मंगलवार, 4 सितंबर 2018
सोमवार, 27 अगस्त 2018
बुधवार, 22 अगस्त 2018
मंगलवार, 21 अगस्त 2018
शृंखला-69
1
जब भी रोया
विकल मन मेरा
तुमको पाया।
2
निर्मल बहे
पहाड़ी झरने -सा
प्रेम तुम्हारा।
3
नेह तुम्हारा
सर्दी की धूप जैसा
उँगली फेरे।
4
गूँज रही है
मन-नीरव घाटी
प्रेम-बाँसुरी।
5
प्रेम-अगन
अनोखे आलिंगन
बर्फीली सर्दी।
-0-
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बुधवार, 15 अगस्त 2018
68-मानव से संघर्ष
डॉ.कविता भट्ट
अपने
लाचार बूढे़ वृक्ष साथी से
सिसकते हुए पहाड़ की चोटी से,
बोला एक बूढ़ा-जर्जर वृक्ष हाँफता।
सिमटती नदी-घाटी की ओर झाँकता।
अबके जब सावन आएगा,
तुम्हारे-मेरे अंग सहलाएगा।
आओ हम-तुम शुभेच्छा करें।
अमृत धाराओं की प्रतीक्षा करें।
चिंतातुर- अतीत और भविष्य में डूबा,
स्वयं के छिन्न-विछिन्न रूप से ऊबा।
बोला-मैं उन्मुक्त था, प्रफुल्ल था,
शीतल नीर-समीर से चुलबुल था।
नृत्य करती थी-मेरी पत्ती-शाखाएँ,
और मेरे उर में थी- पक्षियों की मालाएँ।
अकस्मात् हो उठा प्रकुपित मानव-मन,
जिसका साक्षी है मेरा अधजला तन।
अपनी क्षणिक स्वार्थवशता में,
या किंचित् संवेदनहीन मूर्खता में।
अहंवश छोड़ी एक दग्ध-क्रूर ज्वाला,
जिसने तुम्हें और मुझे झुलसा डाला।
जला डाले हमारे संग कुछ घोंसले,
और कुछ चहकते मचलते घरौंदे।
फिर रहे-अब वे पशु बिदकते,
भय से- लाचार और सिहरते।
उनका ही मानव से अन्तहीन संघर्ष होगा,
हमसे निर्मित संतुलन का विध्वंस होगा।
साथी! हम दो पग भी चल सकते नहीं,
अपनी दुर्दशा का प्रतिशोध ले सकते नही।
किन्तु, सभी हमारे साथी पशु घरौंदों वाले,
मानव से संघर्ष करेंगे प्रतिशोध के मतवाले।
किन्तु; दुःखद है, हाय! दुःखद, हश्र हो जाएगा,
जीवन-संघर्ष जब मानव विरुद्ध कहा जाएगा।
निरीह पशुओं में से कोई भी न बचेगा,
तो व्यूह-रचयिता मानव भी कितने दिन रहेगा?
सिसकते हुए पहाड़ की चोटी से,
बोला एक बूढ़ा-जर्जर वृक्ष हाँफता।
सिमटती नदी-घाटी की ओर झाँकता।
अबके जब सावन आएगा,
तुम्हारे-मेरे अंग सहलाएगा।
आओ हम-तुम शुभेच्छा करें।
अमृत धाराओं की प्रतीक्षा करें।
चिंतातुर- अतीत और भविष्य में डूबा,
स्वयं के छिन्न-विछिन्न रूप से ऊबा।
बोला-मैं उन्मुक्त था, प्रफुल्ल था,
शीतल नीर-समीर से चुलबुल था।
नृत्य करती थी-मेरी पत्ती-शाखाएँ,
और मेरे उर में थी- पक्षियों की मालाएँ।
अकस्मात् हो उठा प्रकुपित मानव-मन,
जिसका साक्षी है मेरा अधजला तन।
अपनी क्षणिक स्वार्थवशता में,
या किंचित् संवेदनहीन मूर्खता में।
अहंवश छोड़ी एक दग्ध-क्रूर ज्वाला,
जिसने तुम्हें और मुझे झुलसा डाला।
जला डाले हमारे संग कुछ घोंसले,
और कुछ चहकते मचलते घरौंदे।
फिर रहे-अब वे पशु बिदकते,
भय से- लाचार और सिहरते।
उनका ही मानव से अन्तहीन संघर्ष होगा,
हमसे निर्मित संतुलन का विध्वंस होगा।
साथी! हम दो पग भी चल सकते नहीं,
अपनी दुर्दशा का प्रतिशोध ले सकते नही।
किन्तु, सभी हमारे साथी पशु घरौंदों वाले,
मानव से संघर्ष करेंगे प्रतिशोध के मतवाले।
किन्तु; दुःखद है, हाय! दुःखद, हश्र हो जाएगा,
जीवन-संघर्ष जब मानव विरुद्ध कहा जाएगा।
निरीह पशुओं में से कोई भी न बचेगा,
तो व्यूह-रचयिता मानव भी कितने दिन रहेगा?
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शुक्रवार, 20 जुलाई 2018
67-कारवाँ गुज़र गया
मेरी
माँ ने मुझे कई बार बताया कि मेरा जन्म हमारे मिट्टी पत्थर वाले पहाड़ी घर में हुआ।
मेरी माँ गानों की बहुत शौकीन हैं और उन दिनों शहर नगर गाँव -गाँव रेडियो ही मनोरंजन का सर्वसुलभ साधन था। मेरे जन्म के समय रात को
आकाशवाणी विविध भारती पर कार्यक्रम छायागीत चल रहा था, गीत
बज रहा था , 'शोखियों में घोला जाए , फूलों का शबाब ....' चित्रपट था प्रेम पुजारी और गीतकार सबके प्रिय ‘नीरज’, वर्ष 1979 बसंत का मौसम ..प्रेम पुजारी 1970 में आई
थी, लेकिन इस फ़िल्म के गीत हवाओं में गुंजायमान थे और
सदियों तक रहेंगे। अनेक अन्य फिल्मों के लिए भी उनकी लेखनी ने विविध रंग बिखेरे। 'मेरा नाम जोकर' फ़िल्म का मुक्त छन्द में लिखा गीत-‘ऐ भाई
जरा देख के चलो’ भी बहुत चर्चित हुआ और जनसाधारण की
जुबान पर भी चढ़ा।
‘प्यार अगर न थामता पथ में , उँगली इस बीमार उमर की
हर
पीड़ा वेश्या बन जाती , हर
आँसू आवारा होता’ जैसे गीतों के रंग ही अनोखे हैं। कौन कहता है कि नीरज चले गए, उनके तराने हवाओं को हमेशा ताज़गी देते रहेंगे। नवांकुरों के प्रति इतना
स्नेह था उनके मन में कि 1927 से निरंतर प्रकाशित
हिंदी की सबसे पुरानी पत्रिका जिसका आरंभ गांधी जी ने किया था, उसमें पिछले वर्ष मेरा भारतीय दर्शन पर केंद्रित आलेख पढकर उन्होंने मुझे
कॉल किया, मेरे आलेख की प्रशंसा की और आशीर्वाद दिया, बोले कि लिखना कभी मत छोड़ना। साहित्य ऋचा पत्रिका के कवर पर उनके चित्र के
साथ मेरा चित्र और मेरी रचनाएँ भी प्रकाशित हुई थी पिछले वर्ष। उनका चित्र और दो पंक्तियाँ
मैं ने अपने अध्ययन कक्ष में दो वर्ष पूर्व लगाया था, जो
अभी भी जस का तस है। नीरज आप अंतिम साँस तक गुनगुनाये जाते रहोगे। वस्तुतः नीरज एक
युग का नाम है- अविस्मृत !
स्मृति
स्वरूप उनका एक गीत यहाँ दे रही हूँ-
-0-
कारवाँ गुज़र गया
गोपालदास नीरज
स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिए धुआँ-धुआँ पहन गए,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके,
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
पाँव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिए धुआँ-धुआँ पहन गए,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके,
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक़्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे।
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक़्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे।
हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यों कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गए किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यों कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गए किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमुक उठे चरन-चरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पोंछ गया सिंदूर तार-तार हुईं चूनरी,
और हम अजान-से,
दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमुक उठे चरन-चरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पोंछ गया सिंदूर तार-तार हुईं चूनरी,
और हम अजान-से,
दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
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बुधवार, 18 जुलाई 2018
प्रेम-अँजुरी-66
डॉ.कविता भट्ट
नित वन्दन
मैं करती रही हूँ
तेरा ही प्रिय
मंदिर की पूजा -सा
मेरा प्रेम है
दीपशिखा -सी जली
तेरे घर- आँगन,
रही पालती
मन में यह भ्रम
मंदिर- सा ही
कभी न कभी तुम
मेरे देवता
प्रसाद में दोगे ही
प्रेम-अँजुरी
किन्तु यह क्या मिला !
तुम सदैव
सशंकित, क्रुद्ध ही
और रहते
उद्धत उपेक्षा को
नहीं जानती
तप जिससे होओ
तुम प्रसन्न
जबकि मैं तो प्रिय
हूँ प्रेम-तपस्विनी!
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