रविवार, 23 अगस्त 2020

159

तुम्हें जाने की हठ है; मैं निःशब्द,
                मेरी श्वासों में तेरी वही सुगंध शेष है।
तुमने पलों में भ्रम तोड़ डाले सब,
               मेरा अब भी वचन- अनुबंध विशेष है।
तूने कंकड़ बताया जिन्हें राह का,
              मेरे लिए अक्षत बना- तेरा वो विद्वेष है।
अपमान सहना और कुछ न कहना,
              केवल यही निश्छल प्रेम का संदेश है।
तुम प्रथम ही रहना, मैं अंतिम सही,
             सम्मोहन का यों तो सुन्दर ये उपदेश है। 
'कविता' विलग हो नहीं जी सकेगी,
             रस, छंद, अनुप्रास का ही परिवेश है।

-0-


शनिवार, 22 अगस्त 2020

158


डॉ . कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
सिंहासन धीरे से बोला

       हँस कर राजा के कान।
तुझसे पहले भी अनेक
       हुए मुझ पर विराजमान।
उनकी भी थी शब्दसभा
       उनके भी थे मंगलगान।
चारण उनके भी यों ही
       करते रहते थे यशोगान।
समय कटा, प्रसाद बँटा
       हुआ पुष्पित सम्मान।
थे अवाक सुन ढोल
       काल चक्र से अनजान।
पुष्प बरखा अकूत हुई
      जब गूँजा विजय-विहान।
आज मरघट हो गए
      उनके घर भी सुनसान।
क्यों मद में इठलाता
      क्यों इतना अभिमान?
कुछ तो कर लोकार्पित
      पीढ़ियाँ करेंगी गुणगान। 

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

156-उत्तराखण्डी संस्कृति लोकगीत

 

'उत्तराखण्डी संस्कृति लोकगीत' निम्नलिखित लिंक पर-

https://www.youtube.com/watch?v=ObNRC4AaE8A

155-वीरता दिवस

 

रमेश चन्द्र 'निराला'


 लक्ष्य अडिग होगा तो,

हर मुश्किल आसाँ कर देंगे।

इस मातृभूमि की रक्षा को,

अपने प्राण भी न्योछावर कर देंगे।


यह भूमि है वीर जवानों की,

वीरों की मर्दानों की।


कर लिया प्रण मन में हमने,

तब तक चैन की साँस ना लेंगे हम


दुश्मन को अदम्य साहस दिखलायेंगे,

 

जब तक करगिल की चोटी पर ,

तिरंगा ना फहराए हम।

 

उन वीरों की शहादतें हम,

ऐसे नहीं जाने देंगे।

 

दुश्मन की हर आहट का ,

गिन-गिन कर हम बदला लेंगे।

 

दिखलाएँगे अदम्य साहस,

वीरता का परिचय देंगे।

 

मार गिराएँगे  दुश्मन को,

अपनी जमीं आजाद कराएँगे।

 

भारत माँ की रक्षा को,

सर्वस्व हम लुटाएँगे,

 

उन वीरों की शहादतों का,

हम वीरता दिवस मनाएँगे।

 

-0- प्रभारी प्र.अ., रा.आ.प्रा. वि.छिडिया,गैरसैंण, चमोली,उत्तराखंड


रविवार, 2 अगस्त 2020

154-आवाज दे रही


डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री
-0-
1
दबी चिंगारी है;  फिर भी उबाल आता है।
कैद मैना को आसमाँ का ख़्याल आता है।

सिलसिला ऊँची उड़ानों का यूँ तो उसकी;
जाने क्यों फिर घरौंदे का सवाल आता है।

नोंचे 'पर' उसके अँधेरे ने बेरहमी से बड़ी;
देख सूरज फिर उड़ने का मलाल आता है।

दोनों आँखों में वो तो दो 'ब्रह्माण्ड' रखती है;
उसकी राहों में मगर जग-जंजाल आता है।

उसे आवाज दे रही- अब नभ की नीलिमा;
जाने 'कविता' अब क्या चक्रचाल आता है।
          
-0-
2
सजना! कोरोना भई जिंदगानी,
लॉकडाउन हो गयी प्रेम-कहानी।

रीत-दस्तूर का मास्क मुखड़े लगा,
तड़पूँ ऐसे- ज्यों मछरी बिन पानी।

सेनेटाइज करके दिल की गलियाँ,
बैठी हूँ कब से ओढ़ चूनर धानी।

कितना भी धोऊँ हाथों को अपने,
तू न छू सकेगा- गम है ये जवानी।

क्वारेन्टीन हो गए सपने सुहाने,
वैक्सीन सी हुई कसम निभानी।

बेरोजगार हो गयी प्रीत हमारी,
लहू बन बह गया आँखों से पानी
-0-