शनिवार, 12 सितंबर 2026

522

 महिमा अपरम्पार / शशि पाधा


प्रथम गुरु थे मात-पिता 

जिनसे पाया जीवन दान 

संस्कार मिले थे घुट्टी में 

और मूल्यों का वरदान


पिता सिखाते  रीत नीत

 माँ करती  लाड़ प्यार  

नमन उन्हें जो सदा थे मेरे 

जीवन का आधार 


ध्रुव तारे से गुरु हमारे 

अँगुली थाम चले 

संशय दुविधा बाधा में 

गुरुज्ञान की ज्योत जले 


माटी की मूरत को जैसे 

गढ़ता है कुम्हार 

ज्ञान की छैनी से गुरुओं ने मुझको दिया  सँवार


मोती मानक जैसे 

 मेरे गुरुओं के उपदेश 

पग- पग मार्गदर्शन करते 

उनके हर आदेश 


नित्य भोर का सूरज जैसे 

 दूर करे  अँधियार 

ज्ञान की ज्योत जलाकर 

गुरुजन करते हैं उपकार


 देव सरीखे गुरुजन की महिमा अपरम्पार

 नतमस्तक हो नमन करूँ मैं उनको बारम्बार 


-0-

3 टिप्‍पणियां:



  1. यह कविता गुरु महिमा और माता-पिता के प्रति कृतज्ञता का सुंदर संगम है। कवयित्री ने जीवन के प्रथम गुरु के रूप में माता-पिता को नमन कर, फिर शिक्षक को ध्रुव तारे और कुम्हार की उपमा दी है जो बहुत सार्थक है।

    भाषा सरल, सहज और लयबद्ध है। 'घुट्टी में संस्कार', 'ज्ञान की छैनी', 'भोर का सूरज' जैसे बिंब प्रभावी हैं। कविता में भारतीय संस्कारों, मूल्यों और गुरु-शिष्य परंपरा का सम्मान झलकता है। हृदयस्पर्शी है और हर पाठक को अपने गुरुओं के प्रति नतमस्तक होने की प्रेरणा देती है।
    डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

    जवाब देंहटाएं


  2. यह कविता गुरु महिमा और माता-पिता के प्रति कृतज्ञता का सुंदर संगम है। कवयित्री ने जीवन के प्रथम गुरु के रूप में माता-पिता को नमन कर, फिर शिक्षक को ध्रुव तारे और कुम्हार की उपमा दी है जो बहुत सार्थक है।

    भाषा सरल, सहज और लयबद्ध है। 'घुट्टी में संस्कार', 'ज्ञान की छैनी', 'भोर का सूरज' जैसे बिंब प्रभावी हैं। कविता में भारतीय संस्कारों, मूल्यों और गुरु-शिष्य परंपरा का सम्मान झलकता है। हृदयस्पर्शी है और हर पाठक को अपने गुरुओं के प्रति नतमस्तक होने की प्रेरणा देती है।
    डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

    जवाब देंहटाएं
  3. माता-पिता और गुरु को समर्पित मधुर भावों सु सुसज्जित बहुत सुंदर कविता । सुदर्शन रत्नाकर

    जवाब देंहटाएं