बुधवार, 8 मई 2019
शुक्रवार, 3 मई 2019
बुधवार, 1 मई 2019
मजदूरन जिंदगी

डॉ
कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’
तुम्हारी प्रीत चुनावी वायदे सी,
मजदूरन जिंदगी अब थकने लगी।
मेरी निष्ठा मतदाता के कायदे सी,
एक ही घोषणा में फुदकने लगी।
तुम मंच हो स्वप्न-शृंखला के,
मैं लोकतंत्र की ताली सी बजने लगी।
स्वप्न मेरे- उन्माद; मधुशाला के,
मत-वालों की महफ़िल सजने लगी।
फूलमालाओं में मैं बदलने लगी l
भीड़ में बैठा मजदूर- है मेरा प्यार,
धीरज की घड़ी अब निकलने लगी I
गणतंत्र दिवस- मुस्कराहट तुम्हारी,
राजपथ पर रोशनी सी बहने लगीl
फुटपाथ पर सिसकती हँसी हमारी,
मजदूर दिवस सी सहमने लगी I
शनिवार, 27 अप्रैल 2019
पता तो चले
पता तो चले
जयवर्धन काण्डपाल 'जय'
अधिवक्ता, उच्चन्यायालय उत्तराखंड
नैनीताल, उत्तराखंड
मुंह में जुबां है पता तो चले
तेरा क्या बयां है पता तो चले I
हकों की लड़ाई में तेरी मैं पूछूं
ना है के हां है पता तो चले I
जमीं है हकीकत की पैरों तले
या ख़याली आसमां है पता तो चले I
सच झूठ में जब छिड़ी जंग है
खड़ा तू कहां है पता तो चले I
कहीं आग कोई सुलग भी रही है
के केवल धुआं है पता तो चले I
सुहावना मंजर आया
मैंने फेंका फूल मगर ये लौट के कैसे
पत्थर आया
गुनाह नहीं कोई था लेकिन इल्जाम मेरे
क्यों सर आया I
पीड़ा में लिपटा तन था और मन आंसू से
भीगा सा
बहुत दिनों के बाद अचानक जब मैं अपने
घर आया I
मेरी झोली में कुछ सपने और पड़ी थी कुछ
यादें
रोते बच्चे के हाथों में मैं कुछ सपने
धर आया I
मैंने आँखें मूंदी छुपकर और ध्यान भी
भटकाया
लेकिन जाने किन बातों से गला मेरा भी
भर आया I
मैंने मन में बोया जबसे उम्मीदों का
एक बगीचा
तब से आँखों के आगे से सदा सुहावना
मंजर आया I
जयवर्धन काण्डपाल 'जय'
गुरुवार, 25 अप्रैल 2019
रविवार, 21 अप्रैल 2019
हे प्रिया ! मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ
डॉ.कविता भट्ट
‘शैलपुत्री’
हे प्रिया ! मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ ।
दूर पहाड़ी नदी के एक
तट पर,
सर्दी में तुम्हें; बाहों में भर कर,
वासना से रहित प्रेम
आलिंगन,
ध्वनित हों प्रेम के
अनहद गुंजन ।
हे प्रिया ! मैं पावन गीत गाना चाहता हूँ ।
हे प्रिया ! मैं पावन गीत गाना चाहता हूँ ।
उँगलियाँ जो फेरूँ; तो अवसाद भागे,
होंठ माथे धरूँ तो; तो उन्माद जागे,
तुम्हारे मन की पीड़ा
को सुनकर,
आँखों से बातों के धागों को बुनकर ।
हे प्रिया ! पीड़ा से दूर ले जाना
चाहता हूँ।
दिन भर सुनहरी धूप
गुनगुनाए,
सूरज पेड़ों के झुरमुट
में डूब जाए,
फिर साँझ की चूनर में
तुमको लपेटे,
मैं पास रख लूँ गर्म
बाँहों में समेटे ।
हे प्रिया ! तुम संग दूर जाना चाहता
हूँ ।
शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019
गुजर जाता है
सामने से होकर जब भी वो
गुजर जाता है
तूफान सा उठता है दिल में गुजर जाता है
किस तरह आता दरिया को जोश जवानी का
सीमा तोड़ता हुआ सैलाब गुजर जाता है
सुंदर सजे दरिया के किनारे छोड़
चले जाते
कालिमा छोड़ जब माहताब गुजर जाता है
उसी के नाम सजने लगती हैं महफिलें
जहां को लुटाके खुशियां जो गुजर जाता है
खास तेल, बाती, वो चराग जो जलता रहे
जिसके सर से हो के तूफान गुजर जाता है
@ बाबूराम प्रधान
नवयुग कॉलोनी, दिल्ली रोड,
बड़ौत (बागपत) उ.प्र. पिन-
२५०६११
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