बुधवार, 28 मार्च 2018

मुझे प्रतीक्षा है-

डॉ.कविता भट्ट
                 
मैं पाषाण-हृदय हूँ;
ऐसा मुझे मत बोलो प्रिय !
पत्थरों से ही फूटती हैं धाराएँ
पहाड़ियों का सीना चीर कर
उन्मुक्त होकर तृप्त करती हैं
प्यासे तन-मन, कण-कण को; 
किन्तु इन्हें द्रवित करने को
चाहिए- निश्छल भगीरथ-प्रयास
शंकर -सा अडिग, अदम्य साहस,
जो पवित्र उफनती धाराओं को
शिरोधार्य कर सके हँसते हुए।
मैं चाहती हूँ द्रवित होना;
किन्तु मुझे प्रतीक्षा है-
निश्छल भगीरथ-शंकर की
जो पिघला सके पाषाण- हृदय !
और जलधारा में रूपांतरित  
मेरे चिर-प्रवाह को सँभाले-सँवारे।
वचनबद्ध हूँ- तृप्ति हेतु; किन्तु
तुम भगीरथ-शिव बनने का
वचन दे सकोगे क्या प्रिय ?
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शनिवार, 24 मार्च 2018

बिखरी मुस्कान होगी



प्रो0 इन्दु पांडेय खंडूड़ी

जितना गहरा है,
ये समंदर,
उससे कई गुना है,
मेरे अंदर।
मुम्बई की गर्मजोशी,
नन्हीं- सी एंजल
दिव्य- सी रौशनी,
अनुभूति प्रांजल।
मन मेरा भरा -सा,
बैचेन और विकल,
बोलना, सीखना और
सवाल है अटल ।
आखिर मासूम को,
मैं क्या समझाऊँ,
अपने अधकहे
भाव कैसे बताऊँ
खेलते, इठलाते,
वो रूठ जाती है,
अधूरे से बोल है,
उसे कैसे मनाऊँ?
कोई बड़ा होता
लिखकर बताता,
पर इस मासूम को,
कैसे सच समझाता?
पर हार नहीं मानता
जिद्द अपनी  जानता
जंग कभी नहीं छोड़ता
जीत तो निश्चित है,
या मैं बोलूँगा, या
ये एंजल मेरी,
लिखना सीख जाएगी।
फिर कोई सवाल
अनुत्तरित नहीं होगा।
अपने जज्बात,
अपनी अभिव्यक्ति,
अपने एहसास और,
बिखरी मुस्कान होगी।
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शुक्रवार, 23 मार्च 2018

प्रेम-संगीत



डॉ.कविता भट्ट, 
1-मुक्तक
गहन हुआ अँधियार
प्रियतम मन के द्वार ।
धरो प्रेम का दीप
कर दो कुछ उपकार ।


2
नीरव मन के  द्वार 
अँसुवन की है धार।
छू  प्रेम की वीणा
झंकृत कर दो तार ॥



3-दोहा

छोटी- छोटी बात पर,
मत करना तुम रार ।
मेरे जीवन का सभी
तुम पर ही अब भार।


4-दोहा

माटी-सी इस देह के
तुम हो प्राणाधार ।
तुम्हीं आत्मा हो प्रिये !
मैं तो बस संचार ॥



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[चित्र -गूग्ल से साभार ]


रविवार, 18 मार्च 2018

हम भारतवासी सब एक हों


(भारतीय नववर्ष पर विशेष
1-आशाओं का सूरज उगे तो

डॉ॰कविता भट्ट (हे न ब गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल,उत्तराखण्ड)

  
सतरंगी नव-रश्मियों से
प्राची  के  ऐसे अभिषेक हों ।
आशाओं का सूरज उगे तो
निर्मल सबके बुद्धि-विवेक हों॥
                                                           
 द्वेष त्यागें, उत्थान करें मिल
हम भारतवासी सब एक हों।
पात दम्भ के सभी झर जाएँ
ममता -समता सब  अतिरेक हों।
नवगीत  मधुर खग-कंठ  गाएँ  
प्रेम-सद्भाव -सुमन अनेक हों॥
 भारत माँ  का  यशोगान  करें
हम भारतवासी सब एक हों॥

क्षुधाएँ शान्त, कंठ  हों सिंचित
नव उन्मेष नवल अभिलेख हों।
'कविता' मातृभूमि-सेवा ,धर्म
 इसमें निरत  वर्ण  प्रत्येक हों॥
नभ-दिगंत  छूने की ललक में
हम भारतवासी सब एक हों।

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2-नव वर्ष मंगलमय हो
प्रभात पुरोहित(चमोली गढ़वाल ,उत्तराखंड)

नव दिवस नव चेतना- संग।      
नव रक्त संचार हो रहा है।
नव पुष्प नव पल्लव -संग,
धरा का  शृंगार हो रहा है।।

ऋतु बसंत की फुलवारी,
जीवन को सजा रही है।
दिशाएँ चारों जगती की,
नवगीत मंगल गा रही हैं।।

सुख की कोंपल लगी फूटने,
दुःख पतझड़ पार हो रहा है।
रुग्ण बंधन तोड़ दिए  सारे,
जीवन का नवाचार हो रहा है।।

भरकर नई उड़ान जीवन की,
नील  गगन दृश्य हो रहा है।
चैत्र मास शुक्ल प्रतिपदा संग,
नव संवत्सर सुख बीज बो रहा है।
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बुधवार, 14 मार्च 2018