कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
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डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’
न जाने किनसे रुष्ट हो -
रोकर अपनी बात समझाना चाहती हो,
लेकिन किन्हें?
सामने तो पत्थर हैं
और पता ही होगा-
पत्थरों में
न रक्त, न धमनियाँ, न शिराएँ
न हृदय, न मन,
न ही आत्मा
इसीलिए तुम अब
अँधेरों में खो जाओ कविते!
संभवतः नियति यही है।
-0-डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’
डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
बरसाते
रहो /मधुमास तुम आते रहो-
रचनाकार :डॉ॰
कविता भट्ट: शैलपुत्रीय:
अनुवादक:राम प्रताप
सिंह
अब्बे सरधा पीती मम,किच्च नेहु बरसत्तु
जेत्थमिव जीवनत्तथा मधुमाह आवत्तु
मनस्सरणी आकुलता,विदूरे समुद्दा
नयनपच्छेन मग्गकांकर अपनयत्तु
मधुमाह आवत्तु
जगते सत्पीती नाम,कोपी अस्स न करत्तु
आसञ्दधन कप्पनेन सह सुरञ् मेलयत्तु।
चत्तारि दिवसेन सत्थ,पिरित्तिपथे चलन्तु
मधुमाह आवन्तु
ओधुक्किता उपवेत्थाकतम तोम परियोधनप्परि
पराच्छादन ।
कालञ् कालञ् भोत्तु हसती अपनयत्तु अब्ब मदञ् ।
मधुमाह आवत्तु
रचनाकार :डॉ॰
कविता भट्ट: शैलपुत्रीय:
अनुवादक:राम प्रताप सिंह
नग्गफनीयम वरधियम
परमहम वरधितुम नासक्कम
परिसमस्स कारमासीच्च
पुप्फवरुधम।
किञ्करन्नानि परम?
मम पुप्फपीती इतासीच्च यद
हिरिद्दीभूमीसिच्चने
अहमायू अतीता ।
मितानी पुप्फानी रदनञ्किता
ये अत्तमीसम कथयनुद्दानपालक इति कथयन्ती ।
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डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
अभी भी प्रतीक्षा है
उस क्षण की-
जब तुम कहते
कि प्रेयसी हो तुम-
तुम्हारी पलक झपकते ही
साक्षात् और जीवंत
हो उठती हैं
वेदों की ऋचाएँ
हाँ तुम्हारी मंद स्मित
रामायण- सी
पवित्र कर देती है
मेरी प्रत्येक कामना को।
तुम्हारी सघन केशराशि
एकमात्र प्रतीक है
सूत्रकाल के गुँथे हुए
अनगिनत रहस्यों की।
संहिताएँ ही तो हैं
तुम्हारे कंठ पर लिपटी हुई
चमेली के सुगंधित पुष्पहार में
जो मुझे मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
तुम्हारी श्वासों के स्वर ताल पर
नृत्य करती हुई प्रतीत होती हैं
असंख्य अप्सराएँ
स्निग्धा !
तुम्हारी वाणी से
निःसृत शब्दावली
ऋषिकाओं के श्रीमुख से उद्घाटित
अकाट्य सत्य है।
तुम मन्दराचल - समुद्र मंथन से
प्राप्त सुधा का कलश हो।
मैं याचक बनकर
तुमसे कुछ घूँट माँगता हूँ।
भय है तो केवल यही-
कि कभी तुम्हें आघात न दे दूं
तुम्हारा एक अश्रु भी
सृष्टि में प्रलय का सूचक है।
क्योंकि प्रेयसी हो तुम!
-0-डॉ . कविता भट्ट, श्रीनगर, उत्तराखण्ड