गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

493

 

सॉनेट/ अनिमा दास 

 

1.स्त्री का स्वर (सॉनेट)

मौनता की भाषा यदि होती..मृदुल -सहज व सरल

द्रुमदल न होते अभिशप्त..आ:! न होता अंत वन का 

न स्रोतवती होती शुष्क,न मेघों में होता अम्लीय जल 

न होता अज्ञात अभ्र में लुप्त एक पक्षी.. मृत मन का।

 

न होती यक्ष-पृच्छा..न मिथ्या विवाद की धूमित ध्वनि 

न कोई करता अनुसरण सदा अस्तमित सूर्य का कभी 

न पूर्व न पश्चिम न उदीची से.. प्रत्ययी पवन की अवनि  

न होती नैराश्य-बद्ध..निगीर्ण ग्लानि में रहते यूँ..सभी।

 

यह जन्म उसी प्राचीन इतिहास का है एक भग्नावशेष 

निरुत्तर निर्मात्री..पुरुष-इच्छा की स्त्री.. मौन-मध्याह्न 

स्वर में नीरव अध्वर..शून्य भुजाओं में अंतिम आश्लेष 

प्रतिक्षण ध्वस्त होते इसके कण-कण,हैं अर्ध अपराह्न।

 

यदि हुई अभिषिक्त यह उर्वि..यदि हुआ नादित अंभोधर 

प्रतिगुंजित होगा अंतरिक्ष में तब अविजित स्त्री का स्वर।

 

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2. प्रेम पर्व (सॉनेट -30)

 

मंदर पर सप्तरंग का आँचल,सखी,आओ उत्सव गीत गाओ

मदमत्त भ्रमर करे पुष्प संग प्रीत..कृष्ण रास संग रच जाओ

मुग्ध मन नृत्य करता.. है स्निग्ध किरणों में सम्पूर्णतः तन्मय

रूप यौवन का हो रहा तीर्ण...गमक रहा... कर रहा अनुनय।

 

प्रेम हो रहा व्यक्त सखी कि रक्तिम हुआ आह!प्राच्य आकाश 

स्वप्नगुच्छ हुआ स्फुटित..शतदल के सरोवर में आया प्रभास

पीत रंग ने किया स्पर्श.. मुखमंडल हुआ स्वर्ण सा अरुणित

मंद-मंद स्वर में कहा प्रेम ने 'सुनो प्रिया तुममें मैं हूँ प्लावित।'

 

इस नगर में नहीं रहा जीवन यदि... स्वर्गीय -संभव- सरल

यदि वसंतकुंज में भी... समस्त पीड़ाएँ रहीं. सदैव जलाहल 

कोई प्रतिवाद नहीं होगा..न होगा मृदु वेणु-ध्वन. न वंशीवट 

दृगोपांत में अश्रुमिश्रित परागरेणु से सिक्त होगा कालिंदी तट।

 

 

प्रेम पर्व की वर्तिका हो रही प्रज्वलित.. जीवन हुआ फाल्गुन 

मन के कोण-अनुकोण में गूँज रही गीतप्रिया की..मधुर धुन।

 

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सोमवार, 1 अप्रैल 2024

492-उसकी चुप्पी

 डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'




उसकी चुप्पी- 

मेरे भीतर उतर आई हो 

कहीं जैसे; 

करने को आतुर हों 

अनन्त यात्रा 

मेरी आत्मा तक 

उसकी आँखें 

यों देख रही हैं 

एकटक मुझे 

भीतर से भीतर तक 

अभी तो स्पर्श भी न किया

 फिर ये कैसा जादू है!

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बुधवार, 6 मार्च 2024

490

 

व्यथा का शृंगार (सॉनेट) 

 अनिमा दास 


व्यथा का शृंगार (सॉनेट)
 

श्याम-वर्ण सी व्यथा...श्वेत वर्ण से स्वप्न

इस दूरत्व में हुए हरित...शोण से क्षरित

कस्तूरी सी इच्छा स्पंदित...सदैव गंधित

किंतु मौन..नहीं है इसके कंठ में निस्वन।

 

इस युग में भी एकपर्णी मैं..द्विपर्णी कथा

स्त्री-पुरुष की सभ्यता में बनी हूँ... संदेह

मैं कहूँ -सभी नीरव..अभिशाप- सा स्नेह

मेरी प्रत्येक स्थिति है..व्यथा केवल व्यथा।

 

सुप्त शुक्ति में ऊषा-शुभ्रा..मुक्ति-कामना

में रत..। देव-वेदी पर दीप्त है एक दीपक 

कि स्वतः आ जाए कृष्ण हंस पर...चंद्रक 

तम के तप में न लुप्त हो जाए...प्रार्थना।

 

सम्मिलित स्वर में उठे हैं जलधि में ज्वार

कि उद्वेलित व्यथाएँ करने लगी हैं शृंगार।

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गुरुवार, 22 फ़रवरी 2024

489

 

रश्मि विभा त्रिपाठी

1


कब तुझपे
मेरा इख़्तियार है
मगर फिर भी
तेरा इंतजार है।
2
मेरी ज़िन्दगी की किताब में
और क्या कुछ खास है
हर हर्फ में सिमटा हुआ
सिर्फ तुम्हारा ही एहसास है।
3
न यूँ प्यार से मिलो
जब कल जुदा हो जाओगे
और तुम मेरे लिए
उस पल खुदा हो जाओगे।
4
मुझमें इस तरह से
गुम हो
मुझमें मैं कहाँ हूँ
सिर्फ तुम हो।
5
सिर्फ़ अपने से मतलब
न प्यारी दूजे की ख़ुशी
ऐसों को चाहना है
एक तरह की ख़ुदकुशी!
6
लोग
जो दिल से मिलते हैं
दुनिया में
मुश्किल से मिलते हैं।
7
तुम्हें जो प्यार कर पाए
पूरी शिद्दत से
बगैर कुछ भी चाहे,
ऐसा शख़्स मिलता है
इत्तेफ़ाक से
किसी जनम में
कभी गाहे- बगाहे।
8
अफसोस दिल में पनाह दी
कैसों- कैसों के लिए
जो मर गए जरा- सी देर में
चंद पैसों के लिए।
9
कितने खुश होते हैं
कहाँ मलाल करते हैं
किसी का लोग जब
इस्तेमाल करते हैं!
10
काश! कोई तो दे दे
इस सवाल का जवाब
क्यों पहनते हैं लोग
चेहरे पर नकाब?
11
जिसके नाम
मैंने
अपनी ज़िन्दगी लिखी
उसको मुझमें
सिर्फ
जरूरत ही दिखी।
12
मैं क्या करूँ
कोई बताए कुछ तरकीब
हर बार छल जाता है
मुझको मेरा नसीब।
13
क्या बुरा है
मुझ पर ये अजाब आना
मैंने खुदा को छोड़कर
एक बुत को खुदा माना।
14
चश्म- ए- दीदा- ए- पुरनम नहीं
तू साथ है अब कोई गम नहीं।
15
बाद मुद्दत के भी
लम्स- ए- खुशबू की
वो तासीर जिन्दा है
एक सूखा हुआ गुलाब
मेरी किताबों में
अब भी महकता है।

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गुरुवार, 4 जनवरी 2024

487

 

तुम मेरे दोनों जहान हो।

रश्मि विभा त्रिपाठी

 


तुम्हारे अधर
भावों की निर्मल गंगा का उद्गम
शब्दों की लहर
मन को जब छू जाती है
मोक्ष दे जाती है
पापा ने
मेरे सर पर से
उसारकर
दुआ के मंत्र पढ़कर
जो
सिक्के
अर्पण किए थे,
तलहटी से
उभरा
तुम्हारी छवि में
वही शुभाशीष हो तुम

तुम्हारे बोल
कण्ठ की गागर में
अमृत का घोल
या करते हैं कलोल
ज्यों भोर में पाखी
गाते हैं
वेद- ऋचाएँ
सबद, रमैनी, साखी

तुम्हारी मुस्कान
मेरा विहान
दिया जिसने मुझे
नव जीवन का अनुदान
ये आशा का हरा- भरा उद्यान
मानो चटकी कली या
फूलों का खिलना
या घाटियों में
मलयानिल का झोंका
तुमने कर्णधार बन
वास्तव में
विषाद के भँवर से
मुझे उबारकर
किनारे पर लगा दी
मेरी डगमग होती नौका

तुम्हारी आँखें
मेरा खुला आसमान
फैलाकर पाँखें
मैं भर रही हूँ उन्मुक्त उड़ान

तुम्हारा चेहरा
पूरनमासी का चाँद
जब- जब भी सामने आती हो
यकायक
छँट जाते हैं काले बादल
दूधिया- सा रंग रातों में
बातों- बातों में
छितराती हो

तुम्हारी आवाज़
नीरवता में
एक सुरीला साज
मन नाच उठता
छोड़करके लोक- लाज

तुम्हारी चितवन
मेरी आकाशगंगा
तिमिर पर पड़ा तिलंगा
झिलमिल तारे
रोशनी के फव्वारे
और
मेरी सुबह का उजाला,
सूरज की पहली सुनहली किरण का प्याला
घूँट- घूँट गटकती हूँ
निखरती हूँ, दमकती हूँ

तुम्हारे हाथ
हैं चारों दिशाएँ भी,
मेरे भाग की रेखाएँ भी
तुमने थामा
तो
हर रेखा
औचक चमचमाती
जहाँ मैं चलूँ
हर दिशा मुझको राह दिखाती

तुम्हारी उँगलियाँ
मेरी अकसीर
पोर- पोर की तासीर
मिटा देती है
गहरी से गहरी पीर

तुम्हारे पाँव
इस धरती पर मेरी जन्नत
मुझे रखना यहीं
यही मन्नत

तुम्हारा माथा
मेरा मुकद्दर
मेरी कामयाबी का
शिखर

तुम्हारा आँचल
मेरा सावन
तपन की साजिशें
मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पातीं
बनकरके घन
तुम मुझपे बरस जातीं
मेरा तन- मन
राहत पाता है
बच्चों- सा
छिपकर तुम्हारी ओट में,
करके झात खूब खिलखिलाता है
तुम्हारी गोद
मेरा आनन्द- मोद

तुम्हारा आलिंगन
अकेलापन
हर लेता
भर लेता
मेरी उदासी खुद में
और मुझे देता
स्नेह की धूप के कन
जी के झरोखे से
जो धूप
छन- छनकर आती है
कुलाँचें मारता मेरा मन
छाती जुड़ा जाती है

तुम मेरी धुरी हो
तुम्हारे इर्द- गिर्द घूमता है
दिन- रात
मेरे ख़याल का चक्का
मुझपे चढ़ा
तुम्हारा रंग पक्का

मेरे भीतर बसी
तुम मेरी जान हो
मेरा गर्व,
मेरा मान हो
तुममें मेरी दुनिया
तुम मेरे दोनों जहान हो।