डॉ. कविता भट्ट
समीक्षा
भगत सिंह राणा 'हिमाद '
प्राची से पश्चिमांचल तक तेरी
फैली विस्तृत पर्वत माला है
उत्तर सीमा का रखवाला है
प्राण दान जन जीवन को देतीं
असंख्य सरिताओं की माला है
नत मस्तक हे नगाधिराज तुम्हें !
जहाँ बद्री औ केदार शिवाला है
चमकता है मुकुट भाल तेरा
शिखरों पर जो हिम की वलया
गंगा यमुना अलका सरस्वती
कण्ठसुरसरि कल-कल सलया
पुण्य धरा पर पूजित वेदों में
औषधियों का भण्डारण करता
हिम जल से सिंचित यह धरती
हिन्द महोदधि भी जल भरता
पुण्य सरोवर तुझमें ही बसते
घने अरण्य देवदारु के पलते हैं
तेरे ही मनोरम घाटियों में
फल फूल मनोहर फलते हैं
शिव पारवती करते हिम क्रीड़ा
कैलाश मानसर जग शान है
हे गिरी राज ! तेरे ही कारण
भारत की जगत में पहचान है
-0-
प्रो. इन्दु पाण्डेय खण्डूड़ी
जब
चारों ओर,
मौत
की दहशत पसरी है,
सूरज
की लालिमा में,
चिताओं
की धुआँ,
अपनी
कालिमा ले उड़ती है,
फिर
धू-धू की लपटों के साथ,
एक
अस्तित्त्व भस्मीभूत कर देती है।
धीरे- धीरे मौत का दर्द
दुखी
होने का अवसर कहाँ देता है।
एक
के बाद एक,
पूरा
परिवार महामारी में खत्म हो जाता है।
अख़बार
में एक ओर,
मौत
के आँकड़े, लाशों और चिताओं की
दिल
दहलाने वाली तस्वीरें,
और
इन सबके बीच एक नसीहत
दुःख
और अवसाद से बाहर निकल
जैसे
भी हो खुश रहना और इसके साथ ही
मौत
के सिलसिले में
बेमन
से ज़िन्दगी जीने की
कवायद
इंसान करने लगता है।
-0-
1-नैनों की भाषा
नैनों की भाषा लिपि में बदल न सकी,
वह पीड़ा शब्दों
में कभी ढल न सकी।
पहाड़ी नदी जाती तो
है दूर बहकर,
सागर में, बदली उड़ती वाष्प बनकर।
फिर पहाड़ पर पानी
बन बरसना ,
और बर्फ बन
चोटियों पर जमना ।
पत्थरों से घर्षण
और पीड़ा बहने की,
वाष्पीकरण की
प्रतीक्षा- दूर रहने की।
समझे भाषा नदी की, न पर्वत न सागर
स्वयं ही समझे नदी
अपने भीगे आखर।
-0- डॉ .कविता भट्ट, श्रीनगर
( उत्तराखण्ड)
-0-
2- वश में है
तुमने फूल खिलाए
ताकि खुशबू बिखरे
हथेलियों मे रंग
रचें ।
तुमने पत्थर तराशे
ताकि प्रतिष्ठित
कर सको
सबके दिल में एक
देवता ।
तुमने पहाड़
तोड़कर
बनाई एक पगडण्डी
ताकि लोग मीठी झील
तक
जा सकें
नीर का स्वाद चखें
प्यास बुझा सकें ।
तुमने सूरज से
माँगा उजाला
और जड़ दिया एक
चुम्बन
कि हर बचपन
खिलखिला सके
यह तुम्हारे वश
में है ।
लोग काँटे उगाएँगे
रास्ते मे
बिछाएँगे
लहूलुहान कदमों को
देखकर
मुस्कराएँगे ।
पत्थर उछालेंगे
अपनी कुत्सित
भावनाओं के
उन्हें ही रात दिन
दिल में बिछाकर
कारागार बनाएँगे ।
पहाड़ को तोड़ेंगे
और एक पगडण्डी
पाताल से जोड़ेंगे
कि जो जाएँ
वापस न आएँ।
सूरज से माँगेगे
आग
और किसी का घर
जलाएँगे ।
यह उनके वश में है
।
यह उनकी प्रवृत्ति
है
वह तुम्हारे वश
में है ।
-0- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ , नई दिल्ली
निर्मला भट्ट ( रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड)
हे मातृ शक्ति ! नमन तुझे,
तू धन्य है जगत प्रिये !
चरणों मे रखकर सिर तेरे,
नित करते रहे वंदन तेरा।
हे मातृ शक्ति ! नमन तुझे,
तू धन्य है जगत प्रिये !
माँ तूने हमे जीवन दिया, स्नेह से पोषित किया।
आँचल की ठंडी छांव देकर, तूने हमे तोषित किया।
तेरी परछाई मात्र से,
संकट जगत के सब टले।
तू आदि शक्ति अनंत है,
अखिल विश्व को जगमग किए।
तू स्वच्छ सरितामयी अमृत,
धार बनकरके बहे।
तू दिव्य पुष्पितपुंज है,
इस सृष्टि को सिंचित किए।
हे मातृ शक्ति ! नमन तुझे,
तू धन्य है जगत प्रिये !
तू घोर संकट काल में,
मानो कवच बनकर रहे।
काल के महाकाल से तू,
ढाल बनकरके लड़े।
तेरी अगम्य शक्ति से,
महाकाल भी डरकर गिरे।
हे मातृ शक्ति ! नमन तुझे,
तू धन्य है जगत प्रिये !
हम शब्द हैं ,
तू अर्थ है, तेरे बिना सब व्यर्थ है।
तू है तो जीवन समर्थ है,
तेरे बिना सब असमर्थ है
कैसे भुला दें उपकार तेरा,
हे मेरी करुणानिधे !
सर्वस्व जग पूजे तुझे,
तू विश्व को रोशन किए।
हे मातृ शक्ति ! नमन तुझे,तू धन्य है जगत प्रिये !
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