रविवार, 25 जुलाई 2021

263-श्रीदेव सुमन: क्रान्ति के अग्रदूत

 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

 

मेरी दादी ने सुहागन होते हुए भी कभी माँग नहीं काढ़ी, न सिंदूर भरा; ना ही बिन्दी लगाई। उन्हें सज-सँवरकर  रहना पसन्द नहीं था; ऐसा बिल्कुल नहीं था। मेरे दादाजी एक अक्षम व्यक्ति या वे ऐसा नहीं चाहते थे; ऐसा भी नहीं था। सच तो यह था कि मेरी दादी मजबूरी में माँग न भर सकी; धीरे-धीरे उनके और गढ़वाल की टिहरी  रियासत की उनके ही जैसी राजशाही के अधीन रहने वाली अनेक महिलाओं की  यह नियति बन गयी थी। इस प्रथा का नाम था स्यूँदी-पाटी।

 स्यूँद गढ़वाली भाषा में माँग को कहा जाता है। स्यूँदी-पाटी प्रथा के अनुसार केवल रियासत की पटरानी ही माँग काढ़ने, भरने और बिंदी लगाने, सजने-सँवरने का अधिकार रखती थी। यह एक साधारण बात लग सकती है किसीको; क्योंकि आजकल की महिलाएँ इसे प्रोग्रेसिव होने से जोड़ती हैं। उस समय ऐसा नहीं था; महिलाएँ माँग भरना पसंद भी करती थी और यह सुहागन होने का प्रतीक होने के कारण शुभ माना जाता था। सुहागन स्त्रियाँ माँग भरने में हर्ष और सौभाग्य मानती थी। माँग न भर सकना अशुभ माना जाता था और वैधव्य से जोड़ा जाता थालेकिन तत्कालीन राजशाही का भय ऐसा करने नहीं देता था। देण-खेण और न जाने कितनी ही ऐसी अनेक जनमानस का उत्पीड़न करने वाली प्रथाएँ, कर और अत्याचार टिहरी रियासत की तत्कालीन जनता ने झेले।

 देण (राजा द्वारा जनता से अनाज उगाही)-खेण (राजा द्वारा जनता से गुलामों के समान काम करवाना) और न जाने ऐसे कितने कर राजा ने थोपे थे और बदले में जनता को मिलती थी  केवल पराधीनता और अथाह अत्याचार । भारतवर्ष 15 अगस्त, 1947 को ही अंग्रेजों से स्वतंत्र हो चुका था; लेकिन टिहरी राजशाही के अमानवीय उत्पीड़नों का साक्षी बनकर इतिहास के पन्नों पर खून के आँसुओं से अथाह पीड़ा की कहानी लिख रहा था।

 एक ऐसा व्यक्ति, जिसे राजा द्वारा अथाह पीड़ाएँ केवल इसलिए दी गई;  क्योंकि उस व्यक्ति ने इन अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह किया। राजा ने इन्हें लगभग 35 सेर (32.5 किलो ग्राम) की बेड़ियाँ  पहनाकर जेल में डाल दिया। सुमन ने  84 दिन तक भूख हड़ताल की। न टिहरी जेल के एक कक्ष में अभी भी ये बेड़ियाँ रखी हैं। बचपन में हम इन्हें देखने जाते थे; जब इन्हें सुमन के बलिदान दिवस पर सभी के लिए दर्शनार्थ रखा जाता था सुमन की मूर्ति के साथ।

 सुमन और कुछ अन्य अमर बलिदानी सपूतों के विद्रोहों  का ही परिणाम था कि कुछ समय बाद टिहरी रियासत राजशाही से मुक्त हुआ। भिलंगना और भागीरथी के तट पर बसा हुआ टिहरी शहर (जहाँ मेरा बचपन बीता)कई वर्ष पहले डूब चुका है; विकास के मानवनिर्मित जलाशय में (जिससे निर्मित विद्युत आज भारत के अनेक राज्यों को जगमग कर रही है); ऐसे ही प्रकाशपुंज के समान यह अमर बलिदानी स्वतंत्रता का जननायक श्रीदेव सुमन इतिहास के पन्नों में अमर हो गया। 25 जुलाई को श्रीदेव सुमन जी का बलिदान दिवस है। श्रीदेव तुम एक चिरसुरभित सुमन की भाँति हमेशा महकते रहोगे हमारे मन-मस्तिष्क में। तुम्हें हम जैसे कोटि-कोटि जन का  कोटिशः नमन। सुमन जैसे ही अनेक अमर देशभक्त जो इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो गए; किन्तु देश को स्वतंत्र करवाने में जिन्होंने अपना लहू बहा दिया, उन सभी के बलिदान से भारत का जन-जन कभी उऋण नहीं हो सकता।

 जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

शनिवार, 24 जुलाई 2021

262-गुरु और शिक्षक

डॉ. कविता भट्ट  'शैलपुत्री'

 

गुरु होना और यान्त्रिक रूप से शिक्षक होना दोनों पर्याप्त रूप से भिन्न  हैं। इन दोनों शब्दों और पदों का प्रयोजन और अभिप्राय नितांत भिन्न है।

  गुरु अर्थात अंधकार या अज्ञान से प्रकाश या ज्ञान की ओर ले जाने वाला। गुरु ज्ञान देता है, शिक्षक शिक्षा देता है।  भारतीय परिदृश्य में ज्ञान नॉलेज नहीं है; यह पूरी तरह से शिक्षा भी नहीं कहा जा सकता। कैसे? आइए थोड़ा विस्तार से समझें।

 गुरु वही व्यक्ति हो सकता है; जो निर्विकार, निर्लोभ, निश्छल हो। अहंकार जिसे छू भी न सका हो। जो सुपात्र  शिष्य को 64 कलाओं में निपुण कर सके। साथ ही ब्रह्मविद्या या परा विद्या और अपराविद्या या लौकिक विद्या में पारंगत कर सके। आत्मज्ञानी ही सही अर्थ में गुरु हो सकता है।

  इस संदर्भ में में श्रीकृष्ण के गुरु महर्षि सांदीपनि का व्यक्तित्व और कृतित्व विशेष है। वे श्रीकृष्ण के साथ ही बलराम और सुदामा के भी गुरु थे। उन्होंने एक ओर श्रीकृष्ण को 64 कलाओं में निपुण किया तो दूसरी ओर सुदामा जैसे अकिंचन को भी समभाव से ज्ञान का प्रकाश प्रदान किया। गुरु वे होते हैं जो सुपात्र शिष्य को परा और अपरा विद्या प्रदान करें।

 भारतीय दर्शन, सभ्यता और संस्कृति के सन्दर्भ में, परा विद्या से तात्पर्य स्वयं को जानने (आत्मज्ञान) या परम सत्य को जानने से है। उपनिषदों में इसे उच्चतम स्थान दिया गया है। वेदान्त कहता है कि जो आत्मज्ञान पा लेते हैं उन्हें मुक्ति या अपवर्ग या  कैवल्य की प्राप्ति होती है, वे दुःखों से मुक्त हो जाते हैं और ब्रह्म पद को प्राप्त होते हैं।

 मुण्डकोपनिषद में वर्णन प्राप्त है कि शौनक ने जब अंगिरस से पूछा, – "कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति"

 (महोदय, वह क्या है जिसके विज्ञात होने पर सब कुछ विज्ञात हो जाता है?)

 अंगिरस ने उत्तर दिया-

 द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ।

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिग्म्यते ॥ - (मुण्डकोपनिषद्)

 

( दो प्रकार की विद्याएँ होतीं हैं जिन्हें ब्रह्मविदों ने बताया है,

 1-  परा विद्या 2- अपरा विद्या।

 परा विद्या-  जिसके द्वारा वह ब्रह्म  या 'अक्षर' (नष्ट न होने वाला) जाना जाता है।) इसका सम्बन्ध आत्म-साक्षात्कार, कैवल्य, मुक्ति, त्रिदुःख निवृत्ति से है।

 अपरा विद्या- इसके अंतर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्तं, छन्द और ज्योतिष आते हैं ।

 अपरा विद्या को परा विद्या के लिए मार्ग सुलभ बनाने का साधन कहा जा सकता है। इसका सम्बन्ध लौकिक जीवन को कुशलतापूर्वक व्यतीत करते हुए अंत में अपराविद्या तक मार्ग प्रशस्त करने से है। लेकिन यदि साधक या मनुष्य इसी में उलझ जाए तो वह परा विद्या या अक्षर तक नहीं पहुँच सकेगा।

 तथ्यपरक यह है कि शिक्षा देना अपरा विद्या का एक छोटा सा भाग है और शिक्षक उसे ही सम्पन्न करते हैं। इसलिए गुरु होना बहुत व्यापक अर्थ को लिए हुए है। शिक्षक और गुरु दोनों अलग-अलग प्रयोजन और अभिप्राय के द्योतक हैं ।

 शिक्षक शिक्षा देते हैं और व्यावहारिक ज्ञान अर्थात जितना भी आधुनिक शिक्षा के विभाग यथा-  व्यापारप्रबंधन, तकनीकि, चिकित्सा, गणित तथा विज्ञान इत्यादि हैं; ये सभी शिक्षा के अंतर्गत ही हैं। अब सोचिए शिक्षा आधुनिक जीवन में कितना व्यापक होने पर भी भारतीय वांग्मय के अनुसार कितना छोटा सा  स्थान रखता है मानव जीवन में।

 सार यह है कि शिक्षा का उद्देश्य आजकल अर्थोपार्जन के अतिरिक्त कुछ नहीं रह गया। व्यावसायिक अथवा अव्यावसायिक शिक्षा द्वारा व्यक्ति को मात्र अर्थोपार्जन या आजीविका या अच्छे सुख-सुविधायुक्त जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है।

 इसके लिए अच्छे वेतन पर शिक्षकों की व्यवस्था होती है। 

यह तो सीधी सी बात है कि वे ब्रह्मविद्या या परा विद्या तो नहीं दे सकते, अपरा विद्या को भी पूरा नहीं दे सकते और शिक्षा भी अपने शिष्यों को समान रूप से जीवन की 64 कलाओं में निपुण करते हुए भी प्रदान नहीं सकते; क्योंकि जीवन पद्धति परिवर्तित हो चुकी है। इसलिए यह सम्भव नहीं। एक कला में भी शिक्षार्थी को पूरी तरह निपुण कर दिया जाए तो तब भी शिक्षक धर्म पूर्ण होगा; क्योंकि शिक्षक को वेतन उतने के लिए ही दिया जा रहा है।

 

यहाँ यह भी समझना होगा कि यद्यपि शिक्षक वेतनभोगी हैं, तथापि प्रदत्त वेतन में यदि शिक्षक अपना कार्य निष्ठा से करें तो निश्चित रूप से शिक्षक भी गुरु के समान आदरणीय ही हैं; किन्तु इसके लिए प्रत्येक शिक्षक को आत्म-विश्लेषण की आवश्यकता है कि क्या वे अपना शिक्षण कार्य यथोचित ढंग से कर भी रहे है? अथवा केवल खानापूर्ति कर रहे हैं। निश्चित रूप से शिक्षक यदि यान्त्रिकता और आत्म-प्रवंचना से स्वयं को ऊपर उठाकर व्यापक दृष्टिकोण अपनायें तो वे श्रेष्ठ होंगे। अन्यथा वे मात्र एक यांत्रिक व्यवस्था का वेतनभोगी व्यक्ति से अधिक कुछ नहीं कहलाएँगे।

 शिक्षकों को गुरु के समान आदरणीय और पूजनीय होने के लिए महर्षि सांदीपनि जैसा समभाव अपनाना होगा। जो श्रीकृष्ण जैसे तेजस्वी और आर्थिक सम्पन्नता युक्त बालक और सुदामा जैसे अकिंचन के जीवनपथ को एक ही दृष्टिसम्पन्नता के साथ सुगम बना सकें। शिक्षकों के कर्त्तव्यबोध के अतिरिक्त इस हेतु आमूलचूल व्यवस्था-परिवर्तन की भी आवश्यकता है। यह शिक्षा में ही परिवर्तन लाएगा।

 सार यह है कि यह भी शिक्षक को गुरु नहीं बना सकता, किसी शिष्य विशेष की शिक्षक विशेष के प्रति आस्था एक अलग विषय है। हो सकता है कोई शिष्य किसी आदर्श शिक्षक को अपना गुरु मानता हो। यह एक व्यक्तिगत निष्ठा है।

 सार यह है कि यथोचित गुरु-शिष्य परंपरा चाहिए, तो पुनः गुरुकुल पद्धति की ओर जाने की आवश्यकता है। गुरु पूर्णिमा गुरु को समर्पित है, शिक्षक को समर्पित शिक्षक दिवस है।

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