शनिवार, 19 मई 2018
बुधवार, 2 मई 2018
57-विषवृक्ष
डॉ.कविता भट्ट
विषवृक्ष
उगता है-
विष
में
विष
में पल्लवित होता
विष ही
हवा में घोलता
उसकी
छाया में विवश यात्री
हो जाता
है नीलकंठ
कभी
कुछ नहीं बोलता
यह
नीलकंठ रामेश्वर
माँगता
है राम से फिर भी
विषवृक्ष
के लिए सद्बुद्धि
लेकिन
स्वभाव से विवश
उस
वृक्ष पर
डोलते
रहे विषधर
विषधरों
की माला धारण कर
रामेश्वर
पुनः हो जाते-
सत्यं-शिवं-सुंदरम्
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(12-04-2018)
गुरुवार, 19 अप्रैल 2018
56-शैल-बाला
देवत्व की सीढ़ियों-से सुन्दर खेत
ध्वनित नित विश्वहित प्रार्थना मुखर
पंक्तिबद्ध खड़े अनुशासन में तरु-शिखर
ध्वनित नित विश्वहित प्रार्थना मुखर
पंक्तिबद्ध खड़े अनुशासन में तरु-शिखर
घाटी में गूँजते शैल-बालाओं के मंगलगान
वह स्वामिनी;
अनुचरी कौन कहे अनजान
पहाड़ी-सूरज से पहले ही,
उसकी उनींदी भोर
रात्रि उसे विश्राम न देती,
बस देती झकझोर
पहाड़ी-सूरज से पहले ही,
उसकी उनींदी भोर
रात्रि उसे विश्राम न देती,
बस देती झकझोर
हाड़ कँपाती शीत देती, गर्म कहानी झुलसाती
चारा-पत्ती,
पानी ढोने में मधुमास बिताती
विकट संघर्ष; किन्तु अधरों पर मुस्कान
दृढ़, सबल, श्रेष्ठ वह, है तपस्विनी महान
विकट संघर्ष; किन्तु अधरों पर मुस्कान
दृढ़, सबल, श्रेष्ठ वह, है तपस्विनी महान
और वहीं पर कहीं रम गया मेरा वैरागी
मन
वहीं बसी हैं चेतन,
उपचेतन और अवचेतन
सब के सब करते वंदन जड़ चेतन अविराम
देवदूत नतमस्तक कर्मयोगिनी तुम्हें प्रणाम !
सब के सब करते वंदन जड़ चेतन अविराम
देवदूत नतमस्तक कर्मयोगिनी तुम्हें प्रणाम !
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बुधवार, 11 अप्रैल 2018
55-बन्द दरवाज़ा
डॉ.कविता भट्ट
पगडंडियों से उतरती हवा
सूरज निकलते ही
कभी खुलता था
पहाड़ी की ओर
जो बन्द दरवाज़ा
साथी दरवाजे से
सिसकते हुए बोला-
बन्धु! सुनो तो क्या
है अनुमान तुम्हारा
हमें फिर से क्या
कोई आकर खोलेगा
घर की दीवारों से
क्या अब कोई बोलेगा
इस पर कई वर्षों से
बन्द पड़ी एक खिड़की
अपनी सखी खिड़की की
सूनी आँखों में झाँककर
अँधेरे में सुबकती रोने लगी-
इतने में भोर होने लगी
दरवाजे भी चुपचाप हैं
खिड़कियाँ भी हैं उदास
खुलने की नहीं बची आस
मगर सच कहूँ? न जाने क्यों
इन
सबको है हवा पर विश्वास
लगता है; सुनेगी सिसकियाँ
पलटेगी रुख शायद अब
पहाड़ी की ओर फिर से
खुलेगा- बन्द पड़ा दरवाजा
चरमराहट के संगीत पर
झूमेंगी फिर से खिड़कियाँ
घाटी में गूँजेंगी स्वर -लहरियाँ
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शनिवार, 7 अप्रैल 2018
शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018
कभी डूबता नहीं सूरज
सूरज फिर आज मुस्काता उगा
उपहास करता तुच्छ मानव का!
जो कल साँझ को कह रहा था-
‘डूबते सूरज को नहीं नमन होता!’
भूल जाते वे, सूरज कर्मयोगी-सा
कभी डूबता नहीं, न ही है उगता
बिना भेदभाव केवल प्रकाश बाँटता
गनीमत है -वश नहीं मानव का ,
अन्यथा, इसे भी तुच्छ बुद्धि ! बाँटता,
काटता-छाँटता, डुबाता-उगाता...
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शनिवार, 31 मार्च 2018
बचपन पहाड़ का
डॉ.कविता भट्ट
(हे.न.ब. गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर (गढ़वाल) उत्तराखंड)
चर्चाएँ करती रहती हैं ए- बड़ी-बड़ी विभूतियाँ
बारिश-धूप में पलता है- बचपन पहाड़ का
पढ़ने को कोसों चलता है- बचपन पहाड़ का ।
यहाँ घास-पानी-गोबर भी है- बोझे में शामिल
पहाड़ी बर्फ़-सा गलता है- बचपन पहाड़ का
होटलों में बर्तन मलता है- बचपन पहाड़ का ।
इनको जरा निहारो तुम ओ बाबूजी ! करीब से
आँखें मिलाओ ,तो जरा किसी बच्चे गरीब से
गिरता है और सँभलता है-
बचपन पहाड़ का
बस ठोकरों में ही पलता है- बचपन पहाड़ का।
सरकारें जपती रहती हैं- नित माला विकास की
कोई तो सुध ले पहाड़ी- से इस ढलती आस की
पहाड़ी सूरज- सा उग-ढलता है बचपन पहाड़ का
पगडंडियों में गुम मिलता है- बचपन पहाड़ का ।
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