शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

180-तीन कविताएँ

 1-डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’

1

उसके पास रोटी थी,

किन्तु भूख नहीं थी।

मेरे पास भूख तो थी,

किन्तु रोटी नहीं थी।

 

खपा वह भूख के लिए,

मिटा मैं रोटी के लिए।

भूख-रोटी दो विषयों पर,

बीत गए युग व युगान्तर।

 

संघर्ष रुका नहीं अब भी,

समय तो धृतराष्ट्र था ही।

किन्तु; प्रश्न तो यह है भारी

इतिहास क्यों बना गान्धारी ?

2

प्यास और पानी के बीच; है जो फासला-


यही है जिजीविषा- जीने का सिलसिला।

 

भूख से रोटी की दूरी तय करने में अक्सर-

व्यक्ति तय कर लेता है पीढ़ियों का सर।

 

वह भटकता है गाँव से नगर औ महानगर;

प्यास-भूख भीरु को भी बना देती; निडर।

 

माप सकता है वह कई लोकों को डग भर-

वामन के जैसे ही नन्हे; किन्तु दृढ़ पग-धर।

 

प्रसंग में न वामन है; न ही बली की मबूरी;

है केवल प्यास-भूख से पानी-रोटी की दूरी।

-0-

2-मंजूषा मन


1- ज़माना ऐसा है 

 


सच को 

कारागार मिले 

और झूठों को सम्मान... 


ज़माना ऐसा है 

 

जिसने बदले 

खूब मुखोटे 

उसकी ही पहचान...

ज़माना ऐसा है 

 

छाँव सभी 

कैदी महलों की 

अपने हिस्से धूप,

हम मिट्टी के 

टूटे बर्तन 

वह सोने का रूप। 

जीवन जीने 

की कोशिश में 

जान हुई हलकान...

ज़माना ऐसा है 

 

उजड़ी फसलें 

लुटे द्वार घर 

सभी कुछ हुआ स्वाह, 

अपना दुखड़ा 

किसे सुनाएं 

पाएं कहाँ  पनाह।

ऊपर बैठे थे 

बंदर तो 

बंटे सभी अनुदान...

ज़माना ऐसा है 

 

रविवार, 15 नवंबर 2020

177- नदी के आगोश में

डॉ कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

1


लिपटा वहीं

घुँघराली लटों में

मन निश्छल,

चाँद झुरमुटों में

न भावे जग-छल ।

 2

ढला बादल

नदी के आगोश में

हुआ पागल

लिये बाँहों में वह

प्रेमिका -सी सोई।

3

मन वैरागी

निकट रह तेरे

राग अलापे,

सिंदूरी सपने ले

बुने प्रीत के धागे।

4

मन मगन

नाचता मीरा बन

इकतारे -सा

बज रहा जीवन

प्रीत नन्द नन्दन!

5

रवि -सी तपी

गगन पथ  लम्बा

ये प्रेमपथ ,

है बहुत कठिन 

तेरा अभिनन्दन!


मंगलवार, 10 नवंबर 2020

176-प्रथम अनिवार्य प्रश्न-सा

प्रथम अनिवार्य प्रश्न-सा

डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

 

पहाड़ियों से बहती बयार;

मेरे तन-मन को छूकर

संगीत के साथ बहती है;

चढ़ाई-उतराई की पीड़ा को

कर्णप्रिय स्वरलहरी में बदलने हेतु

सक्षम है; अतः मेरे लिए विशेष है।

 

मेरे तथाकथित घर की

खिड़की से दिखती है

एक नदी, जिसकी मृदु-तरंगित लहरें

कठोर सीने वाले पत्थरों पर

संघर्ष से सफलता लिखने हेतु

सक्षम हैं; अतः मेरे लिए विशेष है।

 

और हाँ दिखता है एक पीपल भी

दूर पर्वत की चोटी पर खड़ा

कर्मयोगी-सा तपस्यारत

सबके बीच रहकर भी है विरक्त

बिना प्रतिदान चाहे, प्राणवायु बाँटने हेतु

सक्षम है;- अतः मेरे लिए विशेष है।

 

बहती बयार, नदी की लहरों

और कभी-कभी पीपल बन


परीक्षापत्र के प्रथम अनिवार्य प्रश्न
-सा

एक प्रश्न, जो उठता ही रहता है

प्रायः मेरे व्याकुल मन में;

'हम' विशेष क्यों नहीं हो सके?

-0-

उदन्ती में मेरी सभी रचनाएँ निम्नलिखित लिंक को क्लिक करके पढ़ी जा सकती हैं-  

उदन्ती 


रविवार, 8 नवंबर 2020

175-तू प्रेमघन

डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'


1


शुष्क पवन
मरुभूमि जीवन
तू प्रेमघन।

2

जग -जंजाल

झूठा यह मधुदेश

तुम विशेष।

3

तोड़ो बन्धन

करो तो आरोहण

जग-क्रन्दन।

4


प्रेम-प्रस्तर

अडिग रह बने

शैल -शिखर।

5

तू हिमधर

पवन झकोरों में

खड़ा निडर।