गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

56-शैल-बाला

 डॉ.कविता भट्ट


पहाड़ियों पर बिखरे सुन्दर समवेत
देवत्व की सीढ़ियों-से सुन्दर खेत
ध्वनित नित विश्वहित प्रार्थना मुखर
पंक्तिबद्ध खड़े अनुशासन में तरु-शिखर
घाटी में गूँजते शैल-बालाओं के मंगलगान
वह स्वामिनी; अनुचरी कौन कहे अनजान
पहाड़ी-सूरज से पहले ही
उसकी उनींदी भोर
रात्रि उसे विश्राम न देती
बस देती झकझोर


हाड़ कँपाती शीत देतीगर्म कहानी झुलसाती
चारा-पत्ती, पानी ढोने में मधुमास बिताती
विकट संघर्ष; किन्तु अधरों पर मुस्कान
दृढ़, सबल, श्रेष्ठ वह, है तपस्विनी महान
और वहीं पर कहीं रम गया मेरा वैरागी मन
वहीं बसी हैं चेतन, उपचेतन और अवचेतन
सब के सब करते वंदन जड़ चेतन अविराम
देवदूत नतमस्तक कर्मयोगिनी तुम्हें प्रणाम !
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बुधवार, 11 अप्रैल 2018

55-बन्द दरवाज़ा

डॉ.कविता भट्ट

सूरज निकलते ही
कभी खुलता था
पहाड़ी की ओर
जो बन्द दरवाज़ा 
साथी दरवाजे से
सिसकते हुए बोला-
बन्धु! सुनो तो क्या 
है अनुमान तुम्हारा  
हमें फिर से क्या
कोई आकर खोलेगा
घर की दीवारों से 
क्या अब कोई बोलेगा
इस पर कई वर्षों से
बन्द पड़ी एक खिड़की
अपनी सखी खिड़की की 
सूनी आँखों में झाँककर
अँधेरे में सुबकती रोने लगी-
इतने में भोर होने लगी
दरवाजे भी चुपचाप हैं
खिड़कियाँ भी हैं उदास
खुलने की नहीं बची आस
मगर सच कहूँ? न जाने क्यों
इन  सबको  है हवा पर विश्वास   
लगता है; सुनेगी सिसकियाँ
पगडंडियों से उतरती हवा
पलटेगी रुख शायद अब
धक्का देकर चरमराते हुए
पहाड़ी की ओर फिर से
खुलेगा- बन्द पड़ा दरवाजा
चरमराहट के संगीत पर
झूमेंगी फिर से खिड़कियाँ
घाटी में गूँजेंगी स्वर -लहरियाँ
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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

कभी डूबता नहीं सूरज


 डॉ.कविता भट्ट

सूरज  फिर आज मुस्काता उगा
उपहास करता तुच्छ मानव का!
जो कल साँझ को कह रहा था-
डूबते सूरज को नहीं नमन होता!’
भूल जाते वे, सूरज कर्मयोगी-सा
कभी डूबता नहीं, न ही है उगता
बिना भेदभाव केवल प्रकाश बाँटता
गनीमत है -वश नहीं मानव का ,
अन्यथा, इसे भी तुच्छ बुद्धि ! बाँटता,
काटता-छाँटता, डुबाता-उगाता...
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शनिवार, 31 मार्च 2018

बचपन पहाड़ का



डॉ.कविता भट्ट 
                         (हे... गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर (गढ़वाल) उत्तराखंड)


.सी.में बैठ बनती हैं अधिकार-नीतियाँ
चर्चाएँ करती रहती हैं ए- बड़ी-बड़ी विभूतियाँ
बारिश-धूप में पलता है- बचपन पहाड़ का
पढ़ने को कोसों चलता है- बचपन पहाड़ का ।


शहरों में बोझे बस्तों के ही लगते हैं मुश्किल
यहाँ घास-पानी-गोबर भी है- बोझे में शामिल
पहाड़ी बर्फ़-सा गलता है- बचपन पहाड़ का
होटलों में बर्तन मलता है- बचपन पहाड़ का ।

इनको जरा निहारो तुम ओ बाबूजी ! करीब से
आँखें मिलाओ ,तो जरा किसी बच्चे गरीब से
गिरता है और  सँभलता है- बचपन पहाड़ का
बस ठोकरों में ही पलता है- बचपन पहाड़ का।
 
सरकारें जपती रहती हैं- नित माला विकास की
कोई तो सुध ले पहाड़ी- से इस ढलती आस की
पहाड़ी सूरज- सा उग-ढलता है बचपन पहाड़ का
पगडंडियों में गुम मिलता है- बचपन पहाड़ का ।
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बुधवार, 28 मार्च 2018

मुझे प्रतीक्षा है-

डॉ.कविता भट्ट
                 
मैं पाषाण-हृदय हूँ;
ऐसा मुझे मत बोलो प्रिय !
पत्थरों से ही फूटती हैं धाराएँ
पहाड़ियों का सीना चीर कर
उन्मुक्त होकर तृप्त करती हैं
प्यासे तन-मन, कण-कण को; 
किन्तु इन्हें द्रवित करने को
चाहिए- निश्छल भगीरथ-प्रयास
शंकर -सा अडिग, अदम्य साहस,
जो पवित्र उफनती धाराओं को
शिरोधार्य कर सके हँसते हुए
मैं चाहती हूँ द्रवित होना;
किन्तु मुझे प्रतीक्षा है-
निश्छल भगीरथ-शंकर की
जो पिघला सके पाषाण- हृदय !
और जलधारा में रूपांतरित  
मेरे चिर-प्रवाह को सँभाले-सँवारे
वचनबद्ध हूँ- तृप्ति हेतु; किन्तु
तुम भगीरथ-शिव बनने का
वचन दे सकोगे क्या प्रिय ?
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शनिवार, 24 मार्च 2018

बिखरी मुस्कान होगी



प्रो0 इन्दु पांडेय खंडूड़ी

जितना गहरा है,
ये समंदर,
उससे कई गुना है,
मेरे अंदर।
मुम्बई की गर्मजोशी,
नन्हीं- सी एंजल
दिव्य- सी रौशनी,
अनुभूति प्रांजल।
मन मेरा भरा -सा,
बैचेन और विकल,
बोलना, सीखना और
सवाल है अटल ।
आखिर मासूम को,
मैं क्या समझाऊँ,
अपने अधकहे
भाव कैसे बताऊँ
खेलते, इठलाते,
वो रूठ जाती है,
अधूरे से बोल है,
उसे कैसे मनाऊँ?
कोई बड़ा होता
लिखकर बताता,
पर इस मासूम को,
कैसे सच समझाता?
पर हार नहीं मानता
जिद्द अपनी  जानता
जंग कभी नहीं छोड़ता
जीत तो निश्चित है,
या मैं बोलूँगा, या
ये एंजल मेरी,
लिखना सीख जाएगी।
फिर कोई सवाल
अनुत्तरित नहीं होगा।
अपने जज्बात,
अपनी अभिव्यक्ति,
अपने एहसास और,
बिखरी मुस्कान होगी।
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