सोमवार, 5 जून 2023

459-बीज

 

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष

प्रवीण गुगनानी

 


चढ़ता सूरज

उभरती आशाएँ

खुलते जंदड़े*

खिलती मुस्कान।

 

जब तक

तुम बाहर निकलोगी ए, जिंदगी

सूर्य का तेज जा चुका होगा

स्वागत करेगी तुम्हारा

वर्षा की कुछ बूँदे

स्वाति नक्षत्र की।

 

बस अपना मुँह खुला रखना

आकाश की ओर ताकते रहना

बादल आएँगे

बरस जाएँगे

तुम्हे सराबोर कर जाएँगे।

 

बरसते बादल

ताप की कुछ

कटुक-बिटुक स्मृतियाँ धो जाएँगे।

 

कुछ बीज भर रखना अपनी मुट्ठियों में

उन्हें बोते रहना

न देखना बीज किसके हैं

और

न जमीन देखना किसकी है

बस बोते -बीजते रहना।

 

कुछ बीज बचा लेना

कुछ वृक्ष उपजा देना

कुछ जल सहेज लेना

ताकि

फिर आएँ

ये ताप भरे दिन

जो हैं बादलों के अग्रदूत।

-0-*जंदड़े = ताले का पंजाबी पर्यायवाची

 

शनिवार, 3 जून 2023

458-स्कूल जाते बच्चे

 अन्नू मैंदोला (उत्तराखण्ड)

 


स्कूल जाते बच्चे

चले जाते हैं

अनजाने ही

सीधे बाघ के

मुँह में

 

शिक्षा का परचम

लहराने की बजा

बन जाते हैं

खौफ और मातम

का माध्यम

 

लेकर लौटते हैं

वहशी जानवरों

के नाखूनों के

निशान अपने

जिस्म पर

 

अतिक्रमण हुआ हो

शायद जंगलों पर

इंसानी बस्तियों का,

 

तमाम कोशिशों

के बावजूद

कुछ अँतडियाँ

पचा ली जाती हैं

 

बाकी बचे बच्चे

जाते रहते हैं स्कूल

शिक्षा की बाहें थामे

निडरता और खौफ

के सम्मिश्रण के साथ।

 

-0-

गुरुवार, 1 जून 2023

457-जिद्द

प्रो. इंदु पाण्डेय खंडूड़ी


 

समय से लड़ाई अपनी है,

कौन जीत पाया है समय से,

पर किसने छोड़ा लड़ना इससे ।

सबके अपने समंदर है,

जद्दोजहद से पार करने को।

सबके है अपने तरीके,

अलग-अलग सभी की नसीहतें।

सबके अपने चाहतों की रफ्तार,

प्रयासों की उमस, आशा की बयार।

जिंदगी में असफ़लता की कड़क धूप,

कहर बरपाती निराशा की तेज धार।

कौन और कब बच पाया है,

समय से सबकी लड़ाई अपनी है।

जीतना या हारना निश्चित नहीं,

पर लड़ते हुए जीतने की जिद्द अपनी है।

-0-

बुधवार, 31 मई 2023

456-आज ये मन/ आजु यू हिरदै

मूल: डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'


 आजु  यू हिरदै /अवधी अनुवाद: रश्मि विभा त्रिपाठी

 

आजु ई आँखीं

टोहइ करिन बाटि तुम्हरी

पलकन का तोपि

बूड़इ करिन सपनन माँ तुम्हारइ

आजु हमरे ई कान

अहकि गे आरा तुम्हार श्रवनइ का

मीठ हाँसी मीठ बैना तुम्हरे श्रवनइ का


आजु हमरा ई चोला

छँउकान अस तलफि गा

परस तुम्हार लहइ का

आजु क्यार यू दिनु

सून कातिक कै लम्बी राति अस

ज्याठ कै गरमी अउर भदउँहाँ बरसाति अस

आजु यू हिय

तुम्हरे लाम ते भा बेकल केतना

तुम्हरे खातिर अहकिस केतना

चरका दइकै संघ छाँड़ि गा

अउर तुम्हरे सन हुइ गा।

-0-

आज ये मन- डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

 

आज ये आँखें

देखती रही राह तुम्हारी

पलकें मूँदकर डूबी रही सपनों में तुम्हारे

आज मेरे ये कान

तरस गए आहट तुम्हारी सुनने को

मीठी हँसी मीठे बोल तुम्हारे सुनने को

आज मेरा ये तन

अतृप्त सा तड़प गया

स्पर्श तुम्हारा पाने को

आज का ये दिन

सूना-सूना कार्तिक की लम्बी रात सा

जेठ की गर्मी और भादों की बरसात सा

आज ये मन

हो गया कितना विकल दूरी से तुम्हारी

तरसा कितना खातिर तुम्हारी

धोखा देकर छोड़ गया मेरा साथ

और साथ तुम्हारे हो गया।

-0-