शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

145-গাইড


 गाइड-डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री 
अनुवाद-आशा बर्मन
গাইড                                                                  
ডা. কবিতা ভট্ট  

লাঞ্চের সময়েও 'নারী স্বাধীনতা আর সম্মান নিয়ে আলোচনা হচ্চিল ।
প্রফেসর  শেখর কুমার কিছু একটা বলছিল |

ডাইনিংটেবিলে ওর ঠিক সামনেই একটি সুন্দর ফর্সা মেয়ে শালিনী  নিজের শাড়ীর আঁচল টা কোসে বেঁধে আগুন ভরা দৃষ্টি তে ওর দিকে তাকাল । এই দেখে শেখর 
কুমার হতভাগ হয় গেল রেগে মেগে শালিনী হঠাৎ দাড়িয়ে পড়ল আর ওর বন্ধু নিশা কে বলল,"চল বন্ধু"
"হয়েছে কি?  নিশা প্রশ্ন করল ।
শালিনী উচ্চস্বরে বলল "ওঠ চল "।
 নিশা তখনি উঠে ওর পিছনে চলল ।
শালিনীহঠাৎ তোর  কী হল ?" একটু চাপা স্বরে নিশা বলল
"আমার এই প্রফেসরের  কাছে কিছু প্রশ্ন ছিল, কিন্তু ও তো খুব বাজে  "
নিশা বলল , "হঠাৎ এই তোর কী হল ? বল না, ও কিছু অসভ্যতা করল না কি ?"
শালিনী বলল ," দেখ বন্ধু, তুই তো  জানিস,  রিসার্চে এই আমার সেকেন্ড ইয়ের ।
ভেবেছিলাম, এই প্রফেসর নারী স্বাধীণতা নিয়ে বেশ  ভালই বলতে পারেওর সাথে কথা বলে আমার রিসার্চের সম্বন্ধে কিছু জানতে পারতাম।"
নিশা বলল, "এতে ক্ষতি কী? ওর সাথে কথা বলতেই পারতিস ।"
শালিনী বলল ,"কি আর বলি, তুই দেখলী  না ? প্রথমে তো ও খুব সুন্দর ভাবেই কথা বলল কিন্তু একটু পরেই ও আমার  দিকে যেভাবে তাকাচ্ছিল, সে আমার চেয়ে বেশি আর কে বুঝতে পারে ?  তারপরে কুৎসিত ভাবে আমার দিকে তাকিয়ে বলল,” আপনি তো খুব স্মার্টআপনাকে তো রিসার্চ পুরো করতে বেশি সময় লাগার কথাই  না নির্লজ্জ কোথাকার ।"
নিশা বলল, " ছাড় এই সব কথা, আমিও এইরকম অনেক প্রফেসার  কে দেখেছি যারা সবার সামনে বড় বড় কথা বলে কিন্তু আসলে অমানুষ। না চাইলেও আমাদের  এদের গাইডেন্সে কাজ করতে হয়এই দুনিয়া  তে ভাল লোকের অভাব নেই। আমরাই এদের মত লোকদের শিক্ষা দিতে পারি।"
নিজের ঘরে যাবার আগে শালিনী পিছনে তাকিয়ে দেখল, শেখার কুমারের মুখটা একেবারেই ফ্যাকাশে হয় গিয়ে ছিল।

                                                                             অনুবাদক : আশা বর্মন 

बुधवार, 1 जनवरी 2020

142-बहुत परेशान था मन

डॉ .कविता भट्ट 'शैलपुत्री 
                                                               
 बहुत परेशान था मन
शिथिल होकर
लड़खड़ा गया था।
अलगाव चाहता था सपनों से;
आँसू जिन्दगी में घुल चुके थे
जैसे- शराब में बर्फ की डली;
लेकिन शायद उसे हारना नहीं था।
उस शान्त-सी दिखने वाली लड़की ने
फिर से चुपचाप उठाई;
बैशाखी- टूटते हुए सपनों की,
अपेक्षा और आशा को आवाज़ दी
और चल पड़ी पहाड़ी पगडंडी पर
एक नए सवेरे की तलाश में
जबकि नहीं जानती वह
कितना चलना होगा अभी?
चोटी फतह करने को।

रविवार, 15 दिसंबर 2019

तुम कितनी हसीन हो


 बाबूराम प्रधान


             देखकर तुम्हें अर्श में जो देखूँ
             शबे नूर हो तुम  महजबीन हो
तुम कितनी हसीन हो
           
  मुझको  जो  देखें   तुम्हारी  निग़ाहें
              तबीयत   संग डोलें  हमारी  निग़ाहें
              इस दिल को  करना पड़ता  है काबू
              मारें   हिलोरें   दिल   की  जो   चाहें
              लचकती  हो  डाली  फूलों  की जैसे 
              खुदा का हो तोहफा अर्शे परवीन हो
तुम कितनी हसीन हो
              खुशबू   तुम्हारी    महकती   सबा  है
              बेदवा  मर्ज   की  भी तू  ही  दवा    है
              मुस्कुरा के जो देखे  दिल पे असर हो
              मरते  मरते  बचा  ले  तू  ऐसी हवा है
              समझके फूल लबों पे बैठ  जाएं भँवरे
              लगती हो ऐसे जैसे सहरा में नस्रीन हो
तुम कितनी हसीन हो
               एक झलक जो देखे हो  जाए दीवाना
               रुखसार वासिफ कोई चश्मे  दीवाना
               तुझको  जो देखे वो  ढूँढे  लकीरों   में
               उठ जाऐं जो नजरें  मुस्कुराए दीवाना
               पाने तुम्हीं  को वो  इबादत  में लगे हैँ
               रोजे  का तप  ईद सी ताजातरीन  हो
तुम कितनी हसीन हो
               दिल में हो  हलचल यूँ इतराके चलना
               हवाओं में  ये आँचल  उड़ाके   चलना
               छाए घटा काली गेसू झटकाके चलना
               शाख ए गुल को हिला हिलाक़े चलना
               जो भी देखे तुम्हें  वो रुक जाए राह में
               हुस्न के  नशे में  कितनी  तल्लीन  हो

तुम कितनी हसीन हो

   महजबीन - चन्द्रमा के समान ,शबे नूर - रात की चांदनी ,अर्श  -  नभ ,  अर्शे परवीन - कृति का नक्षत्र,  सहरा - रेगिस्तान /जंगल ,  नसरीन  - सफेद गुलाब ,  रुखसार वासिफ   - कपोल प्रशंसक ,  चश्मे दीवाना -  चक्षु प्रेमी ,  इबादत  - पूजा ,  शाख ए गुल -   फूलों की डाली ,
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 बाबूराम प्रधान
       नवयुग कॉलोनी , दिल्ली रोड,
        बड़ौत - 250611
        जिला - बागपत , उत्तर प्रदेश