सोमवार, 6 जनवरी 2020
बुधवार, 1 जनवरी 2020
142-बहुत परेशान था मन
डॉ .कविता भट्ट 'शैलपुत्री
बहुत परेशान था मन
बहुत परेशान था मन
शिथिल होकर
लड़खड़ा गया था।
अलगाव चाहता था सपनों से;
आँसू जिन्दगी में घुल चुके थे
जैसे- शराब में बर्फ की डली;
लेकिन शायद उसे हारना नहीं था।
उस शान्त-सी दिखने वाली लड़की ने
फिर से चुपचाप उठाई;
बैशाखी- टूटते हुए सपनों की,
अपेक्षा और आशा को आवाज़ दी
और चल पड़ी पहाड़ी पगडंडी पर
एक नए सवेरे की तलाश में
जबकि नहीं जानती वह
कितना चलना होगा अभी?
चोटी फतह करने को।
शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019
रविवार, 15 दिसंबर 2019
तुम कितनी हसीन हो
बाबूराम
प्रधान
देखकर तुम्हें अर्श में जो देखूँ
शबे नूर हो तुम महजबीन हो
तुम कितनी हसीन हो
तबीयत संग डोलें हमारी
निग़ाहें
इस दिल को करना पड़ता है काबू
मारें हिलोरें दिल की
जो चाहें
लचकती हो डाली फूलों
की जैसे
खुदा का हो तोहफा अर्शे परवीन हो
तुम कितनी हसीन हो
खुशबू तुम्हारी महकती सबा है
बेदवा
मर्ज की भी तू ही दवा है
मुस्कुरा
के जो देखे दिल पे असर हो
मरते
मरते बचा ले तू ऐसी हवा है
समझके
फूल लबों पे बैठ जाएं भँवरे
लगती
हो ऐसे जैसे सहरा में नस्रीन हो
तुम कितनी हसीन हो
एक झलक जो देखे हो जाए दीवाना
रुखसार वासिफ कोई चश्मे दीवाना
तुझको जो देखे वो ढूँढे
लकीरों में
उठ जाऐं जो नजरें मुस्कुराए
दीवाना
पाने तुम्हीं को वो इबादत
में लगे हैँ
रोजे का तप ईद सी ताजातरीन
हो
तुम कितनी हसीन हो
दिल में हो हलचल यूँ इतराके चलना
हवाओं में ये आँचल उड़ाके चलना
छाए घटा काली गेसू झटकाके चलना
शाख ए गुल को हिला हिलाक़े चलना
जो भी देखे तुम्हें वो रुक जाए राह में
हुस्न के नशे में कितनी तल्लीन हो
तुम कितनी हसीन हो
महजबीन - चन्द्रमा के
समान ,शबे नूर - रात की चांदनी ,अर्श
- नभ , अर्शे परवीन - कृति का नक्षत्र,
सहरा - रेगिस्तान /जंगल , नसरीन
- सफेद गुलाब , रुखसार वासिफ - कपोल
प्रशंसक , चश्मे दीवाना - चक्षु प्रेमी ,
इबादत - पूजा , शाख ए गुल -
फूलों की डाली ,
--0-
बाबूराम प्रधान
नवयुग कॉलोनी , दिल्ली रोड,
बड़ौत - 250611
जिला - बागपत , उत्तर प्रदेश
मंगलवार, 3 दिसंबर 2019
रविवार, 24 नवंबर 2019
गुरुवार, 21 नवंबर 2019
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