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परिचयः डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'
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मंगलवार, 30 जनवरी 2018
मैं हूँ सरस होंठों की छुवन
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डॉ. कविता भट्ट नग्न तरुवर मैं हूँ नहीं शरद में ठिठुरता विकल जिजीविषा हूँ कोंपलों की- मैं वसंत की प्रतीक्षा प्रबल ...
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सोमवार, 29 जनवरी 2018
लजाई धूप
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रविवार, 28 जनवरी 2018
मैं घर लौटा’ पर मेरी प्रतिक्रिया
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सुनीता काम्बोज मैं घर लौटा कविता संग्रह श्री रामेश्वर काम्बोज ‘ हिमांशु ’ द्वारा रचित अति उत्तम कृति हैं । इस संग्रह पर प्रतिक्...
21 टिप्पणियां:
शुक्रवार, 26 जनवरी 2018
आतंक के हवाले माँ
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डॉ . कविता भट्ट सुलग रहा मानव समाज है , झुलस रही है मानवता। राष्ट्र हमारा जलता निशिदिन , इस आतंक की ज्वाला में। आज भारत माँ की साड़ी में ...
काश! तुम जी लेती
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काश! तुम जी लेती प्रो 0 इन्दु पाण्डेय खंडूड़ी नन्ही -सी कली थी , कल ही तो खिली थी। आँखों में लिये सपने , कैसे होंगे उसके अ...
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मुकद्दमा
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मुकद्दमा -डॉ.कविता भट्ट अरे साहेब! एक मुकद्दमा तो उस शहर पर भी बनता है जो हत्यारा है– सरसों में प्रेमी आँख-मिचौलियों का ...
रविवार, 31 दिसंबर 2017
नई भोर की नई रीत
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1-डॉ0 कविता भट्ट रात का रोना तो बहुत हो चुका , नई भोर की नई रीत लिखें अब। नहीं ला सकता है समय बुढ़ापा , युगल पृष्ठों पर ह...
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