यों अहं धरे?
नेहडोरी टूटी औ सपने बिखरे।

न जाने थी कुटिल कौन घड़ी?
सिसकी रोकर वह मौन बड़ी।

न भावे- कहाँ वे मन-वचन गए।
क्यों तन-मन-जीवन रुदन भए।

दिन चार जीवित, बँधो भुजपाश,
तन-मन इक कर, झूलें आकाश।


शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

147-दो बाल कविताएँ


1- वीरांगना तीलू रौतेली
डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

साढ़े तीन सौ साल पुरानी,
यह गढ़वाल की है कहानी।
सुनकर तुम रखना बच्चो ध्यान,
तीलू रौतेली गाथा महान।

धम्मशाही  एक  राजा दुष्ट,
खैरागढ़ की प्रजा हुई रुष्ट।
तीलू  पिता  भुप्पू गोराला
जिन्होंने रणबिगुल बजा डाला।

युद्ध में दो पुत्रों को लेकर
भुप्पू माने प्राण ही देकर।
धम्मशाही का बड़ा अहम,
अन्याय नहीं  हो पाया खत्म।

चौदह बरस की छोटी उमर,
मन में तीलू के नहीं था डर।
कांडा मेले जाना हठ करे;
वही मैदान  जहाँ पिता मरे।

माँ ने  उसको बहुत समझाया;
लेकिन तीलू को नहीं भाया।
वीरबाला तीलू ने ठाना-
पिता के हर शत्रु को  हराना।

सखी साथियों को संग लेकर,
सेना एक बनाई भयंकर।
जीता तीलू ने  खैरागढ़;
मातृभूमि साथ बड़े कई गढ़।

तीलू को रण की चढ़ी थकान;
नयार नदी में  ज्यों किया स्नान।
घात लगाए सैनिक दो-चार;
किया निहत्थी तीलू पर वार।

नयार खून से हो गई  लाल
घायल तीलू हो गई  निढाल।
देवी-रूप वीरांगना वह महान
याद रखना तीलू  का बलिदान।

तुम भी ऐसे ही बन जाना,
हर शत्रु को यों मार भगाना।
कभी न युद्ध में पीठ दिखाना
मातृभूमि की शपथ निभाना।
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2-मेरी गुड़िया
डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'


मैया! खिली कलियाँ केली की;
ज्यों डोली गुड़िया अलबेली की।
नन्ही चिड़िया उड़ती फूलों पर; 
झूलती टहनी  के झूलों पर।

केली पर लटकी बेल चमेली,
झूमर बारात सजी सहेली।
मेरी गुड़िया है आज उदास;
जाना उसको  गुड्डे के पास।

वहाँ नहीं मिलेगा  ये बिस्तर;
मोबाइल, गेम ना  कम्प्यूटर।
फिर  यह कैसे यह वहाँ रहेगी।
मुझसे दूरी कैसे सहेगी?

इसे तो  मैं खूब पढाऊँगी,
अपने हाथों से सजाऊँगी।
पढ़ाई करके  बड़ी बनेगी
सबके भलाई सदा करेगी ।