शनिवार, 2 दिसंबर 2017

कर्मयोगी कलाम

डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री

ऐसे मनुष्य पृथ्वी पर कम ही जन्म लेते हैं, जिनको उनकी मेहनत, लगन, ईमानदारी, सादगी एवं कर्मठता आदि के लिए मात्र अपने देश में ही नहीं समस्त संसार में पूजा जाता है। ऐसे व्यक्ति जो निर्धन या साधारण
परिवार में जन्म लेकर देश के राष्ट्रपति जैसे सर्वश्रेष्ठ पद पर सुशोभित होते हैं, किन्तु पद एवं प्रतिष्ठा के लालच से रहित उतनी ही सादगी के साथ जीवन व्यतीत करते हैं, वास्तव में ये सच्चे कर्मयोगी होते हैं। कलाम के रूप में एक वैज्ञानिक का वैयक्तिक हितों से दूर होकर सामाजिक समर्पण भाव सीख लेने लायक है। ऐसे ही महान कर्मयोगी मिसाइलमैन श्री ए पी जे अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को तमिलनाडु राज्य के पवित्र तीर्थ रामेश्वरम स्थित धनुषकौड़ी नामक गाँव में एक निम्न मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ। इनका पूरा नाम अबुल पाकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम था। इनके पिता जैनुलाब्दीन थे एवं माता का नाम आशियम्मा था। वे दोनों ही धर्मपरायण और दयालु थे।  वे पढ़े लिखे तो नहीं थे किन्तु उनके दिए हुए संस्कारों ने कलाम को एक अनुशासित एवं नैतिक व्यक्ति बनाया; कलाम पर उनके पिता के संस्कारों का सबसे अधिक प्रभाव था। उनके पिता हिन्दू तीर्थ यात्रियों के के लिए मल्लाहों को नाव किराये पर देते थे।
कलाम के परिवार में उनके दादा-दादी तथा माता-पिता आदि सभी उदार प्रवृत्ति के थे। वे हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही धर्मों की परम्पराओं में भागीदारी करते थे। उनकी दादी प्रत्येक रात को सोने से पूर्व उन्हें भगवान राम एवं पैगम्बर मोहम्मद की कहानी सुनाया करती थी । रामेश्वरम तीर्थस्थल में तालाब के बीचो-बीच सीता-राम विवाह का आयोजन प्रत्येक वर्ष  किया जाता था और उस समारोह के लिए उनके पिता विशेष प्रकार की नावों की व्यवस्था किया करते थे।
प्रारम्भ में परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक ही थी, किन्तु बाढ़ में जमीन बह जाने के कारण परिवार पर आर्थिक संकट आ गया था। बहुत बड़े संयुक्त परिवार के एक सदस्य होने के नाते कलाम की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। ये परिवार में सबसे छोटे थे, जैसे-जैसे ये बड़े होते रहे इनकी पढाई के प्रति रूचि तथा जिज्ञासा बढती चली गयी। कलाम को पांच वर्ष की अवस्था में रामेश्वरम के पंचायती प्राथमिक विद्यालय में प्राथमिक शिक्षा के लिए भर्ती करवा दिया गया। उनके एक शिक्षक इयादुराई सोलोमन ने उन्हें शिक्षा दी कि जीवन में सफलता तथा अनुकूल परिणाम के लिए तीव्र इच्छा, आस्था एवं अपेक्षा इन तीनों की आवश्यकता होती है तथा इन पर पूरा प्रभुत्व होना चाहिए। इसी शिक्षा को कलाम ने आजीवन अपने पल्ले बाँध लिया। रामेश्वरम मंदिर उनके घर से कुछ ही दूर था और मंदिर के पुजारी उनके पिता के अच्छे मित्र थे। कलाम प्राय: मंदिर में घंटो बैठे रहते थे और धर्म एवं नैतिकता सम्बन्धी चर्चाएँ सुना करते थे।
कलाम जब प्राथमिक विद्यालय में कक्षा पांच के छात्र थे तो उनके एक सहपाठी रामानंद शाश्त्री थे। कलाम मुसलमान होने के नाते टोपी पहना करते थे एवं रामानंद शास्त्री जनेऊ आदि पहनते थे। दोनों कक्षा में अगली पंक्ति में बैठते थे; विद्यालय के एक हिन्दू शिक्षक ने कलाम को मुसलमान होने के कारण पीछे बैठ जाने को कहा। कलाम को बहुत बुरा लगा; किन्तु शिक्षक का आदेश होने के कारण  उन्होंने उनकी आज्ञा का पालन किया और वे पीछे जाकर बैठ गये। इस घटना से उनके सहपाठी रामानंद शास्त्री को बहुत ख़राब लगा और दोनों ने सारी घटना घर में आकर लक्ष्मण शास्त्री को सुनाई। लक्ष्मण शास्त्री ने अगले दिन शिक्षक को बुलाकर बहुत डांटा की वे हिन्दू-मुस्लिम विद्यार्थियों में इस प्रकार का वैमनस्य न फैलाएं। लक्ष्मण शास्त्री ने शिक्षक को कहा की या तो वे घटना के लिए क्षमा मांगे या फिर विद्यालय छोड़ कर चले जाएँ। लक्ष्मण शास्त्री के इस रवैये के कारण शिक्षक में धीरे-धीरे बदलाव आ गया और उन्होंने सभी छात्रों के साथ सौहार्द पूर्ण व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार कलाम के व्यक्तित्व में भी यही धर्मनिरपेक्षता एवं उदारता समाहित हो गई ।
 बचपन में गरीबी के कारण उन्हें अपनी पढाई तथा परिवार के खर्च के लिए अखबार बेचने का कार्य भी करना पड़ा। प्राइमरी स्कूल के बाद कलाम ने श्वार्ट्ज हाईस्कूल, रामनाथपुरम में प्रवेश लिया। वहाँ की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने 1950 में सेंट जोसेफ कॉलेज, त्रिची में प्रवेश लिया। वहाँ से उन्होंने भौतिकी और गणित विषयों के साथ बी.एस-सी. की डिग्री प्राप्त की। अपने अध्यापकों की सलाह पर उन्होंने 1958 में स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए मद्रास इंस्टीयट्यूट ऑफ टेक्ना्लॉजी (एम.आई.टी.), चेन्नई का रूख किया। वहाँ पर उन्होंने अपने सपनों को आकार देने के लिए एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग का चयन किया।
इसी दौरान उनकी बहिन ने उनकी पढाई को आगे जारी रखने के लिए अपने हाथ की सोने की चूड़ियाँ तक बेच डाली थी;  जिससे फीस न होने के कारण कलाम को पढाई न छोड़नी पड़े।   जब इंजीनियरिंग के अंतिम दिनों में कलाम अपने किसी प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे थे तो उनके शिक्षक ने उन्हें उनका प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए मात्र तीन दिन का समय दिया नसे कहा गया यदि  वे ऐसा न कर सके तो उनकी छात्रवृत्ति रोक दी जाएगी  कलाम ने यह कार्य निर्धारित समय में पूरा कर दिखाया। उनके शिक्षक इस कार्य से बहुत खुश हुए और कहा कि तुम्हे जन बूझकर ऐसा लक्ष्य दिया गया जिससे तुम अभियंता के जीवन में आने वाली कठिनाइयों को समझ सको। कलाम ने 1958 में मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। वे पायलेट बनना चाहते थे किन्तु मात्र नौ ही पद थे और उनका स्थान दसवां था; अतः वे पायलेट नहीं बन सके
               उन्होंने 1960 में भारतीय रक्षा एवं अनुसंधान संगठन को अपनी सेवा एक वैज्ञानिक एवं व्यवस्थापक के रूप में देनी प्रारंभ की। वहां पर वे पूरी लगन से अपनी सेवाएँ दे रहे थे किन्तु फिर भी उनका मन कुछ और करने की चाह में था। 1969 में उनका स्थानान्तरण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में हो गया। कलाम साहब सबसे पहले ऑफिस आते थे तथा सबसे बाद में ऑफिस से घर जाते थे। उन्होंने अपने काम को इतना सम्मान दिया की आजीवन अविवाहित रहकर देश की सेवा में सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। इसी समय उनके निर्देशन में स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान SLV3 को तैयार करके प्रक्षेपित किया गया; किन्तु यह असफल हो गया; किन्तु कलाम ने हार नहीं मानी। फिर से इस यान को तैयार किया जाने लगा। दूसरी बार इसका प्रक्षेपण सफल रहा तथा कलाम को इसके लिए भारत सरकार की और से पद्म भूषण सम्मान प्रदान किया गया। प्रोफेसर कलाम ऐसे पुरस्कार के बाद भी विनम्र बने रहे। उन में घमंड था ही नहीं और वे इसी यान की री एंट्री नाम से गोपनीय प्रयोग में लग गए; इसी का परिणाम था की भारतवर्ष को अग्नि नमक मिसाइल मिल सकी। इस प्रक्षेपण ने भारतवर्ष की सुरक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रयासों हेतु पथ प्रशस्त किया।  इसी समय कलाम को बंगलौर स्थानांतरित कर दिया गया। बहुत ही छोटी टीम के साथ कलाम ने कार्य करना प्रारंभ किया तथा PSLV के लिए दिन रात मेहनत की गयी। 1981 यह डिज़ाइन बनकर सामने आई। आज जो PSLV सफलता के झंडे गाड़ रही है, वह मूल रूप से कलाम का ही डिज़ाइन था। भारतवर्ष को सुरक्षा के लिए बहुत सी मिसाइलों की एक लम्बी सूची कलाम ने दी। इसीलिए उन्हें लोगों ने मिसाइल मैन की उपाधि दी। 
इसके उपरांत उनको 2002 में भारत का राष्ट्रपति निर्वाचित किया गया। पांच वर्ष के अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने सबसे लोकप्रिय, ईमानदार एवं कर्मनिष्ठ राष्ट्रपति की भूमिका निभाई। यह बात इससे ही सिद्ध होती है की जब कलाम के शपथग्रहण के समय उनका परिवार दिल्ली आया था तो कुछ दिन वहां पर रुका; अपने परिवार के सभी खर्चे उन्होंने अपनेआप ही किये; जबकि ये खर्चे सरकारी खर्च में जुड़ सकते थे। कलाम अविवाहित तो रहे ही; साथ ही उन्हे जमीन, मकान, कपड़े, गहने तथा रूपये आदि किसी भी भौतिक संपत्ति का लालच नहीं था। अपनी पेंशन भी वे परोपकार में ही खर्च कर देते थे। उनका कोई बैंक बैलेंस और चल-अचल संपत्ति उन्होंने नहीं जोड़ी। कपड़े आदि भी काम चलने लायक ही रखते थे।  उनका सिद्धांत था सादा जीवन उच्च विचार।  
कलाम ने साहित्यिक रूप से भी अपने विचारों को अनेक पुस्तकों में लिखा जिनका कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। साइंटिस्ट तो प्रेसिडेंट और विंग्स ऑफ़ फायर उनकी आत्मकथ्यात्मक पुस्तकें हैं, जिनमे उन्होंने अपने जीवन की कठिनाइयों तथा अपनी सफलता-असफलता आदि सभी बातों को लिखा है। इस प्रकार यह भारत के एक विशिष्ट वैज्ञानिक थे, जिन्हें 40 से अधिक विश्वविद्यालयों और संस्थानों से डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्राप्त हुई। राष्ट्रपति पद के कार्यकाल के बाद कलाम अनेक प्रबंधन संस्थानों में विजिटिंग प्रोफेसर रहे तथा भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी संस्थान तिरुवनंतपुरम के कुलाधिपति भी रहे। इस दौरान उन्होंने विभिन्न विश्वविद्यालयों में सूचना एवं प्रोद्योगिकी को प्रतिस्थापित किया।  विभिन्न उल्लेखों से पता चलता है की कलाम आजीवन मुस्लिम धर्मग्रन्थ कुरान एवं हिन्दू धर्मग्रन्थ श्रीमद्भागवतगीता दोनों का ही अध्ययन करते रहे और इनमें जो भी बातें उन्हें अच्छी लगी वे उसी के अनुसार चलते रहे।  सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न सहित अनेक देशी-विदेशीं संस्थानों से अनेक पुरस्कार एवं सम्मान इन्हें प्राप्त हुए। वास्तव वे ऐसे व्यक्ति थे जिनको सम्मानित करने से संस्था या सरकार स्वयं में गर्व का अनुभव करती थी। कलाम युवाओं एवं बच्चों के बीच जाते ही रहते थे; उन्होंने कहा था कि मैं बहुत गर्व से यह तो नहीं कह सकता मेरा जीवन किसी के लिए आदर्श बन सकता है; लेकिन जिस तरह मेरी नियति ने आकर ग्रहण किया उससे किसी ऐसे गरीब बच्चे को सांत्वना अवश्य मिलेगी; जो किसी सुविधा विहीन छोटे गाँव में रह रहा हो; शायद मेरा जीवन उन्हें पिछड़ेपन और निराशा की भावना से उबरने में मदद कर सके।
 स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि कलाम ने भगवतगीता में निर्देशित मानव जीवन के सार को चरितार्थ किया। गीता में लिखा गया है कि “योग:कर्मषु कौशलम्” अर्थात इच्छा रहित होकर कुशलतापूर्वक अपने कार्यों को करना ही योग है और ऐसे योग से ही मानव का जीवन दुःख से मुक्त हो सकता है। कलाम के रूप में एक वैज्ञानिक का सामाजिक समर्पण सीखने लायक है।
27 जुलाई 2015 की शाम अब्दुल कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलोंग  में व्याख्यान देने गये थे उसी समय व्याख्यान देते हुए ही उनको दिल का दौरा पड़ गया।उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया; लेकिन बाद में उसी शाम इनकी मृत्यु हो गई। अपने निधन से लगभग 9 घण्टे पहले ही उन्होंने ट्वीट करके बताया था कि वह शिलोंग आईआईएम में लेक्चर के लिए जा रहे हैं। कलाम अक्टूबर 2015 में 84 साल के होने वाले थे। सोचने वाली बात यह है कि इतनी ज्यादा उम्र में भी वे कितने सक्रिय थे। उनके जीवन का आदर्श था- कर्म ही पूजा है।

-0-हे न ब गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड
mrs.kavitabhatt@gmail.com


भारतीय दर्शन परंपरा : सार-संक्षेप

 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री    भारतीय दर्शन परंपरा : सार-संक्षेप  
            विश्वगुरु की उपाधि से विभूषित भारत की सभ्यता जितनी प्राचीन है; उतना ही प्राचीन है यहाँ का दर्शन भी है या ऐसा कहा जाए कि दर्शन यहाँ के मूल में रचा बसा है। संस्कृत की ‘दृश’ धातु से व्युत्त्पन्न दर्शन शब्द का अर्थ है- देखना- ‘दृश्यते अनेन इति दर्शनम्’ अर्थात् जिसके माध्यम देखा
जाए वह दर्शन है। इस प्रकार दर्शन सामान्य ढंग से देखना  नहीं अपितु गहन चिंतन का पर्याय है। दर्शन भारतवर्ष के लिए कोई अदभुत क्रिया नहीं अपितु यहाँ के आबालवृद्ध में रचा बसा है। प्राकृतिक संशाधनो के अनुकूलन के कारण मूलभूत आवश्यकताओं की परिधि से उच्च स्तर का बैद्धिक चिंतन प्रारंभ से ही यहाँ के जनमानस में बसा रहा। अर्थात रोटी, कपड़े और मकान जैसी सामान्य सोच का दास यहाँ का जनसामान्य भी नही रहा तो फिर दार्शनिक चिन्तन में निरत महान विभूतियों की तो बात ही निराली है । सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी हमेशा एक मनीषी की भांति चिंतन में व्यस्त रहा। इसी  का प्रभाव है की यहाँ का सामान्य बालक भी नचिकेता के रूप में भी उपनिषद जैसी दर्शन परम्परा का माध्यम बना। आज वेदों, उपनिषदों एवं श्रीमदभगवद्गीता को समस्त विश्व की अनेक भाषाओँ में अनूदित करके उन्हें समझने का प्रयास किया जा रहा है; किन्तु आशचर्यजनक कि इनके मूल में उपस्थित गूढ़ निहितार्थ तक पहुँच पाना आज भी पूर्ण रूप से संभव नही हो सका। विदेशी आक्रमणों में बार- बार यहाँ के ग्रंथो को जलाकर मिटाये जाने पर भी यहाँ के ज्ञान-विज्ञान को समाप्त नहीं किया जा सका। वस्तुत: यह कभी समाप्त किया ही नही जा सकता, 
              वृक्ष कट-कट कर बढ़ा है, दीप बुझ-बुझ कर जला है”
 कुछ प्रारंभिक प्रश्न ऐसे थे जिनसे दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ जैसे- मैं कौन हूँ, मेरा जन्म किस कारण हुआ, मैं कहाँ से आया, क्यों आया तथा  कहाँ जाऊँगा, इसके कारण मनुष्य यह भी सोचने लगा कि क्या मेरा लक्ष्य भी पशु-पक्षियों के सामान शयन, भोजन और मैथुन ही है या इससे कुछ अलग इन सभी प्रश्नों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रशन था की जीवन के दुखों से मुक्ति का उपाय क्या हो सकता है ये दुःख मात्र मूलभूत आवश्यकताओं से सम्बंधित नही अपितु आत्यंतिक प्रकृति  से सम्बन्धित थे।
             दु:खों के निवारण हेतु प्राकृतिक शक्तियों की उपासना का क्रम प्रारंभ हुआ यही कालान्तर में वेदों की ऋचाओं के रूप में विकसित हुआ। दर्शन की परंपरा को समझना एक गूढ़ एवं जटिल विषय है, और इसके बारे में लिखना इसके विशाल जलनिधि में मात्र एक डुबकी के सामान है, किन्तु सामान्य रूप से समझने हेतु इस लेख में इसे सामान्य ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। पूरे विषय की अपेक्षा करना निरर्थक है; क्योंकि मात्र मुख्य तथ्यों का अतिसंक्षिप्त प्रस्तुतीकरण होगा।
            इस दार्शनिक परंपरा को समझने से पूर्व इसके विषय वस्तु को संक्षेप में जानना अनिवार्य है। उल्लेखनीय है की श्रेष्ठ मानवीय चिंतन दर्शन के तीन अनुभागों की सरंचना करता है- तत्त्व मीमांसा-  सृष्टि के मूलतत्त्व पर केन्द्रित चिंतन; ज्ञान मीमांसा- मूलतत्त्व को जानने की क्रिया अर्थात् ज्ञान एवं उसके साधनों का विश्लेषण तथा नीति मीमांसा- एक सुव्यवस्थित मानव समाज के निर्माण हेतु आचरणगत नियमो का विवेचन। इस प्रकार वेदों एवं तत्जनित तथा उनसे विलग समस्त दर्शन  विभिन्न शाखाओं के रूप में पल्लवित होता चला गया। यह दो प्रकार का था  वेद सिंद्धांतों से सहमत या आस्तिक दर्शन एवं दूसरा वेदों से असहमत या नास्तिक दर्शन। नास्तिक दर्शन तीन हैं- चार्वाक, जैन एवं बौद्ध तथा आस्तिक दर्शन छ: हैं- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा तथा वेदांत। इन्हें षड्दर्शन भी कहा जाता है। 
वेदकालीन परंपरा- ऐसा माना जाता है की भारतवर्ष में अन्यत्र से निवास हेतु आए लोग ,जो आर्य कहलाते हैं उनका यहाँ के मूल लोगों सभ्यता के सम्बन्ध में संघर्ष था। अपनी रक्षा उनसे समन्वय आदि हेतु आर्यों ने विशेष ज्ञान का प्रतिष्ठापन किया। यह ज्ञान देवताओं, स्तुतियों, यज्ञों, सृष्टि संरचना तथा आचारगत नियमन आदि पर केन्द्रित था। उस समय आज के समान प्रिंटिंग के साधन नहीं थे इसलिए यह ज्ञान  गुरु के समीप बैठकर सुनकर प्राप्त किया जाता था । इसे श्रुति कहा जाता था, यह ज्ञान इतने प्रामाणिक स्तर का है की यह भारतीय ही नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव समाज की धरोहर हैं। वेद चार हैं- ऋक, यजु:, साम तथा अथर्व। इनके तीन भाग- मंत्रसंहिता, ब्राह्मण और उपनिषद हैं। अनेक विद्वान इन्हें 6000 ई पू तथा अनेक इसके बाद का मानते हैं; लेकिन इनका काल लगभग १५०० ई पू निर्विवाद रूप से स्वीकार्य है।
पुराणकालीन परंपरा- अठारह पुराण वेदों द्वारा स्थापित भिन्न-भिन्न देवों की शक्तियों पर केन्द्रित, प्रत्येक देव का अद्वितीय शक्ति के रूप में प्रतिष्ठापन का प्रयास है। विश्व की पालन तथा संहार शक्ति का विष्णु-शिव आदि के रूप में यशोगान  विभिन्न पुराणों का केंद्रीय विषय रहा।
उपनिषद् कालीन परंपरा- वेदों का ही ज्ञान उपनिषदों के रूप में आगे बढ़ा।वेदों का अंतिम भाग होने के कारण इन्हें वेदांत भी कहा गया; ये वेदों का सार हैं। उप, नि: एवं सद तीन पदों से मिलकर बने उपनिषद् शब्द का अर्थ है- समीप बैठना- अर्थात ज्ञान प्राप्ति हेतु गुरु के समीप बैठना। उपनिषदों में एक ही तत्त्व के रूप में परम चेतन-ब्रह्म या ईश्वर का चिंतन, सत्य की खोज, ज्ञान की खोज, दुःख का आत्यंतिक निवारण, विशुद्ध आनंद और इसके मार्ग आदि का व्यवस्थित वर्णन है। उपनिषद् संख्या में 108 हैं तथा इनमे से भी ११ उपनिषद प्रमुख हैं, जिन पर शंकराचार्य के भाष्य उपलब्ध हैं। उपनिषदों के ही श्रेष्ठ उद्घोष हैं जो भारतीय जनमानस के चरित्र को उत्त्थान की ओर ले जाने का उद्घोष करते हैं-
                                                असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय  
महाकाव्य कालीन परंपरा- रामायण महाकाव्य एवं महाभारत के युद्ध में श्रीमद्भागवतगीता के द्वारा अधर्म पर धर्म की विजय का उद्घोष करने वाले दर्शन इसी काल के माने जाते हैं। बौद्धिक जागरूकता, स्फूर्ति, आचरण नियमन, दुःख-निवृत्ति, भगवद्भजन, कर्म, ज्ञान एवं भक्ति जैसे श्रेष्ठ मार्ग का प्रतिपादक यह दर्शन विश्व को भारत की अनमोल भेंट हैं। इसका प्रमाण यह है की रामायण एवं श्रीमद्भागवदगीता के विश्व की  विभिन्न भाषाओँ में अनुवाद हो चुके हैं और इन पर निरंतर शोध जारी हैं। 
नास्तिक परंपरा
चार्वाक दर्शन- वेदों का प्रबल विरोध करने वाले एवं भौतिकवाद के मुख्य सिद्धांतो को अपना आदर्श मानने वाले चार्वाक प्रणीत इस मत का मुख्य कथन था- जब तक जिओ इन्द्रिय सुख के लिए जिओ, चाहे ऋण लेकर ही घी पीना पड़े पीओ, मृत्यु के बाद किसने देखा, इस जीवन में खाओ-पीओ और सुख से रहो। यह दर्शन आदर्शात्मक।आचार संहिता के दृष्टिकोण से भारतीय दर्शनों के मौलिक सिद्धान्तों से किसी भी प्रकार मेल नहीं खाता।
जैन दर्शन- जिन” पद से व्युत्पन्न जैन शब्द इन्द्रियों पर विजय प्राप्ति को दु:खों से मुक्ति का मुख्य आधार मानता है। महावीर स्वामी प्रणीत इस दर्शन के समर्थक ईश्वर को नहीं मानते। मात्र अपने मत के प्रवर्तकों को तीर्थंकर कहकर उनकी उपासना करते हैं। सम्यक चरित्र, सम्यक ज्ञान एवं सम्यक दर्शन को आधार मानने वाले जैन दर्शन पांच महाव्रत को मानता है- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह।
बौद्ध दर्शन- जीवन-दु:खो को देखकर वैराग्य की ओर उन्मुख एवं कर्म-उत्कृष्टता पर बल देने वाले महात्मा बुद्ध इस दर्शन के उपदेशक थे। चार आर्य सत्य- हेय (दुःख), हेतु (दुख का कारण), हान- (दुःख निवारण की संभावना) हानोपाय- दुःख निवारण का मार्ग। दुःख- निवारण के साधनस्वरूप अष्टांगिक मार्ग- सम्यक – दृष्टि, संकल्प, कर्मांत, आजीव, व्यायाम, स्मृति तथा समाधि।  
आस्तिक परंपरा
 सांख्य दर्शन- सांख्यसूत्र के रचयिता महर्षि कपिल द्वारा प्रणीत यह दर्शन ज्ञान को दुःख से मुक्ति हेतु आवश्यक मानता है।  इस दर्शन की तत्त्व मीमांसा में दो तत्त्व - प्रकृति (जड़) पदार्थ तथा पुरुष (चेतन पदार्थ या आत्मा) माने गये हैं। तीन प्रकार के दुःख- आध्यात्मिक (शारीरिक-मानसिक रोग से उत्त्पन्न), आधिभौतिक (अन्य प्राणियों- साँप।विच्छू आदि से उत्त्पन्न) तथा आधिदैविक (दैविक आपदा- बाढ़, भूकम्प आदि से उत्त्पन्न) मात्र ज्ञान से ही निवृत्त होते हैं। इसी दर्शन की तत्त्वमीमांसा से योग दर्शन का विकास हुआ। 
योग दर्शन -विश्व में भारतीय दर्शन को गुंजायमान करने वाले योगदर्शन के प्रवर्तक पातंजलयोगसूत्र  के रचयिता महर्षि पतंजलि थे। साधना को जीवन का मुख्य आधार मानने वाले इस दर्शन में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, धारणा, ध्यान एवं समाधि हैं। आज योगदर्शन को आसन आदि सहित स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अपनाया जा रहा है किन्तु इसके विस्तृत नैतिक तथा आत्मिक लक्ष्य हैं। यह दर्शन योगसाधना द्वारा मुक्ति या कैवल्य प्राप्ति को मुख्य लक्ष्य मानता है।  
न्याय दर्शन- न्याय सूत्र के रचयिता महर्षि गौतम इस दर्शन के प्रणेता हैं। इस दर्शन की ज्ञानमीमांसा बहुत ही समृद्ध है। यह प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द प्रमाणों के द्वारा ज्ञान प्राप्ति तथा श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन के द्वारा अपवर्ग या दुःख से मुक्ति की परिकल्पना को प्रस्तुत करता है।
वैशेषिक दर्शन- वैशेषिक सूत्र के रचयिता महर्षि कणाद द्वारा प्रणीत यह दर्शन अणु-परमाणु के सिद्धांत को प्रतिपादित करने के कारण तत्त्व मीमान्सीय दृष्टि से श्रेष्ठ है। इस दर्शन में द्रव्य, गुण तथा कर्म आदि के रूप में सात पदार्थ विवेचित किए गए। यह भौतिक ज्ञान-विज्ञान का दर्शन है।
मीमांसा दर्शन- मीमांसा का अर्थ है- पूजित विचार। जैमिनी सूत्र के रचयिता महर्षि जैमिनी प्रणीत यह दर्शन दुःख निवारण हेतु वैदिक कर्मकांड की पुष्टि करता है; जो तत्त्व तथा धर्म से सम्बन्धित विचारों पर केन्द्रित है। इसमे कर्मकांड द्वारा स्वर्गप्राप्ति के लक्ष्य को मुख्यतः प्रस्तुत किया गया है।
वेदान्त दर्शन- ब्रह्मसूत्र के रचयिता शंकराचार्य प्रणीत यह दर्शन मूलतत्त्व के रूप में एक ही तत्त्व ब्रह्म की विवेचना करता है। एक तत्त्व की व्याख्या के कारन इस दर्शन को अद्वैत वेदांत भी कहा जाता है। वेदांत के अहंब्रह्मास्मि तथा तत्त्वमसि जैसे प्रमुख सिद्धांत हैं। यह ज्ञान द्वारा मुक्ति को जीवन का मुख्य लक्ष्य मानता है।
            इस प्रकार जीवन को दुःख से मुक्त करने हेतु भारतीय दर्शन परंपरा में अनेकानेक समृद्ध शाखाएँ विकसित हुई। ये दर्शन भारतवर्ष ही नहीं विश्व को भी ज्ञान-विज्ञानं का मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी।  उल्लेखनीय है की मात्र ये शुष्क ज्ञान की बात ही नहीं करती हैं; अपितु व्यक्ति को जीवन जीने की कला सिखाती हैं। इन दर्शनों का विधिवत् अध्ययन तथा इनमे प्रतिपादित तथ्यों का अनुगमन मानव मात्र हेतु आवश्यक है इसलिए धर्मं, जाति, संप्रदाय तथा राष्ट्रीयता जैसी परिधियों से ऊपर उठकर दर्शन को आत्मकल्याण हेतु समझना चाहिए।    

-0-राष्ट्रीय महासचिव उन्मेष,हे०न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड
ई मेल- mrs.kavitabhatt@gmail.com

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मन के कागज़ पर

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

मेरे आलाप

        मेरे आलाप
जब भी सूनी राह में मुड़कर देखा
विकल दृष्टि ने तुम्हें ही पाया
इसको मन का भ्रम कहूँ झूठा या
अंश स्वयं के पदचापों की प्रतिध्वनि का
अधिकांश निरुत्तर ही रहती हूँ
बस खोयी हुई चलती रहती हूँ
कभी आगे-कभी पीछे देखते हुए
तुम्हारे ही अनुभव का भाव लिये।
भाग्य नहीं दयालु इतना मेरा
कि तुम्हें मुझे वह दे दे पूरा
अंशों में जीती हूँ किन्तु यह बंधन,
तुम्हारे आभास का एक पूरा जीवन।
इसी में पीड़ा लेकर मुस्काना,
अर्धचेतन सा तुम्हें रटते जाना।
कुछ सीमाओं की घनघोर विवशता,
और कुछ अपनी ही अनिश्चतता।
सम्भवतः विवशता कभी तो टूटेगी,
पल-पल की अनिश्चतता छूटेगी।
तब तुम पूर्ण मेरे ही होओगे,
जब मेरे आलापों में खोओगे।


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तुम्हारी प्रतीक्षा में

 डॉ.कविता भट्ट

ठंडी रातों को पेड़ों के पत्तों से टपकती व्यथा है
बसन्त की आगन्तुक रंगीन परन्तु मौन कथा है                                                                                         तुम्हारी प्रतीक्षा में......
चौंककर जागती हूँ जब कभी रात में
पास अपने न पाती हूँ तुम्हें रात में
विरहिणी बनी मैं न अब सोऊँगी
इसी पीड़ा के कड़ुवे सच में खोऊँगी
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......
बसंत है परन्तु उदास है बुरांसों की लाली
रंगों की होली होगी फीकी खाली थी दिवाली
खुशियाँ खोखली और हथेलियाँ हैं खाली
राहें देख लौटती आँखें उनींदी ,बनी हैं रुदाली
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......
प्रेमी पर्वत के सीने पर सिर रखकर सोती नदी ये
धीमे से अँगड़ाई लेकर पलटती सरकती नदी ये
कहती मुझे चिढ़ा कहाँ गया प्रेमी दिखाकर सपने झूठे 
चाय की मीठी चुस्कियाँ बिस्तर की चन्द सिलवटें हैं
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......   
अब तो चले आओं ताकि साँसों में गर्मी रहे
मेरे होंठों पर मदभरी लालियों की नर्मी रहे
चाहो तो दे दो चन्द उष्ण पलों का आलिंगन
बर्फीली पहाड़ी हवाओं से सिहरता तन-मन
                   तुम्हारी प्रतीक्षा में......    
अपने प्रेमी पहाड़ के सीने पर
सिर रखकर करवटें बदलती नदी,
बूढ़े-कर्कश पाषाण-हृदय पहाड़ संग,
बुदबुदाती, हिचकती, मचलती नदी।
तुम्हारी प्रतीक्षा में......

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इनमें खो जाऊँ

    डॉ.कविता भट्ट
ये घुँघरू बजाती अप्सराओं -सी नदियाँ
अभिसार को आतुर ये बादल की गतियाँ

बर्फीले बिछौनों पर ये अनुपम आलिंगन
सुरीली हवाओं के उन्नत पहाड़ों को चुम्बन

ये घाटी, ये चोटी ये उन्नत हिमाला
कन्या -सी कड़ी शांति लिये पुष्पमाला

कभी गुनगुनाती, कभी गुदगुदाती
धूप प्रेयसी सी उँगलियाँ फिराती

मंगल गाते वृक्ष-लताएँ लिपटे समवेत
स्वर्ग को जाती सुन्दर सीढ़ियों- से खेत

युगल-पक्षियों की प्रणय रत कतारें
मृग-कस्तूरी सी सुगन्धित अनुपम बयारें

अपनी ही प्रतिध्वनि कुछ ऐसे लौट आए
जैसे प्रेयसी को उसका प्रियतम बुलाए

इस प्रतिध्वनि में डूब ऐसे खो जाऊँ
पद-धन-मान छोड़ बस इनमें खो जाऊँ

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समर्पण

डॉ.कविता भट्ट
आजीवन पिया को समर्थन लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी ।

निज आलिंगन से जिसने जीवन  सँवारा
प्रेम से तृप्त करके अतृप्त मन को दुलारा ।

उसे आशाओं स्वप्नों का दर्पण लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी ।

प्रणय -निवेदन उसका था वो हमारा
न मुखर वासना थी; बस प्रेम प्यारा ।

उससे जीवन उजियार हर क्षण लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण  लिखूँगी ।

न दिशा थी, न दशा थी जब संघर्ष हारा
विकट-संकट से उसने हमको उस पल उबारा ।

उसमें अपनी श्रद्धा का कण-कण लिखूँगी
प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी ।

कौन कहता है जग में प्रेम जल है खारा
मैंने तो मोती-सीप सागर से ही पाया ।

इस जल पे जीवन ये अर्पण लिखूँगी

प्रेम को अपना समर्पण लिखूँगी।