शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

150-इस सावन


डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री



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149-आज ये मन

डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री, 
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मुझे दे दो        

सोमवार, 20 जुलाई 2020

148-अभिरंजित काया



 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री, 

'रात की रानी' महक रही थी,


पिय आलिंगन बहक रही थी।

सपने सजाए, मधु-गीत गाए,
निज अधर धरे नैना उलझाए।

रख हृदय पर पिय के शीश।
माँगा अंजुरीभर शुभाशीष।

साँस- साँस तक नित प्रसार,
अभिरंजित काया अभिसार।

अहं मिटाया, किया समर्पण,
झाँका प्रिय आँखों में दर्पण।

नित बैठे पिय क्यों अहं धरे?
नेहडोरी टूटी औ सपने बिखरे।

न जाने थी कुटिल कौन घड़ी?
सिसकी रोकर वह मौन बड़ी।

न भावे- कहाँ वे मन-वचन गए।
क्यों तन-मन-जीवन रुदन भए।

दिन चार जीवित, बँधो भुजपाश,
तन-मन इक कर, झूलें आकाश।


शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

147-दो बाल कविताएँ


1- वीरांगना तीलू रौतेली
डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

साढ़े तीन सौ साल पुरानी,
यह गढ़वाल की है कहानी।
सुनकर तुम रखना बच्चो ध्यान,
तीलू रौतेली गाथा महान।

धम्मशाही  एक  राजा दुष्ट,
खैरागढ़ की प्रजा हुई रुष्ट।
तीलू  पिता  भुप्पू गोराला
जिन्होंने रणबिगुल बजा डाला।

युद्ध में दो पुत्रों को लेकर
भुप्पू माने प्राण ही देकर।
धम्मशाही का बड़ा अहम,
अन्याय नहीं  हो पाया खत्म।

चौदह बरस की छोटी उमर,
मन में तीलू के नहीं था डर।
कांडा मेले जाना हठ करे;
वही मैदान  जहाँ पिता मरे।

माँ ने  उसको बहुत समझाया;
लेकिन तीलू को नहीं भाया।
वीरबाला तीलू ने ठाना-
पिता के हर शत्रु को  हराना।

सखी साथियों को संग लेकर,
सेना एक बनाई भयंकर।
जीता तीलू ने  खैरागढ़;
मातृभूमि साथ बड़े कई गढ़।

तीलू को रण की चढ़ी थकान;
नयार नदी में  ज्यों किया स्नान।
घात लगाए सैनिक दो-चार;
किया निहत्थी तीलू पर वार।

नयार खून से हो गई  लाल
घायल तीलू हो गई  निढाल।
देवी-रूप वीरांगना वह महान
याद रखना तीलू  का बलिदान।

तुम भी ऐसे ही बन जाना,
हर शत्रु को यों मार भगाना।
कभी न युद्ध में पीठ दिखाना
मातृभूमि की शपथ निभाना।
-0-
2-मेरी गुड़िया
डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'


मैया! खिली कलियाँ केली की;
ज्यों डोली गुड़िया अलबेली की।
नन्ही चिड़िया उड़ती फूलों पर; 
झूलती टहनी  के झूलों पर।

केली पर लटकी बेल चमेली,
झूमर बारात सजी सहेली।
मेरी गुड़िया है आज उदास;
जाना उसको  गुड्डे के पास।

वहाँ नहीं मिलेगा  ये बिस्तर;
मोबाइल, गेम ना  कम्प्यूटर।
फिर  यह कैसे यह वहाँ रहेगी।
मुझसे दूरी कैसे सहेगी?

इसे तो  मैं खूब पढाऊँगी,
अपने हाथों से सजाऊँगी।
पढ़ाई करके  बड़ी बनेगी
सबके भलाई सदा करेगी ।

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

कोरोना महामारी में मृत्यु से अमरता की ओर ...


कविता भट्ट 'शैलपुत्री

कोरोना पेंडमिक की इस त्रासदी में , उन लोगों ने  भी भारतीय संस्कृति के एक छोटे से अभिवादन
की अभिव्यक्ति के शब्द; नमस्कार को अपनाया , जो हमारी संस्कृति को पिछड़ी और आउट डेटेड कहकर हमारा मजाक उड़ाते रहते थे। स्वर्ण कीचड़ में हो या अपने परिष्कृत रूप में उसका मूल्य नहीं बदलता ,यही हाल हमारी गौरवशाली सनातन भारतीय संस्कृति का भी है ।

संस्कृति' शब्द संस्कृत भाषा की धातु 'कृ' (करना) से बना है। इस धातु से 3 शब्द बनते हैं-  'प्रकृति' (मूल स्थिति), 'संस्कृति' (परिष्कृत स्थिति) और 'विकृति' (अवनति स्थिति)। 

'संस्कृति'  का शब्दार्थ है- उत्तम या सुधरी हुई स्थिति ;यानी कि किसी वस्तु को यहां तक संस्कारित और  परिष्कृत करना कि इसका अंतिम उत्पाद हमारी प्रशंसा और सम्मान प्राप्त कर सके। सामान्य अर्थ में आधिभौतिक संस्कृति को संस्कृति और भौतिक संस्कृति को सभ्यता के नाम  से अभिहित किया जाता है। संस्कृति के ये दोनों पक्ष एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। संस्कृति  आभ्यंतर है, इसमें परंपरागत चिंतन, कलात्मक अनुभूति, विस्तृत ज्ञान एवं धार्मिक आस्था का  समावेश होता है। यदि इसे और सरलतम शब्दों में  अनुवादित किया जाए, तो जो बिगड़े को परिष्कृत(सुधार) करके अच्छे में बदल दे ;वही संस्कृति है ।

हमारा धर्म चार वेद स्तम्भों पर आधारित है । जिन्हें आज की पीढ़ी को ये बताकर पढ़ने से रोक दिया जाता है ,कि ये बस पूजा पाठ करने की किताबें हैं । इनको मात्र किताबें ...... ग्रंथ तक कहने में इन्हें शर्म आती है ,शायद हम यह भूल जाते है कि कभी इन पूजा पाठ की किताबों से ही संस्कृति सभ्यता और हमारे अपने सनातन हिन्दू धर्म, और हिन्दू होने की प्रमाणिकता सिद्ध होती है। 

वेदों के चार भाग हैं -  ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गति‍शील और अथर्व-जड़। ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई। ये आपको हर जगह मिल जाएगा ,अब कुछ अलग-अलग जानते हैं, शुरुआत करते हैं ऋग्वेद से । 

ऋग्वेद का उपवेद ( शाखा ) है ;आयुर्वेद ......

आयुर्वेद को लोग आजकल जड़ी बूटी वाला इलाज मानकर इसको न सुनने को तैयार हैं न पढ़ने को ।  आयुर्वेद का एक ग्रन्थ है; वृहत्त्रयी, जो चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता और अष्टाङ्गहृदयम् ग्रंथो को मिलाकर बना है । आज हम बस अष्टाङ्गहृदयम् की बात करेंगे, जो वाग्भट्ट जी द्वारा रचित है।  अष्टांगहृदय में आयुर्वेद के सम्पूर्ण विषय- काया , शल्य, शालाक्य आदि आठों अंगों का वर्णन है ।

अष्टांगहृदय में 6 खण्ड, 120 अध्याय एवं कुल 7120 श्लोक हैं। अष्टांगहृदय के छः खण्डों के नाम निम्नलिखित हैं-

1) सूत्रस्थान ( 30 अध्याय )
2) शरीरस्थान (6अध्याय)
3) निदानस्थान (16 अध्याय)
4) चिकित्सास्थान (22 अध्याय)
5) कल्पस्थान (6 अध्याय)
6) उत्तरस्थान (40 अध्याय)

इसमें से सूत्रस्थान में दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या, का वर्णन है। दिनचर्या से तात्पर्य आहार, विहार और आचरण के नियमों से है।
यहाँ तक कि नियमित क्या दिनचर्या होनी चाहिए ,इसके बारे में तक 11 अध्याय हैं । जिनका यदि पालन किया जाए ,तो कोई भी बीमारी हमे हो ही नहीं सकती है ।

1) प्रातःउत्थान ,2) मलोत्सर्ग ,3) दन्तधावन, 4) नस्य ,5) गण्डूष (मुँहधावन क्रिया/कुल्ले करना), 6) अभ्यंग (तैल मालिस) , 7) व्यायाम, 8) स्नान,  9) भोजन , 10) सद्वृत्त,  11) निद्रा (शयन)। 

वैज्ञानिक पुष्टि की बात की जय तो जेफरी सी हॉल, माइकल रोसबाश और माइकल डब्ल्यू यंग को चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान के लिए साल 2017 में नोबेल पुरस्कार के सम्मानित किया गया है । इन तीनों को बॉडी क्लॉक पर रिसर्च करने के लिए इस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। दरअसल, बॉडी क्लॉक से हमारे शरीर की जैविक क्रियाओं का पता चलता है । जीव-जंतुओं सहित सभी जीवित प्राणियों के भीतर शारीरिक प्रक्रियाओं में चलने वाला 24 घंटे का चक्र होता है, यह आपके जगने-सोने के समय, हार्मोन के स्राव, शरीर के तापमान सहित विभिन्न शारीरिक प्रकियाओं को नियंत्रित करता है।

इसे मेडिकल की भाषा में 'शरीर घड़ी' या 'जैवलय', 'जैविक घड़ी' कहते हैं, अंग्रेजी में इसे 'body clock', circadian rhythms, Biological rhythms या Biological rhythms कहते हैं । बॉडी क्लाॅक के गड़बड़ होने पर न केवल प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है, बल्क‍ि इससे सोचने-समझने और फैसले लेने की क्षमता पर भी असर होता है । यदि हम नियमित दिनचर्या को फॉलो करें तो न केवल अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते है बल्कि खुद को कई बीमारियों से बचा सकते हैं ।

विशेषत: धर्म का अर्थ है धारण करना ,और संस्कृति ; किसी भी सभ्यता का आधारभूत तत्व। सभ्यता के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए ,धर्म और संस्कृति का संयोजन अनिवार्य है। और जब संस्कृति को ही धर्म के रूप में अपना लिया जाता ,तो विकास के लिए अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। अपितु वो हमारे दैनिक कार्यकलापों से ही परिणीति पाता। संस्कृति को ही यदि धर्म के रूप में अपना लिया जाता ,तो ये विशुद्ध प्राकृतिक रूप होता। हम प्रकृति के अनुरूप ढल कर उसका हिस्सा होते। तब धर्म की परिकल्पना अपने विस्तृत रूप में साकार होती- सर्व कल्याणकारी ,लोकोपकारी...
अपनी जड़ों में लौटिए ,उसके अनुरूप आचरण करिये ,ताकि आने वाले वक्त में मानव विलुप्त प्रजाति की श्रेणी में आने के खतरे से बचा रहे।
-0-

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

145-গাইড


 गाइड-डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री 
अनुवाद-आशा बर्मन
গাইড                                                                  
ডা. কবিতা ভট্ট  

লাঞ্চের সময়েও 'নারী স্বাধীনতা আর সম্মান” নিয়ে আলোচনা হচ্চিল ।
প্রফেসর  শেখর কুমার কিছু একটা বলছিল |

ডাইনিংটেবিলে ওর ঠিক সামনেই একটি সুন্দর ফর্সা মেয়ে শালিনী  নিজের শাড়ীর আঁচল টা কোসে বেঁধে আগুন ভরা দৃষ্টি তে ওর দিকে তাকাল । এই দেখে শেখর 
কুমার হতভাগ হয় গেল। রেগে মেগে শালিনী হঠাৎ দাড়িয়ে পড়ল আর ওর বন্ধু নিশা কে বলল,"চল বন্ধু" ।
"হয়েছে কি?  নিশা প্রশ্ন করল ।
শালিনী উচ্চস্বরে বলল "ওঠ চল "।
 নিশা তখনি উঠে ওর পিছনে চলল ।
শালিনী, হঠাৎ তোর  কী হল ?" একটু চাপা স্বরে নিশা বলল ।
"আমার এই প্রফেসরের  কাছে কিছু প্রশ্ন ছিল, কিন্তু ও তো খুব বাজে  ।"
নিশা বলল , "হঠাৎ এই তোর কী হল ? বল না, ও কিছু অসভ্যতা করল না কি ?"
শালিনী বলল ," দেখ বন্ধু, তুই তো  জানিস,  রিসার্চে এই আমার সেকেন্ড ইয়ের ।
ভেবেছিলাম, এই প্রফেসর নারী স্বাধীণতা নিয়ে বেশ  ভালই বলতে পারে।ওর সাথে কথা বলে আমার রিসার্চের সম্বন্ধে কিছু জানতে পারতাম।"
নিশা বলল, "এতে ক্ষতি কী? ওর সাথে কথা বলতেই পারতিস ।"
শালিনী বলল ,"কি আর বলি, তুই দেখলী  না ? প্রথমে তো ও খুব সুন্দর ভাবেই কথা বলল। কিন্তু একটু পরেই ও আমার  দিকে যেভাবে তাকাচ্ছিল, সে আমার চেয়ে বেশি আর কে বুঝতে পারে ?  তারপরে কুৎসিত ভাবে আমার দিকে তাকিয়ে বলল,” আপনি তো খুব স্মার্ট।আপনাকে তো রিসার্চ পুরো করতে বেশি সময় লাগার কথাই  না। নির্লজ্জ কোথাকার ।"
নিশা বলল, " ছাড় এই সব কথা, আমিও এইরকম অনেক প্রফেসার  কে দেখেছি যারা সবার সামনে বড় বড় কথা বলে কিন্তু আসলে অমানুষ। না চাইলেও আমাদের  এদের গাইডেন্সেই কাজ করতে হয়।এই দুনিয়া  তে ভাল লোকের অভাব নেই। আমরাই এদের মত লোকদের শিক্ষা দিতে পারি।"
নিজের ঘরে যাবার আগে শালিনী পিছনে তাকিয়ে দেখল, শেখার কুমারের মুখটা একেবারেই ফ্যাকাশে হয় গিয়ে ছিল।

                                                                             অনুবাদক : আশা বর্মন