सोमवार, 12 मार्च 2018

शक्ति का प्रतीक

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गुरुवार, 8 मार्च 2018

पहाड़ी नारी

डॉ.कविता भट्ट


अस्थियों के कंकाल शरीर को
वह आहें भर, अब भी ढो रही है,
जब अटूट श्वासों की उष्णता,
जीवन की परिभाषा खो रही है।
अब भी पल्लू सिर पर रखे हुए,
आडम्बर के संस्कारों में जीवन डुबो रही है।
 क्या लौहनिर्मित है यह सिर या कमर?
जिस पर पहाड़ी नारी पशुवत् बोझे ढो रही है।
जहाँ मानवाधिकार तक नहीं प्राप्य
वहाँ महिला-अधिकारों की बात हो रही है।
इस लोकतन्त्र पंचायतराज में वह अब भी,
वास्तविक प्रधान-हस्ताक्षर की बाट जोह रही है।
नशे में झूम रहा है पुरुषत्व किन्तु,
ठेकों को बन्द करने के सपने संजो रही है।
कहीं तो सवेरा होगा इस आस में,
रात का अँधियारा अश्रुओं से धो रही है।
पशुवत् पुरुषत्व की प्रताड़नाएँ,
ममतामयी फिर भी परम्परा ढो रही है।
पत्थर-मिट्टी के छप्पर जैसे घर में,
धुँएँ में घुटी, खेतों में खपकर मिट्टी हो रही है।
शहरी संवर्ग का प्रश्न नहीं,
पीड़ा ग्रामीण अंचलों को हो रही है
वातानुकूलित कक्षों की वार्ताएँ-निरर्थक, निष्फल,
यहाँ पहाड़ी-ग्रामीण महिलाओं की चर्चा हो रही है।
एक ओर महिलाओं की सफलता है बुलंदियों पर,
दूसरी ओर महिला स्वतन्त्रता बैसाखियाँ सँजो रही है।
-0-                                                                                                                                          [चित्र गूगल से साभार]

बुधवार, 7 मार्च 2018

मुझे मीलों चलना है



डॉ० कविता भट्ट


धूप में तपते हुए बर्फ-सा पिघलना है  
चिरनिद्रा से पूर्व मुझे मीलों चलना है।


लहरों में बह जाऊँ; तिनका नहीं   
नयनों में रह जाऊँ; सपना नहीं 
मैं बीज धरा के गर्भ में संघर्षण   
ताप-दाब सह होगा मेरा अंकुरण । 


पहाड़ी-सीना चीर; वट-जैसा पलना है
चिरनिद्रा से पूर्व मुझे मीलों चलना है।
  
कंटक या पुष्प करें आलिंगन   
नित जीवन करता अभिनन्दन
दूब जड़ों- सी हठ है; प्रति पल
कितना भी कर डालो उन्मूलन
 
पथरीली माटी को चन्दन ज्यों मलना है
चिरनिद्रा से पूर्व मुझे मीलों चलना है।

जीवन राग सुनाती; हरीतिमा में ढली
नन्ही कोंपले दूब की संघर्षो में पली
शुभ होती,  यही हर पूजन में चढ़ती
जीवनदायी नैनों को, निशिदिन बढ़ती



सत्पथ पर ठोकर खा,प्रतिपल सँभलना है  
चिरनिद्रा से पूर्व मुझे मीलों चलना है ।
-0-( डॉ० कविता भट्ट,हे० न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय ,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड) 
[ सभी चित्र गूगल से साभार]

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

बेला – आजन्म आजादों की


डॉ. कविता भट्ट
(हे न ब गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड )

बेला – आजन्म आजादों की साहब!
खंडित प्रतिमानों के मोल न पूछो
शेखर-चन्द्र रखे आजादी के युग वे     
उनके कैसे गूँजे थे वे बोल न पूछो !

खुली हवा में साँस ली जिन्होंने पहली    
वे अब कहते हैं; ये सब झोल न पूछो
छत पर रखते गमले सुंदर फूलों वाले 
नींव के पत्थर कितने अनमोल न पूछो!

राष्ट्र-भावना दम भर तो दम भर ले 
संभावना के दाम और खोल न पूछो
लोकतंत्र- कर्त्तव्य स्वाहा अधिकारों में
अब इस बजते ढोल की पोल न पूछो !

बिन संघर्ष मिले इन्हें शिक्षा के मन्दिर
वीर सपूतों के बलिदानों के तोल न पूछो  
चक्रव्यूह में फँसे युवा; कैसा देश कैसा प्रेम?
विष नारों में घुला; हालत डाँवाडोल न पूछो !
-0-
 [डॉ. कविता भट्ट की अन्य कविताएँ पढ़ने के लिए  कविताकोश पर क्लिक कीजिए !]
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गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

दो मुक्तक

दो मुक्तक
  1-डॉ. कविता भट्ट
रेत को मुट्ठी में भर करके  हम  फिसलने नहीं देते ।
वक्त कितना भी हो मुश्किल ,खुद को बदलने नहीं देते॥
 डराएँगे क्या अँधेरे  अपनी बुरी निगाहों से हमें ।
फ़ख्र  तारों पर  है जो उजालों को ढलने नहीं देते ॥
*                       
2-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
डर था ज़िन्दगी न जाने किधर जाएगी ।
गूगल से साभार
रेत बनकर ये  किसी दिन बिखर जाएगी ॥
तुम जो अचानक मिले  आज हमें मोड़ पर ।
अब   हमको लगा  कि क़िस्मत सँवर जाएगी॥